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Friday, 9 October 2020

तुम जिम्नेदार हो (कविता) - सपना परिहार

तुम जिम्नेदार हो
(कविता)
नानी भी अपनी माँ से
सीखी होंगी दबना,झुकना,
नानी से माँ ,तुमने भी सीखा
लड़कियों को सलीक़े में रखना,
ढेर सारी हिदायतों में रखना,,!
न खुल कर मुस्कुराना,
न आत्मविश्वास से चलना,
न किसी को मुँह तोड़ जवाब देना,
क्यों... माँ,,,क्यों...?
क्यों नहीं सिखाया तुमनें
सीना तान के चलना,
पुरुष प्रधान समाज में
सम्मान और हक से जीना,
और,,, सबसे बड़ी बात,
अपने जिस्म को घूरने और
छूने वाले दरिंदे को
उसी समय उसके पुरुष होने का
अभिमान काट गिराने का,
जिसे वो हक समझता है,
किसी भी स्त्री का शील भंग करना,,!
माँ,,, क्यों करे हर बेटी प्रतीक्षा
उसे न्याय मिलने का!
जो कभी समय पर मिलता नहीं,,!
माँ,, बेटी को आज आग बनने दो,!
जिसे छूने की कोई भी करे हिम्मत
तो,,,, झुलस जाए उस अंगार में,
और,,, किसी भी स्त्री को कभी
न छू सके,,,गलत इरादे से,,!

-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


-०-
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Monday, 14 September 2020

हिंदी दिवस पर विशेष (व्यंग्य) - सपना परिहार

हिंदी दिवस पर विशेष
(कविता)
हम कक्षा पहली में पढ़ते थे
अनार,आम सीखते थे।
स्वर, व्यंजन और बारहखड़ी
बड़े मजे से पढ़ते थे।
जैसे-जैसे बड़े हुए
हुआ शिक्षा का ज्ञान
हिंदी भाषा प्रिय लगी
किया उसका सम्मान।
संज्ञा,सर्वनाम,सन्धि ,समास
दिन भर रटते रहते थे
हिंदी विषय में जान लगाते
फिर भी पूरे नम्बर न मिलते थे।
आज के बच्चे अब हमसे
ज्यादा  नम्बर पाते है
क्या पता हिंदी जैसे कठिन
विषय में
सौ में से सौ नम्बर कैसे आते हैं?
कम्प्यूटर के इस युग की
कुछ बात मुझे समझ नहीं आती है?
हमारे समय मे हिंदी की उत्तर पुस्तिका
जाँचते समय पूरी लाल हो जाती थी
आज के बच्चों की पुस्तिका में 
शिक्षक को कोई त्रुटि नजर नहीं आती है।
कहने को तो मातृभाषा है हिंदी
पर लिखना,पढ़ना,भूल रहे सब
अंग्रेजी इतनीं हावी हो गयी
हिंदी बोलना भूल रहे हैं।
अध्ययन तक ही सीमित हिंदी
पाठ्यक्रम से बाहर नहीं
पाठ पढ़ाये रटे-रटाये
ऐसे शिक्षकों की भी कमी नहीं।
अभिवादन के नाम पर
अंग्रेजी का बोलबाला है
हस्ताक्षर के नाम पर आज
हर कोई सिग्नेचर करने वाला है।
मेरे देश की ये कैसी विडंबना हो गयी है
हिंदी बोलने वालों की पहचान
गवाँर की श्रेणी में हो गयी है।
जिसे आज के समय मे अंग्रेजी नहीं आती
उसकी समाज मे पूछ परख नहीं की जाती।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


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Tuesday, 27 October 2020

याद का दीपक (कविता) - सपना परिहार

 

याद का दीपक
(कविता)
याद का दीपक जलता है
कोई चुपके-चुपके पिघलता है
रहता है अक्सर तन्हाई में वो
पर मुँह से उफ़्फ़ तक न कहता है।
उम्मीद का दिया जलाया है उसने
मन मे ढेर सारी आस लिए
न सोता है वो इस इंतजार में
वो आएगा जरूर ये दिल कहता है।
सुबह सूनी है,शाम अधूरी लगती है
शायद उसकी कोई मजबूरी लगती है
अंतिम साँस तक ये दिया जलेगा
तुमसे मेरा मन ये कहता है।
उसके बिना जीवन मे अंधियारा है
उसके होने से दीवाली का उजियारा है
काली अमावस भी पूनम हो जाती है
जो वो मेरे आस-पास रहता है।
रंगोली,वन्दनवार, रोशनी ,दीपक
तुम बिन सब अधूरे से लगते है
साथ तुम हो तो श्रृंगार पूरे लगते है
देहरी पर आज भी आस का दिया जलता है
तुम जल्दी आओगे मेरा मन ये कहता है।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Saturday, 5 September 2020

शिक्षक का मानस (कविता) - सपना परिहार


शिक्षक का मानस
(कविता)
शिक्षा की मैं नींव रखूँ
राष्ट्र के नव निर्माता की
ज्ञान की मैं अलख जगाऊँ
विद्या,अध्ययन ,बुद्धि की।

तन और मन से सींचूँ उनको
बगिया की मैं उनको बहार बनाऊँ
वैदिक शिक्षा से लेकर मैं
विज्ञान के हर तर्क सिखाऊँ।

व्यवहारिक शिक्षा की नींव रखूँ मैं
भौतिकता से अवगत कराऊँ
भरत,एकलव्य, लव-कुश जैसे
वीर बहादुर शिष्य बनाऊँ।

मान-,प्रतिष्ठा का मैं न भूखा
बच्चों का मैं अभिमान हूँ
गुरु,सारथी,मार्गदर्शक और
हर विद्यार्थी का ज्ञान हूँ।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


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Tuesday, 17 November 2020

तुम जिम्मेदार हो (कविता) - सपना परिहार

 

तुम जिम्मेदार हो
(कविता)
नानी भी अपनी माँ से
सीखी होंगी दबना,झुकना,
नानी से माँ ,तुमने भी सीखा
लड़कियों को सलीक़े में रखना,
ढेर सारी हिदायतों में रखना,,!
न खुल कर मुस्कुराना,
न आत्मविश्वास से चलना,
न किसी को मुँह तोड़ जवाब देना,
क्यों... माँ,,,क्यों...?
क्यों नहीं सिखाया तुमनें
सीना तान के चलना,
पुरुष प्रधान समाज में
सम्मान और हक से जीना,
और,,, सबसे बड़ी बात,
अपने जिस्म को घूरने और
छूने वाले दरिंदे को
उसी समय उसके पुरुष होने का
अभिमान काट गिराने का,
जिसे वो हक समझता है,
किसी भी स्त्री का शील भंग करना,,!
माँ,,, क्यों करे हर बेटी प्रतीक्षा
उसे न्याय मिलने का!
जो कभी समय पर मिलता नहीं,,!
माँ,, बेटी को आज आग बनने दो,!
जिसे छूने की कोई भी करे हिम्मत
तो,,,, झुलस जाए उस अंगार में,
और,,, किसी भी स्त्री को कभी
न छू सके,,,गलत इरादे से,,!
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सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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Saturday, 15 August 2020

*भारतीय स्वत्रंतता संग्राम* (आलेख) - सपना परिहार

*भारतीय स्वत्रंतता संग्राम* 
(आलेख)
इस वर्ष हम सभी अपने देश का 74वाँ स्वत्रंतता दिवस मना रहे है।
सोने की चिड़िया कहा जाने वाला मेरा भारत कितने ही नामों से जाना जाता है।हिंदुस्तान ,हिन्द, आर्यावर्त आदि।
हमारे देश की गौरवशाली गाथा हमनें अपने पूर्वजों से कई बार सुनी है। सुख ,संपन्नता,वैभव, आध्यत्म,संस्कृति सब हमारे देश का प्रितिनिधित्व करती है।
हमारे देश की संस्कृति से प्रभावित होकर कई विदेशी हमारे देश मे आये ।कोई ज्ञान प्राप्त करने,  कोई राज करने,कोई व्यवसाय करने। सभी हमारे देश के गौरव को देख दाँतों तले ऊँगलियाँ दबाते थे।
हमारे देश को पराधीन करने की योजना कई वर्षों तक होती रही।
जो भी विदेशी यहाँ आता हमारे देश को पाने की इच्छा रखता।
पहले पारसी हमारे देश मे आये और बस गए,फिर यूनानी ,फिर मुगल आये और उन्होंने कई सालों तक हमारे  भारत देश पर राज किया।एक पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा समुन्द्र मार्ग से व्यापार की दृष्टि से हमारे देश मे आया।और अंत मे ब्रिटिश लोग आए ,जिन्होंने 200 वर्ष तक हमारे देश को गुलाम बना कर रखा। हमारे देश ने कई वर्षों
तक गुलामी सही।पर कहीं न कहीं देश के सपूतों ने  इस पराधीनता को मन से स्वीकार नहीं किया था।उनके मन मे आक्रोश पनप रहा था।अपनी आजादी के लिए वे प्रयत्नशील थे।

पर सही मायने में अगर स्वत्रंतता संग्राम का प्रारम्भ हुआ तो वह 10 मई सन 1857 में  मेरठ में मंगल पांडे के द्वारा हुआ ।
इसका मुख्य कारण था चर्बी वाले कारतूस जो कि गाय और सुअर की चर्बी से बने थे,जिसे मुँह से छीलकर उपयोग में लाना था।
इन सबमें एक ब्राह्मण युवक मंगल पाण्डे ने इस कार्य को करने से मना कर दिया।और यही से भारतीय स्वत्रंतता संग्राम की शुरूआत हुई।

नाना साहब ,महारानी लक्ष्मी बाई,तात्या टोपे ,चन्द्रशेखर आजाद आदि कई वीरों ने आजादी का बिगुल बजा दिया।

लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजों की दासता को अंत करने का समय आ चुका था।
कई क्रांतिकारी दल बन गए थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना बलिदान दिया।बच्चे,बुजुर्ग,महिलाओं सबने इन आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।
बेगम हजरत महल,चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि वीर सपूतों ने अपना सर्वस्व देश पर अर्पित कर दिया।
अंग्रेजों के बढ़ते  अत्याचार से देश का प्रत्येक व्यक्ति जूझ रहा था।
लगान वसूली,कई प्रकार के कर  विदेशी वस्तु के उपयोग पर दबाव और न जाने कितने अत्याचारों को हमारे देश वासियों ने सहा।
भारतीयों पर इतने अत्याचार बढ़ गए कि उनका साँस लेना मुशिकल हो गया। सजा के तौर पर काले पानी की सजा,ऐसी अंधेरी कारागृह जिसमें व्यक्ति प्राण छोड़ दे ,ऐसी जगह भारतीयों को बंधक बनाए रखना।
इतनीं यातनाओं के बाद भी हमारे देश के वीर क्रांतिकारियों के अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का उत्साह कम नहीं हो रहा था।

हमारे देश को आजाद करवाना इतना आसान नहीं था, क्रांति से भी स्वत्रंतता नही मिल पा रही थी।
इसी बीच हमारे देश के कई महान विचारक आगे आये और उन्होंने  भी अपना योगदान दिया।गुलामी के अलावा और भी बहुत कुछ था जैसे बाल विवाह, स्त्री शिक्षा ,विधवा विवाह, अश्पृश्यता  सती प्रथा,इन सबसे भी हमें मुक्ति दिलाना।
राजा राम मोहन राय,विवेकानंद, दयानंद सरस्वती  बंकिमचंद्र चटर्जी आदि कई लोगो ने इस हित मे प्रयास किया।
स्वत्रंतता संग्राम में क्रांतिकारी योजना होने के बाद भी आजादी मिलना मुश्किल हो रहा था।
1886  में  भारतीय कॉंग्रेस की स्थापना हुई  जिसके बाद कई राजनेतिक दल बनने लगे।
सभी ने अपने अपने स्तर पर देश को आजाद कराने के प्रयत्न किए।
हम यहाँ हमारे देश के क्रांतिकारियों के योगदान को भूल नही सकते।

लेकिन हमें उस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो सबका प्रतिनिधित्व करे और देश की आजादी में अपना योगदान दे।
लाला लाजपत राय,गोपाल कृष्ण गोखले,विपिनचन्द्र पाल, सुभाष चन्द्र बोस आदि अपने अपने स्तर पर प्रयासरत थे।सुभाषचंद्र बोस ने तो आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना भी की।
देश की दशा को सुधारने के लिए गोखले जी ने 1913 में महात्मा गांधी जी को भारत बुलाया ,वे उनके दक्षिण अफ्रीका आंदोलन से काफी प्रभावित हुए। गाँधी जी उनके बुलावे पर भारत लौट आये।
उधर अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था।
और इसका सबसे क्रूर अत्याचार था "13 अप्रेल 1919 "उस दिन बैसाखी का पर्व था ।और उस पर्व को मनाने सभी लोग इकट्ठा हुए थे।जब ये खबर अंग्रेज अधिकारी
जनरल डायर को पता चली तो उसने सैनिकों को उन तमाम बुजुर्ग,महिलाओं, बच्चों पर जलियांवाला बाग में अंधाधुंध गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।
कुछ लोग अपनी जान बचाने कुएं में कूद पड़े फिर भी सिपाहियों ने कुँए में भी गोली दाग दी।
इस भीषण हत्याकांड ने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया।
अब तो आजादी की लहर मानो अपने उफान पर थी ।
लोगो ने विद्रोह करना प्रारंभ कर दिया।

गाँधी जी के सहयोग से देश की आजादी के लिए कई आंदोलन किये गए। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी अपनाओ, असहयोग आंदोलन, नमक कानून तोड़ो आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन में " करो या मरो"का नारा दिया।इस आंदोलन ने देश की सभी जेल को आंदोलन कारियो से भर दिया।
1857 से प्रारंभ हुई  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई अब अपने अंतिम चरण पर थी।
देश की आजादी में अपने प्राणों की आहुति देने वाले ऐसे कई वीर सपूतों को हम कभी नही भुला सकते जिनके योगदान के बिना ये आजादी सम्भव नही थी।
अंग्रेजो की हम भारत वासियों में फूट डालने की नीति प्रारम्भ से ही रही ,वे ये भी नही चाहते थे कि भारतीय शिक्षा प्राप्त करें और आगे बढ़े।
उन्होंने हमारे देश के हिंदु-मुस्लिम भाइयों को अलग करने की योजना बनाकर "1913 में बंगाल विभाजन"की घोषणा कर दी।
और इस तरह हमारे भारत के टुकड़े होना प्रारम्भ हो गया।

गाँधी जी के सत्य अहिंसा के मार्ग के पर चलते हुए आखिरकार 1942 में आजादी के लिए आंदोलन को तेज कर दिया।हमारे देश को स्वाधीन कराने का समय लगभग आ चुका था।
सभी के योगदान की वजह से आखिर वह समय आ ही गया जब हमारा देश स्वाधीन हो ही गया।
इतने सालों की मेहनत और कुर्बानी  रंग लाई और अब हम अपने आजाद देश की खुली हवा में साँस लेने जा रहे थे।
पर हमें इसका भुगतान देश के 2 टुकड़ों में करके भुगतना पड़ा।

14 अगस्त की 1947 की मध्य रात्रि को आखिर हमारा देश स्वत्रंत हो ही गया 200 वर्षो की दासता से सभी भारत वासियों को छुटकारा मिल ही गया।
भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए  पंडित जवाहर लाल नेहरू जी को  देश का प्रधानमंत्री बनाया गया।
और दूसरी तरफ हमारे ही देश का दूसरा अंश जिसे पाकिस्तान का नाम दिया गया,उसके प्रधानमंत्री के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना को चुना गया।
"इतने वर्षों का संघर्ष आसान नहीं था हर भारतीय का।पर हम उन सभी देश के महान सपूतों को नमन करते है जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप इस धरा को स्वंतत्र कराया।
हम उन सभी वीरों के आभारी रहेंगे जिनकी वजह से आज हम सभी एक स्वतंत्र भारत मे चैन की साँस ले रहे है।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


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Wednesday, 12 August 2020

उम्र के इस पड़ाव पर (ग़ज़ल) - सपना परिहार


उम्र के इस पड़ाव पर
(ग़ज़ल)
उम्र के इस पड़ाव पर थकना भी लाज़मी है,
अपने हिस्से में आज भी बस थोड़ी सी जमीं है।

वक्त और हालात के सभी मारे है दोस्तों,
बता ए जिंदगी तू किसके लिए थमीं है।

न रात मेरी थी कभी,न दिन उसका है अभी,
हम दोनों के हिस्से में अभी भी कुछ कमीं है।

हसरतों के बाजार से कुछ ख़्वाब खरीद लाये थे हम,
वो हकीकत न बन सके,उसके जिम्मेदार भी हमीं है।

अफ़सोस रहेगा ताउम्र इस बात का,
किसी की बदौलत आज भी इन आँखों में नमीं है।

थकने लगे हैं वो अब जिम्मेदारियों के बोझ से,
उनके काँपते हाथों में अब ताकत की कमीं है।


मुट्ठी भर खुशियाँ ही माँगते है वो उस ख़ुदा से,
वो खुशियाँ भी न जानें क्यों हमसे अनमनीं है।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


-०-
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Monday, 24 August 2020

गणेश चतुर्थी (गीत) - सपना परिहार


गणेश चतुर्थी
(गीत)
भाद्र पक्ष की चतुर्थी
जन्म हुआ गजराज
रंग -गुलाल उड़ रहा
और बज रहा है साज ।

प्रथम पूज्य को शीश झुकाऊ
गौरी पुत्र गणेश
भालचंद्र है जिनके सिर  पर
पिता है तुम्हारे महेश ।

एक सौ आठ है नाम तुम्हारे
तुम उनसे सुशोभित हो,
मूसक वाहन है तुम्हारी सवारी
तुम सबके मन मोहित हो ।

कार्तिकेय के भ्राता अनुज
रिद्धी-सिद्धि संग विराजत हो,
शुभ-लाभ के बिना अधूरे
पिता उनके कहावत हो।

हर वर्ष में ग्यारह दिवस तुम
हम सबके घर में आते हो ,
अगले बरस फिर आने का वादा
तुम करके चले जाते हो।

हर शुभ मंगल कार्य में
तुम्हे ही पूजा जाता है
जीवन में कुछ  भी संकट हो
जिह्वा पर नाम तुम्हारा ही आता है।
-०-
पता:
सपना परिहार 
उज्जैन (मध्यप्रदेश)


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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

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हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ