*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***

Tuesday, 9 June 2020

एक दिन पकडे जाओगे (गीत) - अख्तर अली शाह 'अनन्त'


एक दिन पकडे जाओगे
(गीत)
मत परदे में करो घोटाले छुप छुप कर के पाप ।
पाप से बच न पाओगे ,
एक दिन पकड़े जाओगे ।।

सौ वे दिन बेपर्दा होगा जब पर्दे का मुखड़ा ।
कोई नहीं सुनेगा लोगों पाप करम का दुखड़ा ।।
जीवन को आकर घेरेंगे ,बेशुमार संताप ।
ताप से बच न पाओगे ,
एक दिन पकड़े जाओगे ।।

जब जब भर जाता कोई घट उसे छलकना होता ।
दगा नहीं है सगा किसी का कब करता समझौता।।
दुखियारे मन का फलता है,दिया हुआ हर श्राप ।
श्राप से बच न पाओगे,
एक दिन पकड़े जाओगे ।।

भले बनो नाखुदा ,बनो या रहबर दीन धरम के।
दीनबंधु कहलाओ या हरने वाले हर गम के ।।
गर मन मैला व्यर्थ जाएगी लगी हुई हर छाप ।
छाप से बच न पाओगे ,
एक दिन पकड़े जाओगे ।।

दो आँखें ये भले मान ले नहीं किसी ने देखा ।
पर "अनंत" उसकी आंखों से कौन रहा अनदेखा।।
जिस मालिक ने एक कदम से ली सब धरती नाप।
नाप से बच न पाओगे,
एक दिन पकड़े जाओगे ।।
-0-
अख्तर अली शाह 'अनन्त'
नीमच (मध्यप्रदेश)
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Monday, 25 May 2020

माँ तुम ही हो मीत (कविता) - रीना गोयल

माँ तुम ही हो मीत
(कविता)
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।
सूने सूने वन उपवन सब ,मौन हृदय के गीत ।

रंग धूप का धुआं हुआ है ,गहन हुआ अँधियार ।
सन्नाटा लिपटा तरुवर से ,बर्फ बनी जलधार ।
सुबह खोजती है सूरज को , लगा धूप से आस ।
ओझिल आकृतियां है सारी ,कौन बुलाये पास ।
बीहड़ इस निर्जन जंगल में,मात दिखाए प्रीत ।
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।।

अपनी साँसों की गर्मी से ,शीत करे माँ दूर ।
ममता के आँचल में छुपकर ,सुख मिलता भरपूर ।
है ममत्व में मात बिचारी ,मौन नैन के बैन ।
कभी धूप के देव जगेंगे ,तब आये कुछ चैन 
कठिन हुआ है जीवन जबसे ,बिछड़ गया मनमीत ।
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Saturday, 23 May 2020

पहले से आराम बहुत है (कविता) - शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’

पहले से आराम बहुत है
(कविता)
जो भेजे हो दवा पेट की,
केवल दो दिन ही खाए हम,
पहले से आराम बहुत है.

खेत कट गये, सब गेहूँ के,
बोझ पड़े, खलिहान गँजा है,
दो हजार का, नोट दिए जो,
मुश्किल से वह, आज भँजा है,
आवारा पशु, फसल चर गये,
एक देह को काम बहुत है.

खेत पटाने, गई ‘पवितरी’,
‘रामबुझावन’ गाय चराने
छुटकी रूठ, गई ‘पडरौना’,
‘रूप’ गया ‘घरजनवा’ खाने,
पेड़ फलों से, लदे पड़े हैं,
आया लँगड़ा आम बहुत है.

बचा बकाया, ‘पटवारी’ का,
चुका दिया हूँ पाई-पाई,
सुन, इस फागुन में होनी है,
‘बसमतिया’ की, रुकी सगाई,
एक बार, आकर मिल जाता,
आता लेकिन, घाम बहुत है.

सिर में दर्द, बहुत रहता है,
सदा कहँरती, बुढ़िया आजी,
खाना-पीना, बंद हो गया,
खाती है कुछ, ताजा भाजी,
शहर दिखा दूँ, किसी वैद्य से,
डर जाता हूँ, जाम बहुत है.-०-
पता: 
शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
मेरठ (उत्तरप्रदेश)
-०-


***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Thursday, 14 May 2020

जिंदगी तेरा कोई पता नहीं (कविता) - राजीव डोगरा


जिंदगी तेरा कोई पता नहीं
(कविता)
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो,
लोग सोचते हैं शायद
किसी का कसूर होगा,
मगर आती हो तो
हज़ारो बेकसूरों को भी
अपने साथ ले जाती हो।
कोई तड़फता है
अपनों लिए
कोई रोता है,
औरों के लिए
पर तुम छोड़ती नहीं
किसी को भी
अपने साथ ले जाने को।
जब मरता है कोई एक
तो अफ़सोस-ऐ-आलम
कहते है सब
पर जब मरते है हज़ारों
तो ख़ौफ़-ऐ- क़यामत
कहते हैं सब।
तू भी कभी
तड़फती रूहों को
अपने गले लगाए,
ज़रा रोए कर
मरते हुए किसी चेहरें को
खिल-खिला कर
ज़रा हँसाए कर।
मानता हूँ की ख़ौफ़
तेरे रोम-रोम में बसा हैं
फिर भी किसी मरते हुए
इंसा के माथे को चूम
ज़रा-ज़रा सा मुस्काया कर।
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

कविता के बाजार में (कविता) - अमित खरे

कविता के बाजार में
(कविता)
आओ संयोजक संयोजक खेलें कविता के बाजार में
जुमले और चुटकुल्ले खेलें कविता के बाजार में
आओ अपना गैंग बनाएं कविता के बाजार में
मिलकर पैसा खूब बनाएं कविता के बाजार में
आओ नई दुकान लगाएं कविता के बाजार में
कवियत्री को ढाल बनाएं कविता के बाजार में
दो अर्थी संवाद करेंगे कविता के बाजार में
घर अपना आवाद करेंगे कविता के बाजार में
दिल्ली वाला गैंग चलेगा कविता के बाजार में
कोई ढिंन चिक ढैंग चलेगा कविता के बाजार में
कविता को नीलाम करेंगे कविता के बाजार में
हर दिन नया जाम करेंगेकविता के बाजार में
जी भर चिल्ला चोंट करेंगे कविता के बाजार में
नव अंकुर का घोंट करेंगे कविता के बाजार में
पाक पे झण्डा गाड़ेंगे कविता के बाजार में
जड़ से उसे उखाड़ेंगे कविता के बाजार में
कविता चोरी की पढ़ते हैं कविता के बाजार में
खेल कमीशन का करते हैं कविता के बाजार में
गज़ल नही है, गीत नही है कविता के बाजार में
कोई किसी का मीत नही है कविता के बाजार में
सम्मानों के ठेके होते कविता के बाजार में
कुछ लेके कुछ देके होते कविता के बाजार में
कविता के दुर्दिन हैं जारी कविता के बाजार में
मंचों पर हैं खड़े मदारी कविता के बाजार में
गुर्गे पालनहार खड़े हैं कविता के बाजार में
उल्लू लिये सितार खड़े हैं कविता के बाजार में
झूठों के सरदार खड़े हैं कविता के बाजार में
कितने नटवरलाल खड़े हैं कविता के बाजार में
सरकारी आयोजन हथियाना कविता के बाजार में
सबको बांटो दाना दाना कविता के बाजार में
केवल सत्ता के चारण हैं कविता के बाजार में
चाटुकारी उच्चारण है कविता के बाजार में
घूम रहे हैं बने प्रवक्ता कविता के बाजार में
अपने अपने दल के वक्ता कविता के बाजार में
चैनल पर ताली पिटवाते कविता के बाजार में
हिन्दी की हिन्दी करवाते कविता के बाजार में
कोई विधि विधान नही है कविता के बाजार में
कोई संत महान नही है कविता के बाजार में
-०-
अमित खरे 
दतिया (मध्य प्रदेश)
-०-




***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ