(कविता)
आदित्य अभिनव उर्फ डॉ. चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव
कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)
*दुख दर्द की आवाज*
गांव की कच्ची गली से
जब निकलता हूँ
हर समय दुख दर्द की
आवाज सुनता हूं ।
यह शिकायत खेत की
फिर मेघ ने धोखा दिया
उग सके कुछ खेत में
यह हौसला कम कर दिया
मेढ से नजरें चुराकर
मैं खिसकता हूं
गांव की कच्ची गली से •••
चरमराती चारपाई
रात भर रोती रही
और टूटी जूतियां
कोने में चुप सोती रही
देख कर भूखा बुढ़ापा
मैं तड़पता हूं ।
गांव की कच्ची गली से •••••
हो गई है सांझ
बापू लौट कर कब आएंगे
दर्द की पीड़ा बहुत है
कब दवाई लाएंगे
इन दुखद अनुभूतियों से
मै नित गुजरता हूं
गांव की कच्ची गली से •••••
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कोख की तड़प
(कविता)
कुछ छोटे -छोटे पौधे जो
आंगन में उसने रोपें थे
जाने कब वो बन गये पेड़
हिलकर समीर के झोंके से,
उसकी ममता की छाया में
निज तन निहार इठलाते है
अब उसको छाया देते है
उस पर फल फूल लुटाते है,
सूरज क़ी भीषण गर्मी से
ज़ब भी मुरझा से जाते थे
उसका पाकर कोमल स्पर्श
नव जीवन से भर जाते थे,
नवजात शिशु की भांति ही वो
उन पर निज स्नेह लुटाती थी
निज रिक्त कोख की पीड़ा को
वो भूल उसी पल जाती थी,
जैसा रिश्ता माँ बच्चों का
वैसा था उसका पौधों से
पल -पल टूटी थी समाज में
सूनी कोख के विरोधों से।।
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