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Friday, 1 January 2021

नया साल (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'

 

नया साल
(कविता)
नई उम्मीद लेकर आया है।
छोड़ चुके हैं जो
उनका हिसाब लेने आया है।
नया साल मां रणचंडी को
साथ लाया है,
उठाए खड्ग खप्पर
शत्रु का संहार करने आये है।
बीते हुए वक्त में
जो बन गए थे पराये 
फिर से उनको
अपना बनाने आया है।
नया साल नई उम्मीद
नव उमंग नवीन उत्साह 
साथ लेकर आया है।
नया साल महामारी से उठकर
नवीन पुलकित जीवन
साथ लेकर आया है।

राजीव डोगरा 'विमल'
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Tuesday, 22 September 2020

काल (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


काल 
(कविता)
मैं तूफानों से निकला हूं
मुझे आंधियों से
अब कोई डर नहीं,
मैं महाकाल से मिला हूं
मुझे काल से
अब कोई डर नहीं ,
मैं अपने अस्तित्व को
मिटा चुका हूँ,
मुझे जीवन से अब
कोई मोह नहीं।
मैं माँ काली से प्रेम
पा चुका हुँ,
मुझे दुनिया वालों से
अब कोई स्नेह नहीं।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Tuesday, 4 August 2020

आदत है अब (कविता) - राजीव डोगरा


आदत है अब
(कविता)
दर्द लिखने की आदत है अब
क्योंकि दर्द को
सहने की आदत हैं अब।
टूटकर बिखरा हूँ बहुत
मगर फिर भी
जीने की आदत है अब।
बहुत समझाया है सब को
मगर अब खुद को
समझाकर चुपचाप
बैठने की आदत है अब।
अपनों को गैर
गैरो को अपना
बनाया है बहुत
अब खुद से और खुदा से
रिश्ता निभाने की
आदत है अब।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Friday, 4 September 2020

कालकूट (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


कालकूट
(कविता)
ओड़कर सनातन तन को
कहाँ तक जाओगे,
मिट जाए सब भ्रम तो
एक दिन तुमको भी पा जाएंगे।
रहा अगर जात-पात का
यह भ्रम मन में तो
जिंदा ही अपने बुरे कर्मों से
जल जाओगे।
और अपनी बुरी करतूतों को
कभी न मिट्टी में
दफन कर पाओगे।
सोच लो समझ लो
करना क्या है
आखिर तुम को।
असत्य के साथ जीना है या
सत्य के साथ मरना है।
मगर तुमको अब भी
कुछ नहीं पता तो
तुम कालकूट के विषभरे
सर्प के दांतो में
ऐसे फंसे रह जाओगे।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Monday, 19 October 2020

मेरा संगी (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


मेरा संगी 
(कविता)
कांपते हुए मेरे लफ्जों को
जरा पहचानो,
उनमें जो दर्द है
उसको जरा सँभालो।
तुम कहते हो न
तुम्हे क्या दर्द है ?
तो जरा देखो मेरे अंतर्मन में
हँसती मुस्काती मेरी पीड़ा को।
मैं फिर भी टूटता नहीं
कभी बिखरता नहीं,
मैं मुस्काता हूं
उस पीड़ा के साथ
भले वो दर्द दे मुझे लाख।
कभी-कभी मेरा दर्द भी
बेहद रोता है चीख़ता है
चिल्लाता है।
देखकर मुझको मुसकुराते।
बोलता है मेरा संगी दर्द
देकर दर्द खुदा ने तुझे नहीं
मुझको ही
तोड़ा है अरोड़ा है।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Wednesday, 19 August 2020

काश! (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


काश!
(कविता)
काश! मेरी जुबान की
कड़वाहट के पीछे
तुम मेरे हृदय की मिठास को
समझ पाते ।

काश! मेरे मुस्काते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे हृदय में दहकती
पीड़ा को समझ पाते।

काश ! मेरे बहते हुए
अश्कों के पीछे
तुम मेरे हृदय में बसी
मेरी कोमल भावनाओं को
समझ पाते।

काश! मेरे खिलखिलाते
चेहरे के पीछे
तुम मेरे अंतर्मन की
चीखती चिल्लाहट को
समझ पाते।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Wednesday, 18 November 2020

कुछ तो हो (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


कुछ तो हो
(कविता)
जीत नही तो
हार ही सही,
सुख नहीं तो
दुख ही सही,
अपने नहीं तो
पराए ही सही,
दोस्ती नहीं तो
दुश्मनी ही सही,
जीवन नहीं तो
मृत्यु ही सही,
आदि नहीं तो
अंत ही सही,
हमसफर नहीं तो
हमराही ही सही,
धरती नहीं तो
आसमां ही सही
जल नहीं तो
अग्नि ही सही,
नव नहीं तो
पुरातन ही सही,
ज्ञान नहीं तो
अज्ञान ही सही।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Sunday, 4 October 2020

इसीलिए (कविता) - राजीव डोगरा 'विमल'


इसीलिए
(कविता)
दर्द कम नहीं था
इसीलिए
बेदर्द होना पड़ा।
हमसफ़र कोई नहीं मिला
इसीलिए
हम राही होना पड़ा।
राज बहुत दफन थे
इस तड़फते दिल में
इसीलिए
हमराज होना पड़ा।
दिल बहुत दुखता था
अपनों के दिए गम से
इसीलिए
महाकाल की भक्ति में
चूर होकर
मुझे भी काल होना पड़ा।
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Monday, 14 September 2020

राष्ट्रीय भाषा हिंदी का महत्व और हिंदी दिवस (आलेख) - राजीव डोगरा 'विमल'

राष्ट्रीय भाषा हिंदी का महत्व और हिंदी दिवस
(कविता)\
"निज भाषा बोलहु लिखहु पढ़हु गनहु सब लोग।
करहु सकल विषयन विषै निज भाषा उपजोग।।"
                                        -श्रीधर पाठक

हिंदी मात्र एक भाषा की नहीं है यह हम हिंदुस्तानियों की एक पहचान और शान है। हिंदी हमारी देश की राष्ट्रीय भाषा भी है। हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है आज हिंदी सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि बहुत सारे और देशों में भी बोली जाती है।भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया
कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। 

अगर हम हिंदी भाषा की उत्पत्ति  के संबंध में  बात करें तो हिंदी की आदि जननी संस्कृत है।संस्कृत, पाली, प्राकृत भाषा से होती हुई अपभ्रंश तक पहुंचती है फिर अपभ्रंश, अवहट्ठ से गुजरती हुई प्राचीन हिंदी का रूप लेती है।सामान्यता हिंदी भाषा के इतिहास का आरंभ अपभ्रंश से माना जाता है।

अगर हम हिंदी शब्द की उत्पत्ति के बारे में बात करें तो हिंदू से ही हिंदी बना है हिंदू शब्द फारसी है जो संस्कृत शब्द सिंधु का फारसी रूपांतरण है। संस्कृत की सिंधु का इरानी में हिंदू हो गया जो सिंधु नदी के आसपास के प्रदेश के अर्थ में उपयुक्त हुआ और वहां के रहने वाले लोगों को हिंदू कहा गया। और वहां के लोगों की भाषा को हिंदी कहा गया।डाँ.भोलेनाथ तिवारी के अनुसार,

" हिंदू शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 7 वीं सदी के अंतिम चरण के ग्रंथ निशीथचूर्णि में प्रथम बार मिला है।"

 तैमूर लंग की पोती सरफुद्दीन यज्दी ने सन 1424 ई. में अपने ग्रंथ 'जफरनामा" ने विदेशों में हिंदी भाषा के अर्थ में हिंदी शब्द का प्रयोग किया। डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा द्वारा संपादित हिंदी साहित्य कोश (भाग-1) के अनुसार 13-14 वी शती में देसी भाषा को हिंदी या हिंदकी या हिंदूई नाम देने वाले हसन या अमीर खुसरो का नाम सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

अगर हम हिंदी के आधुनिक काल की बात करें तो भी हिंदी को 20वीं सदी तक संघर्ष करना पड़ा क्योंकि 19 सदी तक ब्रजभाषा काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित थी।भारतेंदुयुग में भारतेंदु जी ने गद्य में हिंदी का प्रयोग आरंभ कर दिया था मगर 1900 ईसवी के बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने जब सरस्वती पत्रिका का कार्य भार संभाला तो हिंदी गद्य के साथ-साथ पद्य में भी प्रतिष्ठित होने लग पड़ी।

भारत की स्वतंत्रता  के पहले  समाज सुधारक और धर्म सुधारक संस्थाओं का भी हिंदी को राष्ट्रीय भाषा  बनाने में  बेजोड़  सहयोग है। समाज सुधार की सभी संस्थाओं ने हिंदी भाषा को विशेष हिमायत भी और हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने पर जोर दिया ब्रह्म समाज के राजा राममोहन राय ने कहा कि,

" इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है।"

दूसरी तरफ आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।वह कहते थे कि,

"मेरी आंखें उस दिन को देखना चाहती है जब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएं।"

भारत की स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में गौरवान्वित किया गया। और भारतीय संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक हिंदी भाषा के लिए प्रवाधान रखा गए। आज हिंदी हमारे देश की भाषा ही नहीं राष्ट्रीय भाषा के रूप में जाती है। भाषा की महत्व को बताती हुई गांधी जी बोलते हैं कि,

" मेरी मातृभाषा में कितनी खामियां क्यों ना हो मैं इसे इसी तरह चिपका रहूंगा जिस तरह एक बच्चा अपनी मां की छाती से जो जीवनदाई दूध दे सकती है अगर अंग्रेजी उस की जगह को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदार नहीं है तो मैं उसे सख्त नफरत करूंगा वह कुछ लोगों के सीखने की वस्तु हो सकती है लाखों करोड़ों कि नहीं।"

अंत में मैं अपनी कलम को विराम देते हुए यही कहूंगा हिंदी दिवस मात्र हिंदी का दिवस नहीं है हिंदी दिवस हमारी मातृभाषा का दिवस है जो लंबे समय से हमारा साथ निभा रही है भले ही बदलते समय के पारूप में इसमें बहुत बदलाव आए हैं मगर फिर भी यह एक मां की तरह हमारा हाथ थामे चलती रही है और आज भी क्या चल रही है। इसीलिए हमें भी एक अच्छे बच्चे की तरह अपनी मां का साथ निभाते रहना चाहिए ।।      "जय हिंद जय हिंदी"
-०-
राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-



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Thursday, 14 May 2020

जिंदगी तेरा कोई पता नहीं (कविता) - राजीव डोगरा


जिंदगी तेरा कोई पता नहीं
(कविता)
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो,
लोग सोचते हैं शायद
किसी का कसूर होगा,
मगर आती हो तो
हज़ारो बेकसूरों को भी
अपने साथ ले जाती हो।
कोई तड़फता है
अपनों लिए
कोई रोता है,
औरों के लिए
पर तुम छोड़ती नहीं
किसी को भी
अपने साथ ले जाने को।
जब मरता है कोई एक
तो अफ़सोस-ऐ-आलम
कहते है सब
पर जब मरते है हज़ारों
तो ख़ौफ़-ऐ- क़यामत
कहते हैं सब।
तू भी कभी
तड़फती रूहों को
अपने गले लगाए,
ज़रा रोए कर
मरते हुए किसी चेहरें को
खिल-खिला कर
ज़रा हँसाए कर।
मानता हूँ की ख़ौफ़
तेरे रोम-रोम में बसा हैं
फिर भी किसी मरते हुए
इंसा के माथे को चूम
ज़रा-ज़रा सा मुस्काया कर।
ज़िंदगी तेरा कोई पता नहीं
कब आती हो और
कब चली जाती हो।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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Sunday, 29 March 2020

उदासियां (कविता) - राजीव डोगरा


उदासियां
(कविता)
कभी-कभी उदासियां
बहने लगती है इन अश्कों में।
जो बातें कही नहीं जाती
वे बह जाती है
अक्सर इन अश्कों में।

मत पूछा करो
इन खामोशियों की वजह
इन तनहा रस्तों से।
बहुत कुछ खोया है
बहुत कुछ पाया है
अक्सर इन गुमनाम रास्तों से।

मत पूछिए
वफ़ा की बातें हम से।
बहुत दिल लगाया है
और बहुतो से
दिल से निभाया है,
मगर फिर भी अक्सर
दर्द ही मिला है
हमें अक्सर सस्ते में।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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Friday, 29 November 2019

अनजान डर (कविता) - राजीव डोगरा


अनजान डर
(कविता)
किसी के आने से पहले
किसी के जाने का
डर बना रहता है।
जीवन में एक अनजाना सा
निराशा का पल
बना रहता है।
कभी सोचता हूं,
सब कुछ समेट लू खुद में
फिर खुद को लोगो से
छुपाने का इलज़ाम बना रहता है।
रेत की तरह समय
हर पल हर जगह
हाथो से निकलता जा रहा है।
यूं लगता है,
सब कुछ पाकर भी
कुछ-कुछ खोता जा रहा हूं।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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Sunday, 26 January 2020

ज़रा याद करें (कविता) - राजीव डोगरा




ज़रा याद करें
(कविता)
आओ मिलकर विचारों की
ज़रा आग जलाए।
डूब रही है जो देश की हस्ती
ज़रा उसको रोशनाए।
मर मिटे है जो अपने देश के लिए
ज़रा उनकी याद
सब को मिल करवाएं।
जो कहते हैं यौवन आता है
एक बार मस्ती का।
ज़रा उनको भगत सिंह के
आज तक गूंजते
नव यौवन की कहानी सुनाएं।
जो कहते है नहीं मिटती हिंसा
अहिंसा का पालन करने से।
ज़रा उनको गांधी जी के
विचारों की याद दिलाएं।
जो कहते है धर्म ही धर्म का दुश्मन है
उनको गुरु तेग बहादुर जी का,
हिंदू धर्म के लिए किया गया
ज़रा बलिदान याद करवाएं।
जो कहते हैं औरतें बस
पांव की जूती होती है,
उनको रानी लक्ष्मीबाई जी की
रणभूमि में चमकती
ज़रा तलवार दिखलाए।
जो कहते हैं मुर्दों में जान
नहीं फूंकी जा सकती,
ज़रा उन सब को मिलकर
गुरु गोविंद सिंह जी की
लिखी "चंडी की वार"सुनाएं।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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Saturday, 15 February 2020

सुकून मिले (कविता) - राजीव डोगरा


सुकून मिले
(कविता)
कभी छू कर,देखूं तेरी रूह को
तो मुझे भी सुकून मिले,
कि तू मेरा हैं जिस्म से नहीं रूह से।

कभी दिल लगा कर,
देखो मेंरे एहसासों को
तो मुझे भी सुकून मिले,
कि इन एहसासों में सिर्फ मैं बसते हूँ।

कभी स्पर्श करो,
मेरी बेचैन करती यादों को
तो मुझे भी सुकून मिले,
कि इन यादों में बस,
मैं ही याद आता हूं तुमको।

कभी आगोश में लो,
मेरी मुस्कुराहट को
तुम मुझे भी सुकून मिले,
कि इस मुस्कुराहट के पीछे
हर पल मैं रहता हूं।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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Sunday, 15 December 2019

नई मोहब्बत (कविता) - राजीव डोगरा


नई मोहब्बत
(कविता)
पुरानी तस्वीरों के साथ
कुछ नए जज्बात लिखूंगा,
जो तूने
सोचा भी नहीं था कभी
वो हर चीज
अपनी तकदीर में लिखूंगा।
छोड़ दूँगा उन
हाथों की लकीरों को देखना
जो मेरी
तकदीर में नहीं।
खुदा का फकीर बन
हर चीज उससे मांग कर
अपने नसीब में लिखूंगा।
छोड़ दूंगा लोगों से
मोहब्बत की
दर-दर भीख मांगना।
इश्क कर उस रब से
मोहब्बत को उसकी
अपने नाम लिखूंगा।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




***
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Friday, 17 January 2020

बचपन (कविता) - राजीव डोगरा


बचपन
(कविता)
वो बचपन वो नादानियाँ
न जाने
अब कहाँ चली गई,
घूमता फिरता था जहाँ
वो हसीन वादियाँ भी
न जाने
अब कहाँ चली गई।
बैठ जिस नदी किनारे
करता था अठखेलियां
वो नदी भी न जाने
अब कहाँ चली गई,
वो आम का वृक्ष
बैठ जिसके नीचे
देखता था अंबर और अवनि को
वो वृक्ष भी न जाने
अब कहाँ चले गए।
एक सखी थी
बड़ी प्यार सी
एक सखा था
बड़ा नटखट सा
मिल तीनों करते थे।
बड़ा धूम धड़ाक
पर न जाने
समय के पांव के संग
अब वो कहाँ चले गए
न अब बचपन रहा
न अब नादानियाँ रही
दोनों मिल अब
न जाने
कहाँ दूर चले गए।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




***
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Sunday, 3 May 2020

देखा है मैंने तुमको (कविता) - राजीव डोगरा


देखा है मैंने तुमको
(कविता)
हे ! ईश्वर
सिद्धों की वाणी में
नाथों के चिमटे में
योगियों के योग में
देखा है मैंने तुमको
हर एक इंसान में।

कुंडलिनी के जागरण में
सहस्त्रार के गमन में
त्रिनेत्र की ऊर्जा में
आज्ञा चक्र की आज्ञा में
हर पल महसूस किया है
मैना तुम्हें
उस विद्युत ऊर्जा में।

मूलाधार की सौंदर्य लहरी में
विशुद्धा की शुद्धता और स्वच्छता में
अनाहत के आनंदमई भेदन में
जाना है मैंने तुमको
स्वाधिष्ठान की पंच विद्याओं में
मणीपूरक की तेजसि्वता में।
-०-
राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
-०-




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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
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