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Tuesday, 5 January 2021

इस ख़बर पर उनका दर्द (व्यंग्य आलेख) कमलेश व्यास 'कमल'

   

इस ख़बर पर उनका दर्द
(व्यंग्य आलेख)

जैसे किसी गन्ने को चरखी में से चार बार गुजारने के बाद उसकी हालत होती है, या किसी भी पतरे की अलमारी को गोदरेज की अलमारी कहने की तर्ज पर पानी की हर बोतल को बिसलरी कहने वाले किसी व्यक्ति द्वारा पूरी बोतल गटकने के बाद उसे मरोड़ मरोड़ कर जो हालत कर दी जाती है,या सैंकड़ो बार भट्टी पर चढ़ने के बाद कड़ाही के पैंदे की जो हालत होती है या अचानक हुई ओलावृष्टि के बाद खेतों में खड़ी फसल की दुर्दशा होती है, वही हालत आज कालू भिया की हो रही थी। सुबह का अखबार उनके लिए ऐसी  खबर लाया था जिसका शीर्षक पढ़ कर ही उनका मूड़ खीज, उदासी सहित ग़म के सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। फिर भी हिम्मत जुटा कर उन्होंने पूरी खबर पढ़ी, जिसे पढ़ने के बाद उनका दिल ऐसा बैठा कि दोपहर 2:00 बजे तक उन्होंने चाय तो छोड़ो कुल्ला तक नहीं किया,मोबाइल पर कई काॅल आए पर एक भी रिसीव नहीं किया।  पत्नी बच्चे हैरान-परेशान,चिंतित, आखिर हुआ क्या है? ना तो बुखार है ना खांसी-जुकाम हुआ है? कुल मिलाकर कोरोना का कोई लक्षण नहीं...! फिर यह स्थिति क्यों? कल रात को अच्छे भले चकहते लहकते घर आए थे, बच्चों से हंसी मजाक किया था, पत्नी से भी 'पतिवत' व्यवहार किया...! फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जो कालू भिया का पूरा अस्तित्व,व्यक्तित्व सुबह से किसी शव यात्रा या नेता का जुलूस गुजरने के बाद सड़क पर बिखरे फूलों पर से सैकड़ों वाहन गुजरने के बाद जैसा लग रहा था...!


कालू भिया का काम सिर्फ और सिर्फ समाजसेवा करने का ही था, जिसकी बदौलत उनके शहर में लगभग दस-बारह मकान थे, दो चार पहिया,पाँच दो पहिया वाहन सर्वसुविधा युक्त शानदार बंगले नुमा घर अलग, जिसमे वे सपरिवार रहते थे...! इसी समाजसेवा के अंतर्गत वे मात्र दस प्रतिशत के मामूली ब्याज पर जरूरतमंदों को पैसा मुहैया करवाते थे, जिसकी बदौलत  लोग उन्हे अपने मकान, ज़मीन, दोपहिया, चार पहिया वाहन भी कभी-कभी सौंप जाते थे, लेकिन पिछले 15 दिनो से तो उन्होंने किसी को ब्याज के लिए अनुरोध भी नहीं किया था, बल्कि किसी ने आकर गुज़ारिश भी की, कि "वह अभी ब्याज नहीं दे पाएगा" तो उन्होंने बड़े प्यार से हँसते-हँसते उसको "कोई बात नहीं" कहकर ही विदा किया था।  एकदम खिले खिले लग रहे थे अभी वे, यार दोस्तों,मोहल्ले वालों  से खूब गपशप करते थे, दिन भर किसी न किसी बहाने सबकी सहायता करने के लिए उतावले प्रतीत होते थे। जरूरत से ज्यादा सामाजिक होते दिखने पर पत्नी ने एक-दो बार मजाक करते हुए पूछ भी लिया था "क्या बात है, आजकल  कुछ ज्यादा ही समाज सेवा हो रही है,  चुनाव लड़ने का इरादा है क्या?" कालू भिया हंस कर टाल देते थे, कोई जवाब नहीं देते थे। पर आज सुबह से अपने पति की ऐसी स्थिति देखकर पत्नी की चिंता बहुत बढ़ गई थी। बेटे से पूछा तो बेटे ने बताया कि सुबह अखबार पढ़ने के बाद से यह हालत है तब पत्नी ने पूरा अखबार कई बार गौर से देखा, यहां तक कि विज्ञापन तक पढ़ डाले, उन्हें कहीं कोई ऐसी खबर नहीं दिखी जिसका सीधा संबंध वह अपने पति से जोड़ सकें। न किसी सगे-संबंधी, जान-पहचान वाले के परलोक गमन की ना ही देश-विदेश में कोई प्राकृतिक आपदा की ख़बर थी, किसी बड़े आतंकी हमले को तो छोड़िए कहीं कोई गोली चलने तक का समाचार नहीं था।   आखिर उसने जिद पकड़ ली वह कालू भिया के पीछे पड़ गई कि उन्होंने अखबार में ऐसा क्या पढ़ा जिससे उनकी हालत ऐसी हो गई ?  आखिर कालू भिया को वह ख़बर बताना पड़ी जिसे पढ़कर उनकी यह हालत हुई थी। शीर्षक था- "नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव स्थगित, फरवरी के बाद होंगे।"  कालू भिया ने पत्नी को बताया कि अभी कुछ दिन पहले चुनाव होने की खबर पढ़कर उन्होंने पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए मोहल्ले में प्रचार अभियान भी चालू कर दिया था, दस-पंद्रह दिनो से पूरी तरह अपने आप को इस अभियान में झोंक दिया था और अब यह खबर... जिसने सब किए कराए पर पानी फेर दिया था।

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कमलेश व्यास 'कमल'
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Wednesday, 2 December 2020

ऑनलाइन: तब और अब (आलेख) - कमलेश व्यास 'कमल'

  

ऑनलाइन: तब और अब
(आलेख)

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक डायलॉग किसी फिल्म में बोला था जो इस प्रकार है - "हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।" सोचो अगर यही डायलॉग समर्थ अभिनेता ए. के. हंगल साहब ने बोला होता तो कैसा लगता..? खैर ...बात यह नहीं है, यह तो यूँही परिहास में लिख दिया। हंगल साहब उच्च कोटि के अभिनेता थे, उन्होंने जो डायलॉग बोले हैं वे अमिताभ बच्चन के द्वारा कहने पर निश्चित ही उतने प्रभावशाली ना लगें। सबका अपना एक दायरा होता है, दिशा होती है,लकीर होती है,इसीलिए तो कई लोग लकीर के फकीर होते हैं...! लकीर को लाइन भी कहते हैं और सबकी अपनी-अपनी लाइन होती है। अमिताभ बच्चन ने जिस लाइन की बात कही थी वह ज़मीन से जुड़ी हुई लाइन थी, जिसे वे ज़मीन पर खड़े होकर बोले थे, परंतु ज़माना बदल चुका है, अब तो जिसे देखो वह ऑनलाइन है...! लेकिन यह लाइन वह लाइन नहीं जो बच्चन साहब की थी,यह तो वह लाइन है जिसमें अमिताभ बच्चन खुद कहीं न कहीं ऑनलाइन रहते हैं...और यह लाइन जमीनी नहीं, हवा-हवाई है...!!

बच्चन साहब ही क्या, आजकल तो जिसे देखो वह ऑनलाइन दिखाई पड़ता है...मंत्री से लेकर संत्री तक,बिजनेसमैन से लेकर कॉमनमैन तक, व्यापारी, नेता, अभिनेता, खिलाड़ी, अनाड़ी, जिसे देखो वह ऑनलाइन दिखाई देता है...!! बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कवि,शायर, यत्र-तत्र सर्वत्र ऑनलाइन दिखाई पड़ते हैं...कुछ लोग तो सुबह से लेकर देर रात तक ऑनलाइन दिखाई पड़ते हैं...!! पता नहीं ये लोग नित्यकर्म कब,कैसे,कहाँ करते होंगे..?

हमारे यहाँ जितने भी न्यूज चैनल्स हैं, उन सब पर कुछ चेहरे इतने कामन हैं कि आप जब भी न्यूज देखने बैठो, उन चेहरों में से कोई न कोई, किसी न किसी न्यूज चैनल पर ऑनलाइन डिबेट करता हुआ दिख ही जाएगा...!! उनकी बौद्धिक क्षमता कितनी है, यह तो मुझ जैसा मूढ़ नहीं बता पाएगा पर उनके धैर्य को नमन करने का मन जरूर करता है...!

वास्तविकता में रचनात्मक और साहित्यिक गतिविधियाँ शायद उतनी नहीं होती होगी, जितनी आजकल ऑनलाइन होने लगी है। ऑनलाइन एकल रचना पाठ, ऑनलाइन कवि गोष्ठी,ऑनलाइन कवि सम्मेलन इत्यादि, फेसबुक एवं वाट्सएप पर ग्रुप बनाकर इस तरह की गतिविधियों की धूम मची हुई है। अच्छा है, कम ज कम इसी बहाने रचनात्मक सक्रियता तो बनी रहती है...अपनी वे रचनाएँ जिन्हे कई संपादकों द्वारा "रिजेक्शन" का "सर्टिफिकेट्स" मिल चुका है, उसे रचनाकार ऑनलाइन बेझिझक सुना तो सकता है...जिससे उस रचनाकार के रचनाकर्म में किए गए परिश्रम का पारिश्रमिक स्वयं की मानसिक संतुष्टि के रूप में मिल जाता है...!!

खैर, यह तो एक छोटा सा उदाहरण है...देखा जाए तो क्या नहीं हो रहा है आजकल ऑनलाइन...चैटिंग, डैटिंग,शापिंग से लेकर शादी-ब्याह तक, सब कुछ ऑनलाइन हो रहा है...अब तो मरने पर दाह संस्कार भी ऑनलाइन होने लगा है...!! लब्बेलुआब यह कि आजकल 'जीवन,मरण,परण,सब कुछ ऑनलाइन होने लगा है...! घर में राशन नहीं है, ऑनलाइन मँगवा लीजिए...अजी राशन को मारो गोली...ऑनलाइन मँगवा भी लो पर पकाना तो पड़ेगा...इसलिए सीधा पका पकाया मँगवाइए...बिल चुकाया,आया, खाया, डकारा और सो गए...!!    हाँ यह माना कि ऑनलाइन के द्वारा वर्तमान समय में बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है, दूर देश में रह रहे अपने बच्चों, परिजनों से रूबरू वार्तालाप हो जाता है। माता-पिता, नाते-रिश्तेदारों को चैन व सुकून मिल जाता है। ऑनलाइन आवेदन,ऑनलाइन शिक्षण-प्रशिक्षण,निरिक्षण, साहित्यकारों,कवियों,कलाकारों को एक मंच मिल जाता है। आलोचकों,समीक्षकों द्वारा समय-समय पर मार्गदर्शन मिल जाता है...कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि समीक्षकों, आलोचकों से मार्गदर्शन..? तो भैया इनकी कही बातों को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखोगे तो मार्गदर्शन, अन्यथा मगज घर्षण...!! अपना-अपना नजरिया है...खैर। जरूरतमंदों को अपनी जरूरत का सामान मुहैया हो जाता है।

फास्ट फूड वालों को फास्ट फूड, ड्राय फूड वालों को ड्राय फूड, भोजन की कामना रखने वालों को पका पकाया भोजन...इतना सब कुछ होने के बावजूद भी विश्व भर के वैज्ञानिक अभी वह उपलब्धि हासिल नहीं कर पाए, जहाँ ऑनलाइन के माध्यम से मनुष्य को भूख लगने पर सीधा पेट भर जाए...!! जबकि हमारे ऋषि,मुनि,योगाचार्य सदियों पहले इस उपलब्धि को पा चुके थे। 'योगकुण्डल्युपनिषद्' , 'घेरण्ड संहिता' और इन जैसी अन्य पुस्तकों में इस विषय पर विस्तार से वर्णन है।  'खेचरी मुद्रा' और इस जैसी अन्य क्रियाओं द्वारा हमारे महान ऋषियों, मुनियों, योगाचार्यों, तपस्वियों ने अपने तपोबल और योगबल से जो उपलब्धियाँ प्राप्त की थी वह सब आज भी लिपीबद्ध है, परंतु आज उन्हें क्रियान्वित करने की क्षमता शायद ही किसी में हो...वे योगी अपने योगबल से विभिन्न स्वादों का रसास्वादन कर अपनी क्षुधा शांत कर लिया करते थे,सशरीर तीनो लोकों में भ्रमण कर आते थे, और आज...आजकल तो योग भी ऑनलाइन किया, करवाया जा रहा है...!

आज हमें ऑनलाइन होने के लिए मोबाइल, लेपटॉप, कंम्प्यूटर इत्यादि साधनों की आवश्यकता पड़ती है परंतु उन मनीषियों ने तो अपने तपोबल,योगबल साधना से अपने  शरीर को ही  ऑनलाइन कर रखा था, जो एक साधारण मनुष्य न तब कर सकता था न अब...क्योंकि योग की यह कठोर साधना अत्यंत दुर्लभ है। परंतु यम, नियम, संयम द्वारा फूल नहीं पाँखुरी तो हासिल की जा सकती है...चाहे ऑनलाइन ही सही...!! 

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कमलेश व्यास 'कमल'
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Saturday, 10 October 2020

चिठ्ठी न कोई संदेश... (आलेख) - कमलेश व्यास 'कमल'

 

चिठ्ठी न कोई संदेश...
(आलेख)
(10 अक्टूबर,'राष्ट्रीय डाक दिवस' पर विशेष)

एक कहावत है  - "ख़त का मजमून भाँप लेते हैं लिफाफा देखकर।" हैं साहब ऐसे लोग, जो ऐसा कर सकते हैं, लेकिन बहुत कम। हो सकता है आने वाले समय में यह कहावत अप्रासंगिक हो जाए और लिफाफा देखकर मजमून भाँपने वाले कोई न बचे...क्योंकि वर्तमान पीढ़ी न तो कागजों पर ख़त लिखती है और ना ही डाक घरों तक पहुँचाती है! अब 'ईमेल' सहित कई माध्यम जो हैं।  ना तो अब सड़क किनारे या किसी पेड़ पर बंधे वो लाल डब्बे दिखाई देते हैं जिनमें लोग अपने खतों को डालते थे। जिसे डाक विभाग का कर्मचारी एक निश्चित समय पर निकाल कर पोस्ट ऑफिस  ले जाता था और वहाँ सभी पत्रों की छँटाई कर गंतव्य तक पहुँचाने का उपक्रम किया जाता था। यह उपक्रम आज भी होता है, पर उसमें व्यक्तिगत पत्रों की संख्या बहुत कम रह गई है। 166 साल पुराना डाक विभाग यूँ तो अब अत्याधुनिक संसाधनों से युक्त पूर्ण तकनीक की ओर अग्रसर है पर जो आत्मीय लगाव व्यक्तिगत पत्रों के स्वर्णिम काल में एक आम आदमी को इससे था, वह अब नहीं है।  उस जमाने में डाकियों के भी अपने जलवे होते थे,  खाकी रंग की वर्दी के ऊपर नोक दार टोपी जिस के अगले हिस्से में एक लाल,काली पट्टी और कोटनुमा शर्ट में बड़ी-बड़ी जेबें, कंधे पर एक थैला जिसमें वितरण के लिए डाक सामग्री, कुछ पत्र हाथ में।  वे जिस गली-मोहल्ले से गुजर जाते थे वहां कई निगाहें या तो उन्हें चुपचाप देखती रहती थी या कुछ अपने उतावलेपन में पूछ भी लेते थे कि "भैया! हमारी कोई डाक आई है क्या?"  कुछ लोग जो अपने घरों में  व्यस्त रहते थे उनके कान सतर्क रहते थे कि कब डाकिया बाबू आवाज लगा दे।  चिट्ठी पत्री के अलावा त्योहारों पर ग्रीटिंग कार्ड्स का भी एक जमाना रहा है। त्यौहारों पर पोस्टमेन द्वारा इनाम की दरकार अलग से, और लोग भी खासतौर से दीपावली पर डाकिया बाबू को कुछ रुपए और मिठाई अवश्य देते थे। कुछ लोग तो बाकायदा अपने घर में बैठा कर स्वल्पाहार करवाते थे।पर अब न वो वर्दी दिखाई देती है और ना ही वैसे डाकिये...!  अब तो यदा-कदा साइकिल से कोई डाकिया या कोई कोरियर वाला किसी का कोई बिल या पार्सल लेकर आता दिख जाए तो गनीमत वरना 'ई मार्केटिंग' के आदमकद थैलों  से लदे मोटरसाइकिल पर कुछ युवा आते-जाते अवश्य दिख जाते हैं या जोमैटो,स्विग्गी जैसे पके पकाए भोज्य पदार्थ लेकर घरों में देते एक विशेष रंग की टीशर्ट पहने युवा...! पर अब वह  सौहार्द,अपनत्व कहीं दिखाई नहीं देता जो व्यक्तिगत पत्रों के ज़माने में था।



पत्र लेखन किसी साहित्यिक विधा से कमतर नहीं, बल्कि साहित्य की एक विधा ही है,  जो अब लगभग लुप्त हो चुकी है। किसी भी पत्र की शुरुआत कोई कैसे करता है इससे पत्र लिखने वाले की बौद्धिक क्षमता का पता किया जा सकता है। अलबत्ता भावावेश या अत्यधिक प्रेमासिक्त हो कर लिखे गए पत्रों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसे भी ऐसे पत्र, डाक द्वारा कम ही भेजे जाते थे,इन्हे तो किसी खास व्यक्ति द्वारा या व्यक्तिगत तौर से छुप-छुपाकर दिया जाता था और दिया जाता है।

कुछ लोग पत्र के शुरुआत में किन्हीं देवी देवता का नाम या बीज मंत्र लिखते थे, कुछ लोग रेखांकन भी कर पत्र की शुरुआत करते थे, यानी इसी प्रकार से कुछ और लिख या बनाकर, पर हां, परंपरागत पत्र लिखने वाले बकायदा पत्र के दाहिनी ओर ऊपर तारीख,स्थान और कुछ लोग वार भी लिखकर पत्र की शुरुआत करते थे। हमारी पीढ़ी के लगभग सभी लोगों के पास अपने प्रियजनों, बुजुर्गों, गुरुजनों के या कुछ और पत्र अवश्य ही किसी संदूक में या कहीं ओर सुरक्षित,संरक्षित रखें मिल जाएंगे, जिन्हें कभी-कभार पढ़ कर अपनी स्मृतियों को तरोताजा कर हृदय का स्पंदन सुन नेत्र मूंदकर उस युग में पहुंच जाते होंगे जो अब कभी लौट कर नहीं आने वाला...!

पोस्ट कार्ड, अंतर्देशीय पत्र और लिफाफा इन तीनो में से आसमानी रंग का अंतर्देशीय पत्र अब बहुत कम दिखाई देता है। आजकल तो मोबाइल से पैसे ट्रांसफर होने लगे हैं वरना किसी जमाने में मनीआर्डर का बड़ा महत्व था। और 'तार', उसके तो जलवे ही अलग थे। किसी के नाम से तार आना बहुत बड़ी बात होती थी। 'टेलीग्राम' जिसके नाम से आता था उसकी तो छोड़िए, जो सुनता था कि फलां व्यक्ति के नाम से तार आया है उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती थी...!   अब तो 'पोस्ट एण्ड टेलीग्राम' में से 'टेलीग्राम' गायब ही हो गया है।संचार क्रांति के इस दौर के शुरुआत में ही 'तार घर' अप्रासंगिक हो बंद हो चुके थे।

एक जमाना था जब कक्षा छटी से लेकर कक्षा दसवी तक की परिक्षा में अंग्रेजी के पेपर में 'पोस्टमेन' पर निबंध आता ही था। जिसे मुझ जैसे हिन्दी मीडियम के लोग रट्टा मारकर लिख कर अंग्रेजी में पासिंग मार्क ले आते थे...!!

उस जमाने की फिल्मों में भी ख़त या पत्र को लेकर कई गीत बने जो लोकप्रिय भी हुए, उनमें से कुछ गीत तो सदाबहार हैं जो आज भी गुनगुनाते लोग मिल जाएँगे। जैसे- "फूल तुम्हे भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है।" या "लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में, हजारों रंग के नजारे बन गए।" या "ख़त लिख दे सँवरिया के नाम बाबू।" या "चिठ्ठी आई है वतन से चिठ्ठी आई है।" या "आएगी जरूर चिट्ठी मेरे नाम की।" और "डाकिया डाक लाया डाकिया डाक लाया।" इत्यादि कई गीत हैं। बहरहाल तो डाकिया बाबू को याद करते हुए बस यही गीत याद आ रहा है- "चिठ्ठी न कोई संदेश,जाने वो कौन सा देश, जहाँ तुम चले गए।"
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कमलेश व्यास 'कमल'
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Monday, 27 July 2020

मुखिया मुख सो चाहिए (आलेख) - कमलेश व्यास 'कमल'

मुखिया मुख सो चाहिए
(आलेख)
लेख- गोस्वामी तुलसीदास जयंती विशेष (27-7-20)

जनमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी को लेकर आम धारणा यही है कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की भक्ति में आकंठ डूबे एक ऐसे कवि थे जिन्होंने जन-जन में सर्वाधिक लोकप्रिय राम चरित मानस,हनुमान चालीसा, विनय पत्रिका,जानकी मंगल  सहित कई धार्मिक साहित्य की रचना की। वस्तुतः यह सही है, फिर भी गोस्वामी तुलसीदास जी के संपूर्ण सृजन का सही आकलन नही कहला सकता। भक्ति काल के अग्रगण्य कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने इन्ही पौराणिक सृजनात्मक गतिविधियों में कई ऐसे दोहे, सोरठे,चौपाई छंद इत्यादि रचे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि वे सामाजिक सरोकार, राजनीति, ज्योतिष शास्त्र, सहित अन्य विषयों पर भी गहरी पकड़  रखते थे।
"समरथ को नहिं दोष गुसाईं" या "सठ सन विनय कुटिल संग प्रीति" जैसी चौपाइयाँ या "सचिव बैद गुरु तीन जो,प्रिय बोलहिं भय आस।"  जैसा दोहा जनमानस में लोकप्रिय भी है और उदाहरण स्वरूप बोला भी जाता है। परंतु गोस्वामी जी के कृतित्व पर वृहद् मुल्यांकन के लिए कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करना प्रासंगिक होगा जिससे यह बात सिद्ध हो सके कि उनके रचनाकर्म का आभामंडल कितना विशाल है।
गृह नक्षत्रों के बारे में कितना  गहरा अध्ययन गोस्वामी जी ने किया होगा इसकी बानगी प्रस्तुत है। कौन से नक्षत्र व्यापार के लिए शुभ होते हैं, इसे मात्र एक दोहे में प्रस्तुत कर देना, यह तुलसीदास जी  जैसे विलक्षण प्रतिभाशाली कवि ही कर सकते थे। दोहा देखें-
"श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग,हय रेवती सखाउ।
देहि लेहि धन धरनि धरु,गएहुँ न जाइहि काउ।।"
अर्थात - श्रवण नक्षत्र से तीन नक्षत्र,(श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष) हस्त नक्षत्र से तीन नक्षत्र, (हस्त,चित्रा,स्वाती) पु से आरंभ होने वाले दो नक्षत्र, (पुष्य,पुनर्वसु) इसके अलावा मृगशिरा, अश्विनी, रेवती तथा अनुराधा। इन बारह नक्षत्रों में जर, ज़मीन, स्थाई संपत्ति का लेनदेन करने से कभी नुकसान नहीं होगा, अपितु धन जाता हुआ प्रतीत होने पर भी नहीं जाएगा।  ठीक इसी प्रकार कौन से नक्षत्र में गया हुआ धन वापस नहीं आता, इस बारे में भी केवल एक दोहे में समझाया है गोस्वामी जी ने...प्रस्तुत है-
"ऊगुन पूगुन बि अज कृ म,आ भ अ मू गुनु साथ।
हरो धरो गाड़ो दियो,धन फिरि चढ़इ न हाथ।।"
मतलब - 'उ' से आरंभ होने वाले तीन नक्षत्र (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद) 'पू' से आरंभ होने वाले तीन नक्षत्र (पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद ) विशाखा, रोहिणी, कृतिका, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा तथा मूल नक्षत्र में चोरी गया हुआ, गिरवी रखा हुआ, ज़मीन में गाड़ा हुआ एवं उधार दिया हुआ धन वापस नहीं आता।
जरूरी नहीं कि यह बात पूर्ण सत्य हो, अपवाद हर जगह मौजूद होता है यहाँ भी होगा। ऐसा हमारा मानना है। खैर...
किस राशि के लिए कौन-सा चन्द्रमा घातक होता है, इस बात को बड़ी विद्वता से मात्र एक दोहे में तुलसीदास जी ने समेटा है, देखिए –
"ससि सर नव दुइ छ दस गुन,मुनि फल बसु हर भानु।
मेषादिक क्रम तें गनहि, घात चंद्र जियँ जानु।।"
भावार्थ यह कि - 'मेष राशि' के प्रथम, 'वृषभ' के पाँचवे, 'मिथुन' के नवें, 'कर्क' के दूसरे, 'सिंह' के छठे, 'कन्या' के दसवें,'तुला' के तीसरे, 'वृश्चिक' के सातवें,'धनु' के चौथे,'मकर' के आठवें,'कुम्भ' के ग्यारहवें और 'मीन' राशि के बारहवें चन्द्रमा पड़ जाए तो उसे घातक समझो।
आइए, इस दोहे का गूढ़ार्थ समझते हैं। चूंकि किसी भी छंद का अपना एक विधान होता है, यहाँ बात दोहे में कही गई है अतः अड़तालीस मात्राओं में अन्य नियमों का पालन करते हुए पूरी बात कहने के लिए तुलसीदास जी ने संकेतों में जिस कुशलता से कहा है, ऐसा कहना अत्यंत दुर्लभ एवं प्रणम्य है। जैसे चन्द्रमा एक है तो जैसा कि दोहे में कहा गया है - "मेषादिक क्रम तें गनहि" यानी 'मेष राशि' से शुरू करते हुए क्रम से, अर्थात 'मेष राशि' में पहला चन्द्रमा घातक होता है, ठीक इसी प्रकार 'वृषभ'- सर, यानी बाण, अर्थात पाँचवा चन्द्रमा घातक। उल्लेखनीय है कि कामदेव के पाँच बाण होते हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- नीलकमल, मल्लिका,आम्रमौर, चम्पक और शिरीष कुसुम। इसी क्रम में 'मिथुन'- नव यानी नवा या नवम,'कर्क'-दुइ , यानी कर्क राशि का दूसरा चन्द्रमा घातक, 'सिंह' - छ  (छठवाँ), 'कन्या' - दस  (दसवाँ), 'तुला'-गुन (तीसरा) गुण तीन होते हैं- सत, रज, तम, 'वृश्चिक'-मुनि (सातवाँ) मुनि सात माने गए हैं-सप्तर्षि। इसके बाद 'धनु'-फल (चौथा)फल चार माने गए हैं- धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष। फिर 'मकर'-वसु (आठवाँ) वसु आठ माने गए हैं। मकर के बाद 'कुम्भ'- हर  (ग्यारहवाँ) हर अर्थात् रुद्र,जो ग्यारह माने जाते हैं। और अंत में 'मीन'-भानु  (बारहवाँ) सूर्य है।
ऐसे कई उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। जैसे, किस प्रकार के सेवक और मित्र रखना चाहिए और कब त्याग करना चाहिए-
"लकड़ी डौआ करछुली,सरस काज अनुहारि।
सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं,सेवक सखा बिचारि।।"
अर्थात- कहीं लकड़ी के चम्मच से काम लिया जाता है, तो कहीं उसको छोड़ कर धातु की करछुली उपयोग में लाई जाती है, ठीक उसी प्रकार समझदार आदमी भी जरूरत के मुताबिक काम आने योग्य  कर्मचारी और मित्रों का संग करता है और उन्हे रखता है।
देश का मुखिया कैसा होना चाहिए, इस बारे में कितनी सुंदर बात कही है-
"मुखिआ मुख सो चाहिऐ,खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग,तुलसी सहित बिबेक।।
आशय- देश के मुखिया को मुख के समान होना चाहिए, जो खाने पीने के लिए तो एक है, परंतु विवेक से समस्त अंगों का पालन पोषण करता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के कृतित्व पर अभी बहुत कुछ लिखा जा सकता है,स्थिति यह है कि "जिन खोजा तिन पाइया", आप उनके साहित्य का जितना गहराई से अध्ययन करेंगे, उतना नित नए ज्ञान कोष से परिपूर्ण होते जाएँगे।
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कमलेश व्यास 'कमल'
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Friday, 17 July 2020

किसम किसम के लोग (हास्य व्यंग्य) - कमलेश व्यास 'कमल'

किसम किसम के लोग

(हास्य व्यंग्य)
इन दो महीनो में जितना 'वाट्सएप' चलाया है, उतना कभी नहीं चलाया था। इससे प्राप्त ज्ञान व अनुभव के आधार पर कुछ नए किस्म के लोगों से परिचय हुआ, इन लोगों में वे शामिल नहीं हैं जो बिना नागा,तीसों दिन अलसुबह "गुड माॅर्निंग" शुभ प्रभात के किसी उपदेशात्मक संदेश को वाट्सएप पर भेजते हैं...! या वे लोग जो किसी मंदिर में स्थित मूर्ति के रोजाना दर्शन कराते हैं...! इसमें वे लोग भी शामिल नहीं हैं जो सिर्फ वाट्सएप पर मामेरे के कपड़ों की तरह आए हुए मेसेज को बगैर पढ़े बस "फारवर्ड" करते रहते हैं...ये लोग किसी के जन्मदिन, "मैरिज एनिवर्सरी" पुण्यतिथि पर भी एक शब्द कभी नहीं लिखते...सीधा किसी ओर के भेजे "मेसेज" को "काॅपीपेस्ट" कर इतिश्री कर लेते हैं...! ऐसे लोगों के बारे में पहले कई बार कहा जा चुका है...हम यहाँ चर्चा करेंगे कुछ अलहदा किस्म के इंसानो की, जो बहुतायत में हैं पर चर्चित नहीं हैं...लीजिए पेश है वाट्सएप शोध से उपजे इन किरदारों पर एक लघु शोध पत्र।

 "फुसफुसे लोग" - ऐसे लोग वाट्सएप पर सार्वजनिक रूप से संबंधित समूह में अपनी बात कदापि नहीं कहते, परंतु उक्त समूह में आए किसी विषय पर निरंतर लोगों को (व्यक्तिगत तौर पर) किसी समारोह में, कहीं मिलने पर,उनके घर पहुंच कर या मोबाइल पर बात कर उकसाते रहते हैं।  पहले तो इधर-उधर की बातें करते हैं फिर अपने लहजे को यथासंभव रहस्यमयी बनाकर उस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कानाफूसी करते हैं,और उम्मीद यह रखते हैं कि इस विषय पर आप उनके मुताबिक लिख कर वाट्सएप पर पोस्ट करें...इस प्रकार की कानाफूसात्मक बातें वें संबंधित ग्रुप से अपने हितैषी छाँट-छाँट कर निरंतर तब तक करते हैं जब तक कि वे अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो जाते...!  इस प्रकार के लोग बेहद  घातक किस्म के होते हैं,कृपया ऐसे लोगों के फुसलाने पर कदापि न फुसलें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।

"भरभंड लोग"-  इस किस्म के लोग आगा-पीछा सोचे बिना वाट्सएप पर आए किसी मेसेज पर तुरंत व व्यापक प्रतिक्रिया करते हैं। इनके मन में जो आता है, वह लिख देते हैं। मेसेज अच्छा लगता है तो तारीफों के पुल बांध देते हैं और बुरा लगने पर सामने वाले की बखिया उखड़ने से भी परहेज नहीं करते...और  भूल जाते हैं...मन में कोई मैल नहीं रखते।   
व्यक्तिगत तौर पर ऐसे लोगों को अच्छा मानने का मन करता तो है पर इनके "भरभंड पने" से डर भी लगता है...पता नहीं कब कौन सी बात इन्हे नहीं जमें और ये वाट्सएप ग्रुप पर अपनी लू उतार दे...!

 "पनियल लोग"- इस प्रकार के लोग वाट्सएप  ग्रुप पर आए किसी मेसेज या समूह चर्चा में पक्ष-विपक्ष के बारे में बहुत सोच विचार कर अपनी प्रतिक्रिया बेहद संतुलित व "अपरिणाम मूलक" ढंग से देते हैं। तात्पर्य यह कि "राम पढ़े तो राम की जय लगे और रावण पढ़े तो रावण की जय लगे...!" तात्पर्य यह कि जैसे पानी, मदिरा में भी घुल-मिल जाता है और दूध में भी, ठीक इसी प्रकार से इनकी लिखी बातें होती है, जिसे जो पढ़े, उसको अपने पक्ष में लिखी प्रतीत हो...अतः ऐसे लोगों का विश्वास करना, अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा लगता है...! 

किस्में तो ओर भी है पर उपरोक्त  लिखी कुछ किस्मों के अलावा साहित्यकारों,कवियों,कलाकारों,ज्ञानियों,परम ज्ञानियों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता है। यह लघु शोध पत्र केवल साधारण मनुष्यों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
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कमलेश व्यास 'कमल'
उज्जैन (मध्यप्रदेश)
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