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Thursday, 31 December 2020

जिंदगी में.... यह साल (कविता) - प्रीति शर्मा 'असीम'

   

जिंदगी में.... यह साल
(कविता)
यह साल ,
बहुत ख़ास रहा |
जिंदगी की कड़वी  यादों में |
मीठी बातों का भी  स्वाद  रहा |

यह साल बहुत ख़ास  रहा |
किन भरमों में जी रहे थे।
आज तक .........?

उनसे  जब  ,
आमना -सामना  हुआ|

क्या  कहूं ..........!
जिंदगी में, इस  साल |
तुज़र्बों का एक काफ़िला  -सा  रहा |

कुछ  के चेहरे से नकली नकाब उतरे,
कुछ को छोड़कर,
हर चेहरा दागदार रहा।।
 कुदरत ने हर चेहरे पर मास्क लगाकर,
 चेहरे की अहमियत का वो  सबक दिया।

यह  साल बहुत ख़ास रहा |

जहां कुछ जिंदगी की हकीकतें समझ गए।
 किस दौड़ में जी रहे थे.....
 बंद घरों में करके कैद में रख दिए।
 
वहीं कुछ चेहरे दिल में सिमट गए।
 जिंदगी बंद करती है एक दरवाजा,
तो कहीं कई  दरवाजे खुल गए।
हर उस प्रेरणा  का
शुक्रिया ........
जिस ने जिंदा होने का,
अहसास दिला दिया।

 जिंदगी की अहमियत का,
इस साल ने वो  सबक दिया।
 जो समझेंगे..... सालों को जी जाएंगे।
वरना हर साल में...  बस
सालों के कैलेंडर ही बदलते रह जाएंगे।

 यह साल बहुत खास रहा।
मैं  हारता हुआ भी हर बाज़ी मार गया |

जिंदगी  का हर  दिन अच्छा या  बुरा,
हर अनुभव  बहुत ही ख़ास रहा |

नये साल  को सींचूगा 
इन अहसासों से |

जिंदगी  को  जीने के, वे-मिसाल उमदा,
इन  तरीको से | 
यह  साल बहुत ही ख़ास रहा |
 जिंदगी की हकीकतों  को दिखाता बेमिसाल आईना रहा।
-०-
पता:
प्रीति शर्मा 'असीम'
नालागढ़ (हिमाचल प्रदेश)

-०-


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Wednesday, 21 October 2020

क्या... ढूंढ रहे हैं (कविता) - प्रीति शर्मा 'असीम'

  

क्या... ढूंढ रहे हैं
(कविता)
जो जीवन की, साथर्कता बतलायें।
मानव जीवन के,
सोपानों को, सिद्ध कर जायें ।

नई सोच से, नई लग्न से,
जीवन के आयाम बनायें ।
ऐसा ही कुछ ढूंढ रहे है। 

हर मुश्किल से जा टकरायें।
हिम्मत बांध खडा हो जायें।

झूठ के सौ पैर हुए,....तो क्या?
सच के साथ अडिग रह जायें।

सच्चा प्यार हो दिलों में, 
ढोंग न दिखावा हो ।
चेहरों के अनगिणत मुखौटों में,

जो चेहरा एक चेहरे वाला हो।
ऐसा ही कुछ ढूंढ़ रहें है।
-०-
पता:
प्रीति शर्मा 'असीम'
नालागढ़ (हिमाचल प्रदेश)

-०-


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Sunday, 27 September 2020

अखबार (कविता) - प्रीति शर्मा 'असीम'

 

अखबार
(कविता)
बंद पड़ी  सोच को ,
जब हिलाना ही नहीं है | 
खबर पढ़कर भी जब ,
आवाज़  उठाना ही नहीं है| 
टुकड़ा यह कागज का रद्दी नहीं, 
तो ........और  क्या है़ं|
कब तक  ,खुद को 
दूसरे  की  आग  से  बचाओगे|
नफ़रतों की  चपेट में, 
तुम भी  तो  आओ गें |
यह  बोले गा.......! 
वो बोलो गा.......? 
गलत को गलत  ,
कहने को भी इतना क्यों सोचेगा |
तू क्यों........नही बोलेगा |
अच्छे  समाज को कौन बनायेंगा|
कलयुग है, भाई कलयुग है |
यह तो सब रोते है |
सतयुग  कोई  बाहर से  नहीं आयेगा|
-०-
पता:
प्रीति शर्मा 'असीम'
नालागढ़ (हिमाचल प्रदेश)

-०-


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Friday, 24 July 2020

कुछ कर गुजरने का (कविता) - प्रीति शर्मा 'असीम'

कुछ कर गुजरने का 
(कविता)
जिंदगी में कुछ कर गुजरने का सवाल आता है।
जब हमें हमारी ना-कामयाबी-यों का ख्याल आता है।

वक्त के सवाल पर, जब सवाल आता है।
वक्त आएगा ,हमारा भी यह ख्याल आता है।

जिंदगी में कुछ कर गुजरने का सवाल आता है।
हमारी काबिलियत पर उठी,
उन तमाम उंगलियों का ख्याल आता है।

हम भी इस मुकाम पर पहुंच गए ,
जब  यह सवाल आता है।
एक ठोकर से मिले ,
आसमान का ख्याल आता है।
-०-
पता:
प्रीति शर्मा 'असीम'
नालागढ़ (हिमाचल प्रदेश)

-०-


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