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Saturday, 3 October 2020

तेरा आना जाना हुआ (गीत) - राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'


तेरा आना जाना हुआ 
(गीत)
दिल में जब से तेरा आना जाना हुआ,
मैं तभी से तो पागल दीवाना हुआ।
था हकीकत मैं पहले जहां में सुनो,
अब महज़ मैं तो बस एक फसाना हुआ।
बनके धड़कन तुम दिल की धड़कती हो पर,
हर घड़ी फिर मुझे तुम सताती हो क्यों?
अच्छी लगती हैं तुमको जो ये दूरियां,
फिर मेरे ख्वाबों में आती जाती हो क्यों??
प्यार में तेरे मैं इस कदर खो गया,
अब तो खुद से मिले एक जमाना हुआ।
था हकीकत मैं पहले जहां में सुनो,
अब महज़ मैं तो बस एक फसाना हुआ।।
दिल में जब से तेरा आना जाना हुआ,
मैं तभी से तो पागल दीवाना हुआ..
जब तूने छोड़ा हमको मेरे हमसफर,
टूटकर सीसे सा मैं बिखरने लगा।
जख़्म तुमने मेरे दिल को इतने दिए,
मैं तेरा दर्द सहकर निखरने लगा।।
जब से गीतों में मैं तुमको लिखने लगा,
पास गीतों का मेरे खजाना हुआ।।
था हकीकत मैं पहले जहां में सुनो,
अब महज़ मैं तो बस एक फसाना हुआ।।
दिल में जब से तेरा आना जाना हुआ,
मैं तभी से तो पागल दीवाना हुआ..
-०-
पता- 
राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'
हमीरपुर (उत्तर प्रदेश)

-०-

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पिंजरा (कहानी) - प्रिया वाच्छानी

पिंजरा
(कहानी)
उफ्फ्फ ...खाना बनाते-बनाते बड़ी देर हो गई आज तो। स्नेहा खुद से ही बड़बड़ाने लगी।
सिद्धि..... सिद्धि बच्चे खाना ले लो आकर मैं रोटी उतार रही हूँ। मगर सिद्धि तो कान में इयरफोन लगा कोई सीरीज देखने में व्यस्त थी। यह बच्चे भी ना कुछ नहीं सुनते, सब चीजें इनको हाथ में चाहिए 
कहते हुए खाने की प्लेट स्नेहा खुद ही ले आई।
"कितनी बार आवाज दी है तुम्हें सुनाई नहीं देता!"  सिद्धि के कान से एयरफोन निकालते हुए स्नेहा ने कहा।
"क्या हुआ !  ले लेती न मैं खुद ही खाना, जानती हो कितनी इंटरेस्टिंग सीरीज देख रही हूं।"
"तुम और तुम्हारी यह सीरीज,  भगवान ही बचाए इनसे। कभी यह नहीं होता कि मां की मदद ही कर दो।"
"यू आर वेरी स्वीट मम्मा", सिद्धि मस्का लगाते हुए मां के गले लग गई।
"ठीक है.. ठीक है ..मस्का लगाने की जरूरत नहीं, चलो खाना खा लो।"
इतने में स्नेहा के मोबाइल पर मैसेज ब्लिंक हुआ।
"क्या बन रहा है?" 
 सामने प्रणय का मैसेज देख स्नेहा की आंखों और चेहरे पर हल्की स्माइल आ गई। उस एक मैसेज के आते ही जैसे काम का सारा स्ट्रेस ही खत्म हो गया था उसके चेहरे से। स्नेहा ने मोबाइल उठा पहले जवाब टाइप किया। 'कुछ खास नहीं, बस दाल फ्राई और आलू गोभी की सब्जी'
'आलू गोभी की सब्जी !!! वाओ ...मेरी फेवरेट है।'
'तो आ जाओ खाने'
'सच !! आ जाऊं ?'
'हां, आ जाओ कह तो रही हूं।'
'अच्छा जी!!  यह जानते हुए भी कि नहीं आ सकता, मेरी जान जलाई जा रही है।'  स्नेहा मुस्कुराती हुई स्माइली भेजती है 
'ठीक है ... पूरा बदला लिया जाएगा एक साथ। ओके ...तो शाम को मिलते हैं, ठीक पांच बजे।'
'सुनो ... आज थोड़ा जल्दी नहीं हो सकता ?'
'जल्दी क्यों ? कितने बजे तक ?'
 'चार बजे तक‌।'
 'ओके तो चार बजे मिलते हैं ।'
'पर जल्दी निकल पाओगे न ? कोई दिक्कत तो नहीं होगी?'
'कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं मैनेज कर लूंगा। एनीथिंग फॉर यू', 
और आंख मारने वाला इमोजी भेज प्रणय ऑफलाइन हो गया।
     सवा चार बजने को थे। स्नेहा बेताबी से इंतजार कर रही थी। साथ ही उसके मन में उधेड़बुन भी चल रही थी।
क्या जरूरत थी मुझे ऐसा कहने की?  मैं भी ना गधी हूं गधी .. चुप भी नहीं रह सकती.. पता नहीं प्रणय निकल पाएगा भी कि नहीं?  बेकार उसे तकलीफ दी,  चार की जगह पांच बजे निकलता तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता?  पर मैं भी क्या करूं, दिल के हाथों मजबूर हो गई !! सोचा यह भी थोड़ा एक्स्ट्रा टाइम मिल जाएगा साथ बिताने के लिए।  वैसे भी हम और चाहते भी क्या हैं एक दूसरे से थोड़े से समय के अलावा !!! मगर अब तक प्रणय निकला क्यों नहीं है ? शायद कोई काम आ गया होगा। मगर ऐसा भी क्या काम ? एक दिन के लिए काम को पोस्टपोंड नहीं कर सकता क्या ? बस इतनी कदर है मेरी एक दिन एक घंटा मैनेज नहीं कर सकता ? पर वैसे बेचारा करता तो है !! जब भी जैसे भी समय मिलता है याद जरूर करता है।  खुद से ही सवाल पूछ खुद ही जवाब देने में उलझी स्नेहा बार-बार मोबाइल की तरफ देखती। इतने में मोबाइल की घंटी बजी स्क्रीन पर प्रणय का नाम देखें मन को सुकून मिला।  बिना एक पल भी गंवाए उसने झट से कॉल रिसीव की। 
स्नेहा के हेल्लो कहते ही प्रणय बोला, "सॉरी यार निकलते-निकलते बॉस ने कुछ काम दे दिया। और देर हो गई ।"
प्रणय की आवाज सुनते ही इतनी देर का गुस्सा स्नेहा भूल गयी, "कोई बात नहीं हो जाता है। मैं भी बस अभी फ्री हुई थी।"
"अच्छा जी!!! मतलब मुझे मिस न किया गया ? बेकार गया देर से निकलना... मुझे लग रहा था थोड़ी देर से जाऊंगा तो हमारा बेसब्री से इंतजार हो रहा होगा।" प्रणय ने चुटकी ली।
"अच्छा जी!! तो इसीलिए जनाब ने देर की !! ताकि उनका इंतजार किया जाए ?" स्नेहा ने भी इसी अंदाज में कहा तो दोनों हंस पड़े
 "स्नेहा, तुमसे बात करते हुए कैसे समय बीत जाता है पता ही नहीं चलता। कुछ देर के लिए सारी उलझनें, सारी परेशानियां जैसे भूल जाता हूं मैं। एक अलग ही जहान में खो जाता हूं।"
"मैं भी तो यही महसूस करती हूं ना प्रणय !! कुछ देर के लिए अपनी मर्जी से जी लेती हूं, जो चाहे कह सकती हूं तुम्हें । वह सारी बातें जो शायद दुनिया में किसी से भी नहीं बांट सकती, वह बातें तुमसे बिना हिचक के बांट लेती हूं। न जाने कैसा रिश्ता है अपना !! कोई बंधन नहीं फिर भी बंधे हुए हैं।"
 प्रणय ने गाड़ी किनारे रोक ली थी
 "मगर प्रणय ..क्या दुनिया कभी हमारे रिश्ते को समझ पाएगी ?" 
"ना समझे स्नेहा !! हमें किसी को समझाना भी नहीं। हम दोनों जानते हैं हम गलत नहीं हम दोनों समझते हैं बस इतना काफी है। तो अब इजाजत है.. चलूं मैं ?"
"जैसे मेरे कहने से रुक जाओगे !! स्नेहा ने बनावटी गुस्से से कहा 
शायद रुक भी जाऊं !!"
"अच्छा जी!! अभी जाने दो, फिर किसी दिन देखूंगी, रुकते हो या नहीं 
ओके ..बाय"
"बाय ...!" के साथ ही फोन डिस्कनेक्ट हो गया 
प्रणय गाड़ी में ही बैठा सोचता रहा
 क्या है हम दोनों का रिश्ता !! क्या दुनिया या हमारे घर वाले कभी इस रिश्ते को समझ पाएंगे ? शायद नहीं !! तभी उसका ध्यान गाड़ी में चल रहे गाने के बोलो पर गया ।
मैनू पता है दुनिया नू ..ऐ गवारा नहीं हो सकदा.... पर झूठ कह दे ने सारे कि प्यार दोबारा नहीं हो सकता..... मैं किसी और का हूं फिलहाल ....गाने के संग गुनगुनाते हुए वह आगे बढ़ गया
        रात के साढ़े ग्यारह बजने आए थे। घर के काम निपटा स्नेहा ने नींद के इंतज़ार में जब तक मोबाइल उठाया। थोड़ी देर में ही सामने प्रणय का मैसेज ब्लिंक हुआ।
सीरियल चल रहा है ? स्नेहा ने चुपके से पति की ओर देखा। उन्हें गहरी नींद में देख स्नेहा ने चैन की सांस ली। जवाब दिया, 'नहीं... सीरियल तो नहीं चल रहा .. पर क्या सीरीज भी नहीं चल रही ?'
 प्रणय ने स्माइली के साथ... सीरीज भी नहीं चल रही का मैसेज भेजा और दोनों साथ हंस पड़े।
"अब तक जाग रही हो !! सुबह जल्दी नहीं उठना क्या ?"
"बस सोने ही जा रही थी। पर आज न जाने क्यों आंखों से नींद गायब है।"
"किसने उड़ाई नींद ? जरा नाम तो बताना ?"
"क्यों किसी का नाम लेकर उसे रुसवा करूँ ? तुम क्यों नहीं सोए अब तक ?"
 मगर प्रणय अचानक ऑफलाइन हो गया। स्नेहा ने मैसेज का थोड़ी देर इंतजार किया मगर कोई मैसेज ना आया तो वह भी मोबइल बंद कर सो गई। सुबह प्रणय का सिर्फ एक मैसेज आया।
"जब तक मैं ना करूं तब तक किसी तरह से कांटेक्ट मत करना।"
 यह पढ़ स्नेहा थोड़ा सकते में आ गई। कितने सवाल एक साथ ज़हन में कौंधने लगे।
क्या हुआ होगा ? कहीं उसकी पत्नी ने तो न देख लिया मुझसे बात करते हुए ? पर उसने तो कहा था वह सो रही है। कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं हो गयी ? कहीं कोई और बात तो नहीं हो गई ? हे ईश्वर !! घर में सब ठीक रखना, कोई दिक्कत न हो। इसी सोच में पूरा दिन बीत गया। पर न प्रणय का मैसेज आया ना ही कॉल। स्नेहा इंतजार के अलावा कुछ और कर भी न सकती थी। तीसरे दिन एक अनजान नंबर से फोन आता है। सामने प्रणय की आवाज सुन स्नेहा ने सवालों की बौछार लगा दी। 
"क्या बात है ? सब ठीक तो है ? क्या हो गया अचानक? तुम कहां गायब हो गए हो दो दिनों से? सोच सोच कर मैं तो परेशान हो गई । घर में सब ठीक तो है ना ?" 
आज प्रणय की आवाज में ठहराव सा था ।
"सब ठीक है स्नेहा , और कुछ भी ठीक नहीं।" 
"हुआ क्या !! यह तो बताओ ।"
"उस रात को तुम से बात करते वक्त पीछे न जाने कब मेरा बेटा आ गया । और मुझे पता ही नहीं चला। उसने मुझे तुमसे बात करते हुए देख लिया। और उसने हमारी सारी चैट देख ली। वो बहुत गुस्से में आ गया और मुझसे सवाल- जवाब करने लगा । उसकी आवाज सुन मेरी पत्नी भी जाग गई । और बहुत तमाशा हुआ।"
"फिर... फिर क्या हुआ ? स्नेहा अंदर तक सिहर गई।"
"होना क्या था !!! दोनों ने मिलकर मुझे खूब खरी-खोटी सुनाई.... मुझे मेरी उम्र का एहसास दिलाया... साथ ही यह भी याद दिलाया कि अब मैं एक पति हूं, बाप हूं इसलिए मुझे अपनी जिंदगी जीने का अधिकार नहीं है। न ही खुश होने का न ही किसी से दोस्ती तक करने का।"
प्रणय एक एक शब्द जैसे चबाते हुए बोलता जा रहा था। स्नेहा बिल्कुल ब्लैंक हो चुकी थी। उसकी आंखों से आँसूं रुकने का नाम ले रहे थे। प्रणय बोलता रहा।
"जानती हो स्नेहा!!  यही है हमारा समाज ..यही है हमारे समाज की सोच... यहाँ हर कोई जो खुद करे वह सही पर सामने वाला जो करे वह गलत करार कर दिया जाता है।  जैसे हम तालाब की मछलियां बन गए हैं...हमें हर हाल में इस तालाब में ही रहना है। चाहे इस तालाब में हमारा दम ही क्यों न घुट जाए ...हम सांस लेने तक बाहर नहीं आ सकते।"
 "हां प्रणय !!!  हम मां-बाप हैं। हम किसी के पति/ पत्नी हैं... हम इस समाज रूपी तालाब की मछलियां ही हैं । या यूं समझ लो पिंजरे में बंद कोई पक्षी ... जिसके पिंजरे को बालकनी में तो लटकाया जा सकता है मगर उस पर अगर कोई आजाद परिंदा आकर बैठे तो उसे उड़ा दिया जाता है। क्योंकि कहीं वो उस परिंदे को उड़ने के सपने न दिखाए ....उस कैद पंछी का तो सपने देखने का भी अधिकार नहीं रहता....
दोनों तरफ कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा पसर गया...शायद फोन पर भी और जिंदगी में भी।"
-०-
पता:
प्रिया वाच्छानी
उल्हासनगर, मुंबई (महाराष्ट्र)
व
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नदी (कविता) - शिवशंकर लोध राजपूत

नदी
(कविता)
हिमालय पर्वत से निकलकर कल कल, 
निरंतर बहने वाली निर्मल मन से !
पर्वत मेरे माता-पिता,यही मेरी उत्पत्ति
बड़े लाड प्यार से पाला मुझको!!
बड़ी हुई तो बाबुल का आंगन छोडी
मानव,जीव जंतु की प्यास बुझाने निकली!
अनेक कष्टों को सहकर, बाधाओं को पार करती
निरंतर अपने पथ पर आगे बढ़ती!!
धन-अनाज उगाकर सबका पेट हूँ भरती 
सर्वत्र हरियाली ही हरियाली फैलाती!
मनुष्य ने ना समझा मेरा महत्व
मनुष्य ने छीना मेरा अस्तित्व!!
गंगा-जमुना बनकर, सबका उद्धार हूं करती
स्वच्छ की जगह दूषित किया मेरा मन!
मनुष्य, जीव-जंतु,वनस्पति,
रहते मुझ पर आश्रित!!
कूड़े कचरे से पट जाऊंगी
तो तुम्हें जीवन कैसे दे पाऊंगी!
स्वार्थ भाव से देखोगे मुझको
हरियाली धरा पर कहां पाओगे!!
-०-
पता:
शिवशंकर लोध राजपूत
दिल्ली

 
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Friday, 2 October 2020

महात्मा के महात्मा (आलेख) - डाॅ. महेंद्रकुमार जैन ‘मनुज’

 

महात्मा के महात्मा
(आलेख)
महात्मागांधी जी छवि भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, मार्गदर्शक एवं समाज सुधारक के रूप में सामने आती है। गांधीजी ने देश के निर्माण में जिस शस्त्र के बलबूते पर अहम भूमिका निभाई वह है अहिंसा। 
महात्मागांधी अनासक्त कर्मयोगी साधक थे। कार्यनिपुणता, वाकपटुता, शालीनता, अच्छे श्रोता, राजनेता ही नहीं वे वास्तविक रूप में जननेता थे। आदर्श तो ऐसे कि जब उनके पास एक महिला अपने बच्चे को गुड़ अधिक खाने की शिकायत लेकर आई तब उन्होंने उससे कुछ दिन बाद में आने को कहा। इस अवधि में उन्होंने गुड़ खाना छोड़ा, जब वह महिला पुनः आई तब उन्होंने उसके बच्चे को अधिक गुड़ न खाने की सलाह दी। कुछ दिन बाद बुलाये जाने का कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उस समय वे स्वयं गुड़ खाते थे तो बच्चे को मना कैसे कर सकते थे। ये थी गांधी जी की आदर्शप्रस्तुतीकरण की शैली। आज पिता स्वयं सिगरेट फूंकता हो और बेटे से कहे कि धूम्रपान मत करना, वह हानिकारक होता है, तो कैसे प्रभाव पड़े। गांधी जी की सभी क्षेत्रों में दक्षता थी।
वे पर पीड़ा को अपनी पीड़ा समझ कर परमार्थ में लगे। बापू आज जितने प्रासंगिक हैं शायद आने वाले कई दशकों बाद चर्चा चले कि एक फक्कड़ साधु ने अहिंसा से हिंदुस्तान को स्वतंत्रता दिलाई तो विश्वास करना उस पीढ़ी के लिए कठिन होगा। आज की पीढ़ी के लिए भी बापू किसी रहस्य या अजूबे से कम नहीं हैं।
महात्मागाँधी जी के परिवार पर जैन धर्म का प्रभाव होने के कारण उन पर भी बाल्यकाल से जैन धर्म का प्रभाव रहा। वे प्रारम्भ से ही शाकाहारी रहे। आत्मशुद्धि के लिए वे उपवास को महत्व देते थे। और उनके संस्कार जैन धर्म से बहुत प्रभावित थे। वे जैन विद्वानों केे निरन्तर सम्पर्क में रहते थे।
महात्मा गांधीजी श्रीमद्जी को धर्म के सम्बन्ध में अपना मार्गदर्शक मानते थे। वे लिखते हैं-
‘मुझ पर तीन पुरुषों ने गहरा प्रभाव डाला है- टाल्सटॉय, रस्किन और रायचन्द भाई। टाल्सटॉय ने अपनी पुस्तकों द्वारा और उनके साथ थोड़े पत्रव्यवहार से, रस्किन ने अपनी एक ही पुस्तक ‘अन्टु दि लास्ट’ से-जिसका गुजराती नाम मैंने ‘सर्वोदय’ रखा है, और रायचन्द भाई ने अपने गाढ परिचय से। जब मुझे हिन्दुधर्म में शंका पैदा हुई उस समय उसके निवारण करने में मदद करने वाले रायचन्दभाई थे।’
श्रीमद्रायचंद्र जिन्हें गांधी जी रायचन्द्र भाई कहते थे और कभी कभी वे उन्हें कवि भी लिखते हैं- का प्रभाव गांधीजी पर अधिक रहा। श्रीमद्रायचंद्र का जन्म भी सौराष्ट्र के ववाणिया बंदर नामक स्थान में हुआ था। बाद में भी इनका कार्यक्षेत्र भावनगर और जामनगर रहा। ये सब क्षेत्र महात्मागांधी जी के जन्म व कार्यक्षेत्र रहे हैं इस कारण से भी रायचन्द्र जी से महात्मा गांधी का सम्पर्क निरन्तर रहा।
श्रीमद्जी शतावधनी थे। शतावधान अर्थात् सौ कामों को एक साथ करना। जैसे शतरंज खेलते जाना, माला के मनके गिनते जाना, जोड़ बाकी गुणाकार एवं भागाकार मन में गिनते जाना, आठ नई समस्याओं की पूर्ति करना, सोलह निर्दिष्ट नये विषयों पर निर्दिष्ट छन्द में कविता करते जाना, सोलह भाषाओं के अनुक्रमविहीन चार सौ शब्द कर्ताकर्म सहित पुनः अनुक्रमबद्ध कह सुनाना आदि। महात्मा गांधीने रायचन्द्र जी से सौ प्रश्न पूछे और रायचन्द्र जी ने उन्हें उसी क्रम में उत्तर दिया। तब से गांधी जी रायचन्द्र जी के मुरीद हो गये थे।
गांधीजी ने श्रीमद् राजचन्द्र के विषय में कई पत्र लिखे। एक जगह वे लिखते हैं ‘जो वैराग्य (अपूर्व अवसर एवो क्यारे आवशे) इस काव्य की कड़ियों में झलक रहा है वह मैंने उनके दो वर्ष के गाढ़ परिचय में प्रतिक्षण उनमें देखा है। उनके लेखों में एक असाधारणता यह है कि उन्होंने जो अनुभव किया वही लिखा है। उसमें कहीं भी कृत्रिमता नहीं है। दूसरे पर प्रभाव डालने के लिये एक पंक्ति भी लिखी हो ऐसा मैंने नहीं देखा।’ ‘खाते, बैठते, सोते, प्रत्येक क्रिया करते उनमें वैराग्य तो होता ही। किसी समय इस जगत के किसी भी वैभव में उन्हें मोह हुआ हो ऐसा मैंने नहीं देखा।’
‘व्यवहारकुशलता और धर्मपरायणता का जितना उत्तम मेल मैंने कवि में देखा उतना किसी अन्य में नहीं देखा।’ 
यही अहिंसा और आत्मशक्ति हेतु उपवास के संस्कारों को गांधी जी ने स्वतंत्रता आन्दोलन के हथियार बना लिया।
गांधी जी सबसे बड़े निष्काम कर्मयोगी थे, किन्तु उन्होंने न कभी सन्यासी का चोला पहना, न पहनने दिया। उन्होंने जब अहमदाबाद में साबरमती आश्रम शुरु किया तो एक सन्यासी सत्यदेव महाराज गांधीजी से मिलने आए। गांधीजी के जीवन और आदर्श से प्रेरित होकर सत्यदेव ने गांधीजी के साथ आश्रम में रहने की अनुमति मांगी और उन्होंने कहा कि मैं आपके साथ रहकर देश की आजादी के लिए और समाज सेवा के लिए आश्रम में रहना चाहता हूँ। गांधीजी ने स्वामी सत्यदेव जी को आश्रम में रहने के लिए अनुमति तो दे दी लेकिन उनके सामने एक शर्त रखते हुए कहा कि यह सन्यासी का चोला उतारना पड़ेगा और जनसामान्य की सादा पोशाक पहननी पड़ेगी। गांधीजी ने उनसे कहा कि ‘वे धर्म छोड़ने के लिए नहीं कह रहे हैं, केवल सन्यासी का चोला छोड़ने को कह रहे हैं। क्योंकि आश्रम लोगों की सेवा के लिए चला रहे हैं। आपको भी सेवा करनी होगी। अगर यह सन्यासी का चोला धारण किये रहेंगे तो सभी लोग आपकी सेवा में लग जायेंगे और आप जन सामान्य की सेवा नहीं कर पाओगे।’ स्वामी सत्यदेव गांधीजी की बात सुनकर आश्रम छोड़कर चले गए थे। 
गांधीजी के करिश्माई नेतृत्व के कारण हर वर्ग युवा, प्रौढ, व्यापारी, शिक्षित, महिलाएं, उद्योगपति, धार्मिक, पत्रकार उनसे प्रभावित था। रक्तपात का उनकी नैतिक दृष्टि में कोई स्थान नहीं था। परपीड़ा को अपनी पीड़ा समझ कर जनसाधारण के प्रति प्रेम ही गांधीजी की प्रमुख पूंजी थी।
-०-
पता:
डाॅ. महेंद्रकुमार जैन ‘मनुज’
इंदौर (मध्यप्रदेश)

 

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☆☆आजादी के दीवाने☆☆ (गीत) - अनवर हुसैन

☆☆आजादी के दीवाने☆☆  
(कविता)
आजादी   के   दीवानों   जो,
सर  बांधे  कफ़न  निकले थे
लहू  में मिला  के अपने  जो,
आजादी   वतन   निकले  थे
सरफरोश थी जिनकी तमन्ना,
दिलों में  आज भी  जिंदा है।
सच बताओ पाके आजादी,
हम आज भी क्यूं शर्मिंदा है।

इंकलाब का दे के नारा,
इंकलाब  जो   लाए  थे
जिन के बनाए  बमों से,
दुश्मन  भी  घबराएं  थे
आजादी के दीवानों की,
यादें आज भी जिंदा है।
सच बताओ पाके आजादी,
हम आज भी क्यूं शर्मिंदा है।

भारत मां की अस्मिता जिनको,
जान   से   अपनी    प्यारी  थी
हंस के कफ़न पहनने की यारों,
जिन के   लहू   में  खुमारी  थी
माटी के फरजंदो का,इंकलाब
आज   भी   यारों   जिंदा  है ।
सच बताओ पाके आजादी,
हम आज भी क्यूं शर्मिंदा है।

पहने  झोला  वो  बसंती ,
देते कौमी तराना बढ़ गए
हाथों   में   लिए   तिरंगा ,
सूली  पे  हंसते  चढ़  गए
राष्ट्र प्रेम की  जली चिंगारी,
दिलों में आज भी जिंदा है।
सच बताओ पाके आजादी,
हम आज भी क्यूं शर्मिंदा है।

अमर  हुए  मतवाले, दीवाने,
पाके शहादत वतनपरस्ती में
नाम   सुनहरा   कर   लिया
सब , दीवानों  की  बस्ती  में
हर दिल में  उन दीवानों की,
जोत  आज   भी  जिंदा  है।
सच बताओ पाके आजादी,
हम आज भी क्यूं शर्मिंदा है।
-०-
पता :- 
अनवर हुसैन 
अजमेर (राजस्थान)

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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ