*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***

Wednesday, 19 August 2020

आराधना (कविता) - रूपेश कुमार


आराधना
(कविता)
माँ की छांव में ,
ममता की ममत्व से ,
दिल को छू लेने वाली तू ,
करो आराधना माता की !

जहाँ मिले आत्मा को ,
शान्ति की शान्त स्वभाव मे ,
शरण मे सर्वश्रेष्ट हो,
उस माँ की करो आराधना !

जो दुखों को करती संहार ,
पापियों को करती नाश ,
दुखों मे मेरा साथ देती ,
उस ममतामयी माँ की करो आराधना !

जो विश्व को पालन करती ,
सभी को लालन पालन करती ,
जिसकी दृष्टी मे हम सभी बसते,
उस ममतामयी माँ की करो आराधना!
-०-
पता:
रूपेश कुमार
चैनपुर,सीवान बिहार
-०-


***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

काश! (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


काश!
(कविता)
काश! मेरी जुबान की
कड़वाहट के पीछे
तुम मेरे हृदय की मिठास को
समझ पाते ।

काश! मेरे मुस्काते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे हृदय में दहकती
पीड़ा को समझ पाते।

काश ! मेरे बहते हुए
अश्कों के पीछे
तुम मेरे हृदय में बसी
मेरी कोमल भावनाओं को
समझ पाते।

काश! मेरे खिलखिलाते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे अंतर्मन की
चीखती चिल्लाहट को
समझ पाते।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



राजीव डोगरा जी की रचनाएं पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें! 

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

पूरी दुनिया से हम (ग़ज़ल) - राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'


पूरी दुनिया से हम 
(ग़ज़ल)
पूरी दुनिया से हम अकेले ही हमेशा लड़े।
बिना रुके बिना डरे आगे हम हमेशा बढ़े।।
क़त्ल के पहले दुश्मन ने भी हमको सजदा किया।
जंग में देखा जब अकेले और निहत्थे खड़े।।
पैरों में जूते चाहे हमने न पहने हों मगर।
देखे हैं सपने सदा हमने हैसियत से बड़े।।
जहां में ऐसा कोई काम नहीं किया मैंने।
जिससे हमको समाज में होना शर्मिंदा पड़े।।
वक्त कितना भी बदले और मैं कहीं भी रहूं।
है दुआ पैर हमेशा मेरे जमीं पे पड़ें।।
शौक हमको नहीं है दौलत गाड़ी बंगलों का।
ना ही चाहिए हमें आभूषण हीरे मोती जड़े।।
हम तो पहले भी तनहा थे जहां में "रघुवंशी"।
आज भी तन्हा शौक से उसी जगह हैं खड़े।।
-०-
पता- 
राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'
हमीरपुर (उत्तर प्रदेश)

-०-

राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी' जी की अन्य रचना पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें.

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 


Tuesday, 18 August 2020

मैं ठहरा आदत से मजबूर!! (कविता) - अमन न्याती

मैं ठहरा आदत से मजबूर!!
(कविता)
छत पर कुर्सी लगा ,
रात का सर्द मौसम, ठंडी हवा,
चाँदनी बिखेरता वो आसमाँ का चाँद,
नज़ारे को आँखों मे भर,
कुछ पल के लिए आँखे बंद की मैंने,
बड़ा बेचैन , सुकून ढूंढने की कोशिश में लगा था,
तभी एक शख्श की जुल्फे चेहरे से टकराई,
ना जाने कैसे? हवा में खुशबू और बढ़ने लगी,
मानो किसी फूल को छूकर आ रही हो,
उसका हाथ मेरे हाथ में, उसका सर मेरे काँधे पर,
कभी मुस्कराती ,कभी गुस्सा करती,
वो अपने पूरे दिन का हाल मुझे सुनाने लगी,
मैं बड़ा बेहाल सा उसके हर हाल को सुनने लगा,
मानो सुकून मुकम्मल सा हो रहा हो मेरा,
सब्र का बांध मानो जैसे टूटने को ही था,
मैंने अपनी आंखें खोल डाली,
सब कुछ एक क्षण में ओझल ,
बड़ी बेबसी से मैने उस चाँद को,
और चाँद ने मुझे हँसते हुए देखा,
मानो मुझे कह रहा हो,
क्या जरूरत थी आंखे खोलने की ,
जब एक चाँद खुद तुम्हारे करीब था,
मगर मैं करता भी तो क्या,
आदत से जो मजबूर ठहरा!!
आदत से जो मजबूर ठहरा!!
-०-
पता :
अमन न्याती
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

लौकडाउन में धरती पर भगवान ! (लघुकथा) - सुरेश शर्मा

लौकडाउन में धरती पर भगवान !
(लघुकथा)
"बापू ! आज लौकडाउन का उन्नीसवाॅ दिन है, आज भी ना माँ को भरपेट खाना मिला न ना तुम्हे, और ना ही मैं कुछ खा पाई हूं ।" 'आखिर कब हम लोग इस तरह
गुजारा करेंगे? '
" सरिता बेटी ! मुझे तो चिंता इस बात की है कि तेरी माँ बीमारी की वजह से मरे या ना मरे , मगर भूख से जरूर मर जाएगी , पता नही यह कौन सी बीमारी को चाइना वालों ने हमारे पास भेज दिया और हम सभी लोगों को तकलीफ में डाल दिया । जो लोग पैसे वाले है वह लोग तो अपनी सुख सुविधा जुटा हीं लेते है , मरते हमलोग है दिन मजदूरी करने वाले लोग ।"
" बापू ! भूख से तो हर रोज मेरे पेट में ऐंठन होने लगती है तो एक ग्लास पानी पीकर भूख मिटाती हूं ।"
"क्या करें बेटी ! समय बहुत खराब चल रहा ,देश की परिस्थिति भी बहुत खराब है।"
"बापू ! आखिर कब तक चलेगा ऐसा , सरकार की तरफ से भी कोई मदद नही मिल रही है ।"
"ऐसी बात नही है बेटी ! सरकार हर तरफ से मदद कर रही है , लेकिन हम हीं वहां तक नही पहुंच पा रहे है ।" 
'मोहल्ले मे तो हर रोज सरकारी तथा निजी संस्थाएं मदद देने के लिए चावल , दाल तथा अन्य खाने योग्य सामग्री लेकर तो आ ही रहे है, लेकिन हम ही पुलिस के मार-धार के डर से वापस घर आ जाते है ।'
"लेकिन बापू! घर का राशन खत्म हो गया है और माँ की दवाई भी कितने दिनो से नही है, आज जैसे भी हो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा ।"
"ठीक है सरिता बिटिया ! माँ की दवाई की पर्ची भी दे और एक झोली भी दे, आज जैसे भी हो सामान और तेरी माॅ की दवाईयाँ दोनो लेकर ही आउंगा ।"
रामलाल सरिता से झोली और अपनी पत्नी की दवाई की पर्ची लेकर घर से निकल पड़ा ।
रामलाल शहर के पास के ही एक मोहल्ले मे ही अपनी बीमार पत्नी और अपनी बेटी के साथ रहता था । वह रिक्शा चलाकर अपने छोटे से परिवार की देखभाल करता था ।
लगभग एक घंटे बाद रामलाल वापस अपने मोहल्ले मे बहुत सारा खाने का सामान तथा अपनी पत्नी की दवाई लेकर लौट आया ।
सरिता को अपने घर के दरवाजे पर किसी की आने की आहट सुनाई पड़ी, वह झट से उठी और दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन वह दरवाजा खोल दी । दरवाजे के बाहर रामलाल बहुत सारा सामान लेकर खड़ा था । सरिता के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी और आश्चर्य भी हुई ।
" बापू ! इतना सारा सामान ! तुम कहां से लेकर आए ?"
" बेटी ! इस दुनिया में बहुत सारे ऐसे फरिश्ते है जिसे हम सहज ही पहचान नही पाते है । आज ऐसे ही एक फरिश्ते ने खाने का सारा सामान और तेरी माॅ की दवाई भी खरीद कर दी ।"
सरिता यह बात सुनकर फट से घर के अन्दर जाकर भगवान के फोटो के सामने नतमस्तक होकर बोली " भगवान ! आज तेरा लाख लाख शुक्र है , नही तो पता नही हमारा क्या होता ? "
'सरिता बेटी , तुम्हारा जो यह भगवान है हमारे पास पहुंचने मे बहुत देर करते है , समय पर हमारी मदद "इस धरती का भगवान" ही करता है ।"
फिर रामलाल ने बताया कि एक दिन एक सवारी को अपने रिक्शे पर बैठाकर उनके घर छोड़ने गया था, जब वह छोड़कर वापस आ रहा था कि वह अपने रिक्शे मे एक काली रंग की छोटी सी बैंग को गिरा हुआ देखा ।
रामलाल को समझते देर नही लगी कि वह बैग उसी सज्जन का था जिसे उसने अभी अभी घर छोड़कर आया था ।वह वापस उस व्यक्ति के घर गया और वह बैग उसी सज्जन को लौटा दिया । वह सज्जन रामलाल की इमानदारी से काफी प्रभावित हुआ और रामलाल को कुछ पैसे देने की कोशिश की लेकिन वह कुछ भी लेने से इंकार कर दिया ।
" बेटी आज वही साहब मिल गये थे , वो मुझे देखते ही पहचान गये लेकिन मै ही उन्हे पहचान नही पाया ।
उन्होंने मुझसे से पूछा "अरे ! कहां जा रहे हो ?"
फिर मैने सबकुछ उन्हे बताया ।
उन्होंने कहा " कोई बात नही है , चिंता मत करो ।"
फिर उन्होंने दो महीने के लिए सारा राशन का सामान भी खरीद दिया और तेरी माॅ की दवाई भी खरीद कर दी । मेरे लाख मना करने के बावजूद भी उन्होंने ये सारा सामान खरीद कर मुझे घर तक भी छोड़कर गये ।
"लौकडाउन खत्म होने के बाद उन्होंने कहा कि तुम्हे भी कोई नौकरी लगवा देंगे बेटी !
सरिता बोली " बापू ! सचमुच वह अंकल इस धरती पर " धरती का भगवान " हीं है ।
" हां बेटी ! तू ठीक बोल रही है ।"
-०-
सुरेश शर्मा
गुवाहाटी,जिला कामरूप (आसाम)
-०-

 ***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ