*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***

Friday, 7 February 2020

जिंदगी जिंदा लोगों की पहचान है (नज्म) - अनवर हुसैन

जिंदगी जिंदा लोगों की पहचान है

(नज्म)
मुश्किलें हौसलों मे छिपी जान है
जिंदगी जिंदा लोगों की पहचान है

मंजिलों का पता है राहों के कांटे
हटाते चले हम इन्हें जाते - जाते
गुजरने का हमारे यह निशान हैं

जुस्तजू से शुरू हो हर एक आरजू
कर सकेंगे तभी हम खुद से गुफ्तगू
रखें खुद पर यकी रब का फरमान है

दायरा यहां उसने खुद पर बनाया
जिसने अपने मकसद को है भूलाया
जिंदगी के बसर से वह अनजान है

रख हौसला तू कदम तो बढ़ा
हौसले से बिना पंख वह है उड़ा
मुश्किलें हौसलों की हमजबान हैं

बेदार कर लो अपनी समझ को
जरा जान लो तुम अपने मरज को
जो जान ले दर्द वह इंसान है

खुशी, गम,दोस्त, दुश्मन, रहबर
सब किरदार है दरमियांने सफर
चलती जमीन पे सारा जहान है

उम्र भर ख्वाहिशों को जमा होने दिया
कल करेंगे वक्त यूं ही गुजरने दिया
वक्ते आखिर में अब वो क्यों परेशान हैं

हर घड़ी, हर लम्हा आसान है
मुसाफिर अगर अहले इमान है
जिंदगी हमारी एक इम्तिहान है

दो गज जमीन तो सबका मुकाम है
वह मुर्दा यहां है जो गुमनाम है
हमें अताए जिंदगी रब का इनाम है
-०-
पता :- 
अनवर हुसैन 
अजमेर (राजस्थान)

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

मैं जायदाद क्यूँ (कविता) - ज्ञानवती सक्सेना

देदीप्यमान लौ हूँ
(कविता)
हम नदी के दो किनारे हैं
हम नदी के दो किनारे हैं
जब चलना साथ साथ है
तो इतना आघात क्यूँ
तुम ,तुम हो तो
मैं मैं क्यूँ नहीं
मैं धरा हूँ तो
तुम गगन क्यूँ नहीं
मैं बनी उल्लास तो
तुम विलास क्यूँ
मैं परछाई हूँ तुम्हारी
फिर अकेली क्यूँ
तुम एक शख्सियत हो तो
मैं मिल्कियत क्यूँ
तुम एक व्यक्ति हो तो
मैं एक वस्तु क्यूँ
तुम्हारी गरिमा की वजह हूँ मैं फिर इतना अहम् क्यूँ
तुम मेरी कायनात हो तो
मैं जायदाद क्यूँ
मैं सृष्टि हूँ तो
तुम वृष्टि बन जाओ
मैं रचना हूँ तो
तुम संरचना बन जाओ
फिर देखो
पतझड़ भी रिमझिम करेंगे
और बसंत बौराएगी
संघर्ष की पथरीली राह भी मखमली हो जाएगी
नई भोर की अगवानी में
संध्या भी गुनगुनाएगी
पता : 
ज्ञानवती सक्सेना 
जयपुर (राजस्थान)
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

बात छोटीसी मगर बहुत मोटी सी (कहानी) मोनिका शर्मा

बात छोटीसी मगर बहुत मोटी सी
(कहानी)
विधा शादी के बाद पढ़ना नहीं चाहती थी। सोचती अरे शादी तो कर ली, अब कौन आगे पढ़े ? मगर उसे क्या पता था कि उसकी सासू मां उसको एक अध्यापक के रूप में देखना चाहती थी। उसके पिता समान ससुर जी ने उसका दाखिला कानपुर के एक B.ed कॉलेज में कराया। विधा जिसको किसी मुसीबत से कम ना समझती थी थी समझती थी थी । उसे लगता हे भगवान पढ़ाई उसका अभी भी पीछा नहीं छोड़ती । धीरे-धीरे उसने B.Ed की क्लासेस जा जाना शुरू किया ,तभी से पता चला कि वह गर्भवती है । बस तो क्या था उसने मनन से कहा कहा से कहा "अरे, अब इस हालत में कौन कॉलेज जाता है, वहां अपना मजाक थोड़ी ना बनवाना है, अब मैं नहीं करूंगी।"            मनन ने कहा देखो पापा मम्मी की मेहनत के पैसे तुम्हारी इस B.Ed में लगे हैं हैं ,तो B.Ed तो करनी होगी और अपना भविष्य सोचो ना ना, तुम कितनी अच्छी बातें करती हो ,इतनी ही अच्छी अध्यापिका भी बनोगी । विधा सोचती मैंने तो सोचा था बस अब इससे छुटकारा मिलेगा मगर नहीं अभी भी यह गले में घंटी की तरह रहेगी । जैसे तैसे वह उस अवस्था में B.Ed करती है मनन का ट्रांसफर कानपुर से मुंबई हो गया था तो मनन को मुंबई रहता ।विधा ने लाख कोशिश की मगर वह मुंबई ना जा सकी सकी, क्योंकि वह B.Ed रेगुलर कर रही थी ।
            उसने लाख रोना-धोना मचाया अपनी सहेलियों को बताया ,तब उसकी सहेलियों ने कहा" अरे यह कर लो बाद में नौकरी करना या ना करना तुम्हारा मन ,कम से कम 1 डिग्री तो तुम्हारे पास डिग्री डिग्री कम 1 डिग्री तो तुम्हारे पास डिग्री 1 डिग्री तो तुम्हारे पास डिग्री तो तुम्हारे पास होगी, अभी तो तुम्हारी पूरी फैमिली तुम्हारा सपोर्ट कर रही है सपोर्ट कर रही है ,सो कर लो ।
          वह दिन भी आ गया जब उसके बेटे सिद्धार्थ का जन्म हुआ । उसकी डिलीवरी मनन के पास मुंबई में हुए मगर उसे B.Ed की परीक्षा देने के लिए दोबारा कानपुर जाना था । सिद्धार्थ के जन्म के 3 महीने बाद उसे कानपुर लौटना पड़ा लौटना पड़ा । वहां वह अपने सास ससुर के के साथ सिद्धार्थ को लिए रहती थी ,उसके मन में लाख बार आया आया कि वह B.Ed छोड़ दे छोड़ दे छोड़ दे ,मगर वह ना कर पाई।
         एक दिन उसने रोते हुए अपनी सासु मां को कहा कहा की वह अपने पति मनन के साथ मुंबई रहना चाहती है । तब उसकी सासु मां ने ने कहा " देखो मनन के साथ तो तुम हमेशा ही रहोगी तुम हमेशा ही रहोगी ,मगर जिंदगी का यह समय तुम्हारे लिए पछतावा भी बन सकता है और तुम्हारी पहचान भी ,इच्छा तुम्हारी है। मैं कल भी तुम्हारे साथ थी और और आज भी और हमेशा रहूंगी। लेकिन जो अकेला पन मैं ने सहा मैं नहीं चाहती तुम भी वह सब सहो। मैं चाहती थी कि मैं एक अच्छी अध्यापिका बनू। क्या बोलूं मगर उस समय परिवार की स्थिति दूसरी थी ,परंतु मैंने तुम्हारे लिए हमेशा यही सोचा कि मैं मेरी बहू को बेटी बनाऊंगी ,उसे पढ़ा लिखा कर उसके पैरों पर खड़ा उसके पैरों पर खड़ा करूंगी, जिससे उसे मेरी तरह घर में तनहा ना रहना पड़े । तुम रोज तैयार होकर, सुंदर सी साड़ी पहन स्कूल जाओ, सब लोग तुम्हारी पहचान से तुम्हें पहचाने, मेरी यही इच्छा है बाकी तुम्हारा मन जैसा तुम चाहो, मैं तुम्हारे निर्णय में तुम्हारे साथ हूं ।
        उस दिन पहली बार विधा ने वह सब सुना जो उसने कभी ना कभी ना देखा ना सुना ,उसके बाद से उसने सच्चे मन से B.Ed करनी शुरू कर दी और मन ही मन अपनी सासू मां को लाख धन्यवाद दिया कि उनके रहते हैं रहते हैं उसकी B.Ed हुई । B.Ed में वह प्रथम स्थान पर रही तथा कुछ समय बाद एक अच्छी स्कूल में अध्यापिका नियुक्त हुई । 
      जहां उसे बेस्ट टीचर अवार्ड भी मिला । अब जब यह सब याद करती है तो उसे अपनी सासू मां की वह बातें याद आती है कि अगर B.Ed ना करी होती तो वह शायद आज यहां ना होती। उसकी जिंदगी में उसके सास ससुर का बहुत बड़ा योगदान है जिसे वह शिरोधारा करती है तथा मनसे उनको शत-शत नमन करती है।
       मेरे जीवन में मेरे सासु मा का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने मेरा पूरा जीवन ही बदल दिया। जिसके लिए मैं उनकी दिल दिल से बहुत आभारी हूं और यह सभी और महिलाओं के लिए प्रेरणा है कि सासु मां को मां समझे क्योंकि वह सच में घर आने वाली बहू को बेटी ही बनाती हैं।
-०-
पता:
मोनिका शर्मा
गुरूग्राम (हरियाणा)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Thursday, 6 February 2020

“आलोचना से घबरायें नही, बल्कि करें स्वागत (आलेख) - संजय कुमार सुमन

अंतरात्मा की पुकार अनसुनी ना करें
(आलेख)
अक्सर आपको बहुत से लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ता होगा। कभी ऑफिस में, कभी दोस्तों के बीच और कभी कभी परिवार में भी। अपनी आलोचना को सुनना किसी को भी पसंद नहीं होता और ऐसी स्थिति आने पर आप या तो उस आलोचक को ही बुरा भला कहने लगते है या फ़िर इस स्थिति से बचने के लिए आप कोई काम हाथ में ही नहीं लेते। लेकिन अगर आप ने गौर किया हो तो आपके आसपास कुछ ऐसे लोग भी मौजूद है जो अपनी निंदा से बिलकुल बेचैन नहीं होते बल्कि उसे भी अपने लिए प्रशंसा की तरह लेकर आगे बढ़ते है। आप सोच रहे होंगे कि आलोचना को कैसे अपनाया जा सकता है और क्यों? आपने कबीर दास जी का ये दोहा जरूर पढ़ा और सुना होगा…निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। इसी दोहे में छिपा है आपके सवालों का जवाब। तो चलिए, आज आपको एक कहानी के माध्यम से आपकी ऑंखें खोलने का प्रयास करते हैं।
एक जंगल में कई मेंढक रहते थे । एक बार जंगल के दूसरे जानवरों नें सोचा की क्यों ना इन मेंढकों की वृक्ष पर चढ़ने की प्रतियोगिता कराई जाये। इस प्रतियोगिता में मेंढकों को एक ऊंचे चीड़ के वृक्ष के ऊपर चढ़ना था और जो उस वृच्छ की चोटी पर सबसे पहले पहुँचेगा वही विजेता होगा । मेंढकों की दौड़ प्रतियोगिता के अवसर पर जंगल के सभी जानवर आये। वैसे तो इस दौड़ प्रतियोगिता में किसी भी दर्शक को यह विश्वास नहीं था कि कोई भी मेंढक वृछ की चोटी तक पहुँच पायेगा। सारे जानवर प्रतियोगिता शुरू होने से पहले नकारात्मक बातें करने लगे जैसे: आज तक कोई नहीं चढ़ा... ये असंभव है... नहीं चढ़ पाओगे… चोट लगेगी तब पता चलेगा इत्यादि। यह सुनकर कई मेंढक तो प्रतियोगिता छोड़ कर चले गए जब रेस शुरू हुई तो बचे मेंढको ने वृछ पर चढ़ना शुरू किया थोड़ा ऊपर चढ़ने के बाद एक मेंढक गिर गया और उसे चोट लग गयी उसे देखकर फिर कुछ मेंढको ने प्रतियोगिता को वहीँ छोड़ दिया। यह देख कर दर्शक जानवर हंसने लगे और मजाक बनाने लगे यह देखकर दूसरे मेंढको की हिम्मत भी ज़वाब दे गई लेकिन एक मेंढक पूरे जोश के साथ एक शाखा से दूसरी शाखा पर उछलता हुआ वृच्छ की चोटी में पहुँच गया। यह देखकर सभी जानवर अचंभित रह गए। सबने जब उस मेंढक से पूछा तो और अचंभित हुए क्यूंकि वो मेंढक बहरा था जिससे वह किसी की भी बात नहीं सुन पाया और पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रित किया । आपको भी उसी मेंढक की तरह बनना होगा और बिना कुछ दूसरों की सुने अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ना होगा ।

काल मार्क्स मुखर आलोचना में विश्वास रखते थे। उन्होंने पूंजी और पूंजीवाद की आलोचना इसी ढंग से की है। अपने जन्म के 200 साल बाद भी वे दुनिया के सबसे प्रभावशाली ऐतिहासिक व्यक्तित्व बने हुए हैं। उनके विचारों और लेखन में मुखर आलोचना का पुट स्पष्ट तौर पर दिखता है। उदाहरण के लिए उन्होंने 1853 में अंग्रेजों के साम्राज्यवादी स्रोतों पर यकीन किया और उसे इतिहास का अवचेतन औजार माना और उन्हें उम्मीद थी कि इससे भारत का आर्थिक कायाकल्प शुरू होगा। 1881 में उन्होंने कई साक्ष्यों के आधार पर यह स्थापित किया कि अंग्रेज भारत से जो लेते हैं, उसके बराबर नहीं देते बल्कि बदले की भावना से शोषण करते हैं। हालांकि, उनकी अवधारणाएं खुली होती थीं और नए और बदलते हुए ऐतिहासिक परिस्थितियों के हिसाब से स्वीकार किया जा सकता है।
आज सहनशक्ति की उम्मीद नहीं बची है क्योंकि अहंवादी संसार में कोई सुझाव लेना छोड़, सुनना भी नहीं चाहता है। बात इतनी बढ़ जाती है कि अगर किसी में अकेले बदला लेने की ताकत न हो तो वह अपनी-सी सोच वाले चार और का दल बांधकर आता है और आलोचक को प्राणों से हाथ धोने पड़ सकते हैं। गुस्से से भरा व्यक्ति नतीजे की सोचे बिना अपनी और अपने साथ औरों की भी जिंदगियां दाव पर लगा देता है। आलोचक किसी भी तरह का हो, इंसान को प्रिय नहीं होता पर अंतर सिर्फ इतना होता है कि एक व्यक्ति उसकी बात को सुनकर, उस बारे में बार-बार सोचकर, तह तक जाने की कोशिश करता है। उस बात में कोई सार मिलता है तो उसके अनुसार खुद में बदलाव लाने की कोशिश करता है, अन्यथा अनसुना कर देता है। ऐसा करना उसके लिए भी फायदे का होता है क्योंकि कुछ कमियां हरेक में होती हैं। उन्हें पहचान कर बदलाव लाया जा सकता है। डेविड ब्रिंकली की सलाह सर्वोत्तम है, ‘‘एक सफल व्यक्ति वह है जो दूसरों द्वारा अपने पर फैंकी गई ईंटों से एक मजबूत नींव बना सकता है।’’ काश हरेक में वह धैर्य और नम्रता हो, जो आलोचना से लाभ उठा सके।

आदर्शवादी के तौर पर शुरुआत करने वाले मार्क्स ने फ्रेडरिक हिगल और लुडविग फेयुरबैच की आलोचना की। उन्होंने अपने आसपास के भौतिक जीवन की परिस्थितियों को देखते हुए अपना भौतिकवाद गढ़ा। तब से उनके विचार प्रवाह में कोई अटकाव नहीं रहा। कोई भी शुरुआती मार्क्स और बाद के मार्क्स के बीच संबंध जोड़ सकता है। उन पर जर्मन दर्शन, फ्रांसीसी समाजवाद, अंग्रेजों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था और बाद में रूसी लोकप्रियतावाद का प्रभाव था।  आलोचनाओं से विचलित हो जाना स्वाभाविक जरूर है लेकिन अब आपने जान लिया है कि आलोचना हमारी शत्रु नहीं बल्कि मित्र भी बन सकती है। जरुरत है तो सिर्फ अपने नज़रिये को बदलने की और हर काम को बेहतर तरीके से करने की चाहत की। तो बस। आप के अच्छे कार्य की भी कोई आलोचना करें तो उसे करने दो। आलोचना का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं क्योंकि आलोचना से हमारे कर्मों की निर्जरा होती है।दूसरों को नसीहत देना तथा आलोचना करना सबसे आसान काम है लेकिन, सबसे मुश्किल काम है चुप रहना और आलोचना सुनना।
प्रत्येक व्यक्ति द्वारा की गई निंदा सुन लीजिए पर अपना निर्णय सुरक्षित रखिए क्योंकि निंदा सुनने के बाद अगर आप इसे अपने लिए सकारात्मक ढंग से लेते हैं तो यह आपको आगे बढ़ने के लिए टानिक का काम करती है। अगर आप उन सारे पत्थरों को अपने पास रख लेते हैं जिसे लोग आपके ऊपर फेकते हैं तो आप दो तरह से इनका उपयोग कर सकते हैं उन पत्थरों से या तो खुद को घायल कर लें या उनका प्रयोग एक मजबूत स्मारक निर्मित करने में कर लें। एक बात और कि आपको किसी की आलोचना करने का अधिकार तभी है जब आप उसकी सहायता करने की भावना रखते हैं,अन्यथा नहीं। रचनात्मक तरीके से आलोचना को अपने लाभ के लिए उपयोग करने की क्षमता सफलता की मुख्य कुंजी है। सफल भी वही होता है जो दूसरों की आलोचना से एक मजबूत आधार तैयार करता है। याद रखिए जब हम दूसरों पर दोष लगाते हैं या उनकी आलोचना करते हैं तो असल में अपनी उर्जा उनको स्थानांतरित कर देते हैं और उन्हें अपने आप से शक्तिशाली बना देते हैं, इसलिए किसी की बेवजह आलोचना और निंदा करने से बचें। देर किस बात की, आज ही से आलोचना के इन सकारात्मक पहलूओं पर गौर कीजिये और अपनी ज़िन्दगी को खुशनुमा तरीके से आगे बढ़ाते जाइये।
-०-
संजय कुमार सुमन
मधेपुरा (बिहार)
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

पत्नी पीड़ित व्यक्ति कोर्ट में (व्यंग्य) - राम नारायण साहू 'राज'


पत्नी पीड़ित व्यक्ति कोर्ट में
(कविता)
एक पत्नी पीड़ित व्यक्ति कोर्ट में जाता है।
अपनी सम्पूर्ण व्यथा जज को बताता।
आदमी जब पत्नी से तंग आ जाता है।
रात को भी चैन की नींद नही ले पाता है।
पता नही कब रात को उठाकर धुलाई कर दे।
सुबह होने से पहले मेरी सफाई कर दे।
रोज सुबह जोर से चिल्लाकर उठाती है।
और आर्डर की लाइन लगाती है।
कहती है जल्दी से किचन में जाओ।
मेरे लिए चाय बनाकर लाओ।
वर्ना आज तो खैर नही।
इसके सामने पुरानी वैर नही।
बर्तन और कपड़ें धोना तो पुरानी बात हो गई है।
आजकल कामवाली को हटाकर मेरे से झाडूपोछा भी करवाती है।
हर बात बात में जोरदार हड़काती है।
जज साहब आप भी तो एक पति हो
इंसाफ हमे भी दिलाओ।
जज साहब अपने आंसू पोछते हुए बोले
आप मेरी कुर्सी में बैठ जाओ।
और खुद इंसाफ लेलो
क्योकि शाम को मुझे भी घर जाना पड़ता है।
और वही घर से रोज कोर्ट आना पड़ता है।-०-
राम नारायण साहू 'राज'
रायपुर (छत्तीसगढ़)

-०-



***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ