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Friday, 5 February 2021

लाल हँसिया की धार (कविता) - आदित्य अभिनव

 

लाल हँसिया की धार 
(कविता)
    मैंने देखा 
    कुछ लोग लाल गुलाब को 
    मसल रहे हैं, 
   लाल हँसिया की धार 
   इतनी भोथरी
   हो गई है कि 
   गेहूँ की बालियाँ 
   नहीं कट रही हैं अब।
   मीठी धीमी जहर वाला
   किंगकोबरा 
   अपना फन बढ़ाकर 
   इतना विस्तृत कर लिया है 
   कि उसके छाया तले 
   सारी दुनिया 
   धीरे-धीरे
   मर रही है 
   लेकिन 
   किसी को  अपने मरने का 
   न अहसास है 
   न पछतावा।         
-०-
पता: 
आदित्य अभिनव उर्फ डॉ.  चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव 
कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)

-०-

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Thursday, 21 January 2021

महत्त्वाकांक्षा (कविता) - आदित्य अभिनव

 

महत्त्वाकांक्षा 
(कविता)
     मैं तीन पग से 
      पूरी दुनिया,
      मापना चाहता हूँ
      वामन की तरह।
      मैं चाहता हूं कि 
      मेरा पग 
      इतना बड़ा हो जाए कि 
     उसमें 
     सारी दुनिया समा जाए ;
     लेकिन 
     नहीं मिलता मुझे 
     राजा बलि का सिर ,
     जिस पर रख सकूँ 
     अपना पाँव ।
-०-
पता: 
आदित्य अभिनव उर्फ डॉ.  चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव 
कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)

-०-

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Tuesday, 5 January 2021

किन्नर (कविता) - आदित्य अभिनव


किन्नर
(कविता)
          हाँ , मैं स्त्री हूँ 
          और पुरुष भी ; 
         आपके इस सभ्य समाज का 
         एक अंग भी । 
         मुझमें स्त्री-पुरुष दोनों 
         प्रवाहित होते हैं 
         लेकिन , कोई भी 
         प्रकट नहीं हो पाता 
         अपनी पूर्णता के साथ 
         क्योंकि ,
         मैं सदा बहने वाली 
         वह नदी हूँ 
         जिसका कोई किनारा नहीं।
         लोगों को कहते सुना है कि ,
         गलती करना इंसान की फितरत है 
         और ,
         इस सापेक्ष जगत् में 
         केवल ईश्वर ही 
         निरपेक्ष, निष्पाप , निर्विकार, 
         दया का सागर और करुणा निधान है।
         तो फिर ,
         स्त्री और पुरुष के बीच 
         हवा में त्रिशंकु के भाँति 
         लटके ,
         लांछित और अपमानित 
         जीवन के लिए अभिशप्त ,
         हम सब के रूप में 
         क्या , वह असीम अगोचर ही 
         अपनी ही भूल से
         साकार रूप में 
         व्यक्त है ? 
         बंधु ! 
         यदि ऐसा नहीं तो
         वह ईश्वर भी नहीं,
         क्योंकि यदि हम 
         गलत हैं तो
         हमें रचने वाला 
         सही कैसे हो सकता है ? ? ? 
-०-
पता: 
आदित्य अभिनव उर्फ डॉ.  चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव 
कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)

-०-

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