घन बरसे
घनन घनन गरजत घन बरसे ।
हरित-सुमित वन, वृक्ष, लताएँ,
पंछी थिरकेँ, कूँजें, गाएँ ।
साँझ रसीली भीगी सर से ।
चमन- चमन भर-भर घन बरसे।
घनन घनन गरजत घन बरसे ।
इंद्रधनुष उतरा नयनन में,
रही बिजुरिया कौंध गगग में।
नदिया करे मिलन सागर से।
सघन-सघन, पल-पल घन बरसे।
घनन घनन गरजत घन बरसे ।
नृत्य अनूठा वन-मयूर का,
गीत सुरीला मन-मयूर का।
सकल जगत आनंदित हरषे।
गगन-गगन तड़ -तड़ घन बरसे।
घनन घनन गरजत घन बरसे ।
झिरमिर-झिरमिर , रिमझिम-रिमझिम,
दिन पखवाड़े गिन-गिन, गिन-गिन,
सखि ! पियु के दरसन मन तरसे।
नयन-नयन भर-भर घन बरसे।
घनन घनन गरजत घन बरसे ।
पता:
विमल मेहरा
जोधपुर (राजस्थान)
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