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Friday, 15 January 2021

यादों की गठरी (कविता) - रानी प्रियंका वल्लरी

 

यादों की गठरी
(कविता)
यादों की गठरी है कुछ 
पीड़ बन दबी हृदय में 
तमाम यादें मुश्किलें 
अंतर्मन में सिकुड़ी हुई है।

सफ़ेद कोहरे की तरह 
हृदय पर छाई हुई है 
खिली धूप सी है यादें 
मुस्कुराना चाहती हैं 

स्मृति का अलाव जलाकर 
सेंकती हुई हाथे कंपकपाती
भावनाओं के अनंत लहर में 
डूब कर सहम जाती है।

व्यथा,निराश निंदा रस का 
हाला पीकर मदमस्त हृदय 
पहाड़ की खाई में लुप्त 
होकर विलीन हो जाती है 

रिश्ते नाते परखने लगे 
भावनाओं और विचार में 
प्रतिदिन जूझती ज़िंदगी 
अभिसार को आतुर है 

निर्वस्त्र हृदय की आकुलता 
व्यथा का घट पीकर सदा
आश्वस्त कर रहा यह  मन 
शीतल विराम  में अपना 
स्थिर अस्तित्व ढूँढ़ती है 
-०-
पता: 
रानी प्रियंका वल्लरी
बहादुरगढ (हरियाणा)

-०-

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Thursday, 24 December 2020

नववर्ष का है इंतज़ार (कविता) - रानी प्रियंका वल्लरी


बारिश की रूमानी फुहार
(कविता)
नववर्ष का है इंतज़ार मुझको 
अपनो में हो व्यवहार सबको 
महामारी में खिली जो  बगिया 
हो जीवन सफल साकार मुझको


घर आंगन के चारदीवारी पर 
जो टपकते सुंदर  शीतल बुंदे 
धुंध कोहरा का हो जो पहरा 
सर्द हवा खूब भाती मुझको 

ओढ़ रजाई  बैठ मै तो 
बनाती ख्याली पुलाव कुछ तो 
नए साल  कुछ नया कर चलो 
कुछ  चले नया व्यापार सबको 
मन में करो  विचार कुछ तो 


कोहरे की चादर ओढ़  प्रकृति 
सज जाती जब सुंदर दुल्हन बन 
मन आतुर हो जाता है मेरा 
दे दे गरम कॉफी का प्याला मुझको 

बच्चें जो घर में सिकुड़े है 
बन गए हैं वो बेकार घर में 
खुल जाए उनका विद्या मंदिर 
करो उपकार सरकार कुछ तो 

महामारी में कुछ बिखर गया जो 
मिलकर  सिमट सुधा बरसाएगी
मन को ना निराश करो अब तो 
फिर सजेगा सुंदर बाजार सबतो 
नव वर्ष का इंतज़ार है मुझको 


हो गए हैं कुछ अपने जो दूर 
प्रकृति का नियम हैं आना जाना 
 इसको बदल नहीं कोई पाया है 
भले कोई बड़ा विद्वान बना 
पर इसका भेद कहाँ पाया
नव वर्ष का इंतज़ार है मुझको 
-०-
पता: 
रानी प्रियंका वल्लरी
बहादुरगढ (हरियाणा)

-०-

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