*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***

Thursday, 14 May 2020

जिंदगी तेरा कोई पता नहीं (कविता) - राजीव डोगरा


जिंदगी तेरा कोई पता नहीं
(कविता)
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो,
लोग सोचते हैं शायद
किसी का कसूर होगा,
मगर आती हो तो
हज़ारो बेकसूरों को भी
अपने साथ ले जाती हो।
कोई तड़फता है
अपनों लिए
कोई रोता है,
औरों के लिए
पर तुम छोड़ती नहीं
किसी को भी
अपने साथ ले जाने को।
जब मरता है कोई एक
तो अफ़सोस-ऐ-आलम
कहते है सब
पर जब मरते है हज़ारों
तो ख़ौफ़-ऐ- क़यामत
कहते हैं सब।
तू भी कभी
तड़फती रूहों को
अपने गले लगाए,
ज़रा रोए कर
मरते हुए किसी चेहरें को
खिल-खिला कर
ज़रा हँसाए कर।
मानता हूँ की ख़ौफ़
तेरे रोम-रोम में बसा हैं
फिर भी किसी मरते हुए
इंसा के माथे को चूम
ज़रा-ज़रा सा मुस्काया कर।
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

कविता के बाजार में (कविता) - अमित खरे

कविता के बाजार में
(कविता)
आओ संयोजक संयोजक खेलें कविता के बाजार में
जुमले और चुटकुल्ले खेलें कविता के बाजार में
आओ अपना गैंग बनाएं कविता के बाजार में
मिलकर पैसा खूब बनाएं कविता के बाजार में
आओ नई दुकान लगाएं कविता के बाजार में
कवियत्री को ढाल बनाएं कविता के बाजार में
दो अर्थी संवाद करेंगे कविता के बाजार में
घर अपना आवाद करेंगे कविता के बाजार में
दिल्ली वाला गैंग चलेगा कविता के बाजार में
कोई ढिंन चिक ढैंग चलेगा कविता के बाजार में
कविता को नीलाम करेंगे कविता के बाजार में
हर दिन नया जाम करेंगेकविता के बाजार में
जी भर चिल्ला चोंट करेंगे कविता के बाजार में
नव अंकुर का घोंट करेंगे कविता के बाजार में
पाक पे झण्डा गाड़ेंगे कविता के बाजार में
जड़ से उसे उखाड़ेंगे कविता के बाजार में
कविता चोरी की पढ़ते हैं कविता के बाजार में
खेल कमीशन का करते हैं कविता के बाजार में
गज़ल नही है, गीत नही है कविता के बाजार में
कोई किसी का मीत नही है कविता के बाजार में
सम्मानों के ठेके होते कविता के बाजार में
कुछ लेके कुछ देके होते कविता के बाजार में
कविता के दुर्दिन हैं जारी कविता के बाजार में
मंचों पर हैं खड़े मदारी कविता के बाजार में
गुर्गे पालनहार खड़े हैं कविता के बाजार में
उल्लू लिये सितार खड़े हैं कविता के बाजार में
झूठों के सरदार खड़े हैं कविता के बाजार में
कितने नटवरलाल खड़े हैं कविता के बाजार में
सरकारी आयोजन हथियाना कविता के बाजार में
सबको बांटो दाना दाना कविता के बाजार में
केवल सत्ता के चारण हैं कविता के बाजार में
चाटुकारी उच्चारण है कविता के बाजार में
घूम रहे हैं बने प्रवक्ता कविता के बाजार में
अपने अपने दल के वक्ता कविता के बाजार में
चैनल पर ताली पिटवाते कविता के बाजार में
हिन्दी की हिन्दी करवाते कविता के बाजार में
कोई विधि विधान नही है कविता के बाजार में
कोई संत महान नही है कविता के बाजार में
-०-
अमित खरे 
दतिया (मध्य प्रदेश)
-०-




***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Wednesday, 13 May 2020

सब कुछ छोड़ (मुक्तक) - राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'

सब कुछ छोड़
(मुक्तक)
सब कुछ छोड़ कर मैं गांव लौट आया हूं,
आज सदियों के बाद खेत अपने आया हूं।
शहरों की भाग दौड़ में उलझ के थक गया था,
दिल मेरा था बेचैन अब मैं चैन पाया हूं।।
पेड़ पौधे मेरे मुझसे शिकायत करते हैं,
बच्चों सी करके शरारत फिर मुझसे लड़ते हैं।
महीनों हो गए बातें नहीं की हैं हमने,
बैठो छाया में मेरी दिल की बातें करते हैं।।
रघुवंशी हमें छोड़ के ना जाया करो,
याद आती है बहुत यू न तुम सताया करो।
ये मत समझो कि हम जी नहीं सकते तुम बिन,
हम हैं दिलदार तुम्हारे यूं ना आजमाया करो।।
गया बेरी के पास कहा बेर खिलाओ,
पेड़ बोला कि अब क्यों आए हो भाग जाओ।
मैंने कहा मजबूरी थी मान भी जाओ यार,
अब ना जाऊंगा कभी शिकवे गिले भूल जाओ।।
छोड़कर तुमको फिर से कभी अब न जाऊंगा,
छोटी कुटिया बनाके यहीं रुक जाऊँगा।
रघुवंशी जहाँ के झंझटों से थक चुका है,
रहूंगा जंगलों में जहाँ भूल जाऊंगा।।
-०-
कवि 
राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Monday, 11 May 2020

इंतज़ार (कविता) - अमित डोगरा


इंतज़ार
(कविता)
इंतजार क्या है?
इंतजार से पूछो इंतजार क्या है?
इंतजार क्या है
मुझसे पूछो ?
उसके आने से पहले भी
उसका इंतजार था,
उसके आने पर भी
उसका ही इंतजार है,
उसके पास बैठने पर भी
उसका ही इंतजार था ,
उसके साथ चलने पर भी
उसका ही इंतजार है,
उसके जाने के बाद भी
उसका ही इंतजार है ,
आज भी उसका इंतजार है,
जीवन के अंतिम क्षणों तक
उसका ही इंतजार रहेगा ।।
-०-
पता:
अमित डोगरा 
पी.एच डी -शोधकर्ता
अमृतसर

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

हाय रे मोटापा ! (हास्य दोहे) - रीना गोयल

हाय रे मोटापा !
(हास्य दोहे)
मोटापे से हो रही , भारी भरकम देह।
विरला ही कोई मुझे, अब करता है स्नेह।।१।।

लापरवाही थी करी, खूब किया नित भोज।
पर गरिष्ठ आहार की ,आँखें करती खोज।।२।।

चर्बी घटती ही नहीं, बनी हुई हूँ ढोल ।
सुंदर तन इतिहास का, बदल गया भूगोल।।३।।

दर्पण में देखूं अगर , उठती मन में पीर।
कुछ ही दिन में हाय रे! हथिनी बना शरीर।।४।।

लेकिन यदि कोई कहे, मोटी मुझको आज।
जीभ काटकर फेंक दूँ , यह मेरा अंदाज़।।५।।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ