*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***

Monday, 1 March 2021

आया रंगो का त्यौहार (कविता) - भुवन बिष्ट

आया रंगो का त्यौहार
(कविता)
होली के रंग अबीर से।
आओ बाँटें मन का प्यार।।
खुशहाली आये जग में।
अब आया रंगों का त्यौहार।।
रंग भरी पिचकारी से अब।
धोयें राग द्वेष का मैल।।
ऊँच नीच की हो न भावना।
उड़े अबीर लाल गुलाल।।
होली के हुड़दंग में भी।
बाँटें मानवता का प्यार।।
खुशहाली आये जग में।
अब आया रंगों का त्यौहार।।
होली के रंग अबीर से।
आओ बाँटें मन का प्यार।।
गुजिया मिठाई की मिठास से।
फैले अब खुशियों की बहार ।।
आओ रंगों की पिचकारी से।
धोयें जग का अत्याचार।।
होली के रंग अबीर से।
आओ बाँटें मन का प्यार।।
खुशहाली आये जग में।
है आये रंगों का त्यौहार।।
बसंत बहार के रंगों से।
ओढ़े धरती है पीतांबरी।।
ईष्या राग द्वेष को त्यागें।
सीचें मानवता की क्यारी।।
रूठे श्याम को भी मनायें।
रंगों से खुशियाँ फैलायें।।
रंगों और पानी से सीखें।
झलक एकता की दिखलायें।।
मानवता का अब हो संचार।
बहे सुख समृद्धि की धार।।
होली के रंग अबीर से।
आओ बाँटें मन का प्यार।।
खुशहाली आये जग में।
अब आया रंगों का त्यौहार।।

-०-
पता- 
भुवन बिष्ट
(रानीखेत) अल्मोड़ा 
(उत्तराखंड)
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Friday, 5 February 2021

लाल हँसिया की धार (कविता) - आदित्य अभिनव

 

लाल हँसिया की धार 
(कविता)
    मैंने देखा 
    कुछ लोग लाल गुलाब को 
    मसल रहे हैं, 
   लाल हँसिया की धार 
   इतनी भोथरी
   हो गई है कि 
   गेहूँ की बालियाँ 
   नहीं कट रही हैं अब।
   मीठी धीमी जहर वाला
   किंगकोबरा 
   अपना फन बढ़ाकर 
   इतना विस्तृत कर लिया है 
   कि उसके छाया तले 
   सारी दुनिया 
   धीरे-धीरे
   मर रही है 
   लेकिन 
   किसी को  अपने मरने का 
   न अहसास है 
   न पछतावा।         
-०-
पता: 
आदित्य अभिनव उर्फ डॉ.  चुम्मन प्रसाद श्रीवास्तव 
कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)

-०-

आदित्य  अभिनव' जी की रचनाएं पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें!

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Sunday, 31 January 2021

*दुख दर्द की आवाज* (कविता) - डॉ. अरविंद श्रीवास्तव 'असीम'

 

 *दुख दर्द की आवाज*

(कविता)

गांव की कच्ची गली से

 जब निकलता हूँ 

 हर समय दुख दर्द की 

आवाज सुनता हूं ।

            यह शिकायत खेत की

             फिर मेघ ने धोखा दिया

               उग सके कुछ खेत में 

               यह हौसला कम कर दिया 

                 मेढ से नजरें चुराकर

                   मैं खिसकता हूं 

               गांव की कच्ची गली से •••

चरमराती चारपाई 

रात भर रोती रही 

और टूटी जूतियां

 कोने में  चुप सोती रही

 देख कर भूखा बुढ़ापा 

मैं तड़पता हूं ।

गांव की कच्ची गली से      •••••

                हो गई है सांझ

                 बापू लौट कर कब आएंगे 

                  दर्द की पीड़ा बहुत है 

                   कब दवाई लाएंगे 

                   इन दुखद अनुभूतियों से 

                   मै नित गुजरता हूं 

             गांव की कच्ची गली से •••••

-०-

पता 
डॉ. अरविंद श्रीवास्तव 'असीम' 
दतिया (मध्य प्रदेश)


-०-

डॉ. अरविंद श्रीवास्तव 'असीम'  जी का लेखन इस ब्लॉग पर पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें.

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Monday, 25 January 2021

आओ गणतंत्र दिवस मनाये हम (कविता) - सुरेश शर्मा


आओ गणतंत्र दिवस मनाये हम
(कविता)
तीन रंगों से सजी सुन्दर तिरंगे से ,
आओ गणतंत्र दिवस मनाये हम ।
भेद भाव से परे हटकर हम सब ,
खुशियाॅ बिखेर दिल से सबको अपनाएं हम ।

तीन रंगों से सजी सुन्दर तिरंगे से , 
आओ भारत मां की शोभा बढाएं हम ।
विश्व की सर्वश्रेष्ठ गणतांत्रिक देश को ,
भाई चारे के प्यारे रंगों से सजाएं हम ।

तीन रंगों से सजी सुन्दर तिरंगे से ,
चारों दिशाओं को अपने गीतों से लुभाएं हम ।
एक दूजे के साथ हाथ मिलाकर ,
अपना 67वां गणतंत्र दिवस मनाएं हम।

तीन रंगों से सजी सुन्दर तिरंगे से , 
एकता और अखंडता का पाठ पढ़ाएं हम ।
जाती धर्म को एक सूत्र मे पिरोकर, 
अपने देश का मान-सम्मान बढाएं हम ।
-०-
सुरेश शर्मा
गुवाहाटी,जिला कामरूप (आसाम)
-०-

 ***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें

Friday, 22 January 2021

कोख की तड़प (कविता) - अनामिका

कोख की तड़प
(कविता)
कुछ छोटे -छोटे पौधे जो
आंगन में उसने रोपें थे
जाने कब वो बन गये पेड़
हिलकर समीर के झोंके से,

उसकी ममता की छाया में
निज तन निहार इठलाते है
अब उसको छाया देते है
उस पर फल फूल लुटाते है,

सूरज क़ी भीषण गर्मी से
ज़ब भी मुरझा से जाते थे
उसका पाकर कोमल स्पर्श
नव जीवन से भर जाते थे,

नवजात शिशु की भांति ही वो
उन पर निज स्नेह लुटाती थी
निज रिक्त कोख की पीड़ा को
वो भूल उसी पल जाती थी,

जैसा रिश्ता माँ बच्चों का
वैसा था उसका पौधों से
पल -पल टूटी थी समाज में
सूनी कोख के विरोधों से।।
-०-

पता: 
अनामिका
खुर्जा (उत्तरप्रदेश) 

-०-

अनामिका' जी की रचनाएं पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें!

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ