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Saturday, 15 August 2020

वतन के वास्ते (कविता) - अनिल कुमार 'निलय'


वतन के वास्ते
(कविता)
बुलाये गर वतन तो जान की परवाह क्या करना?
तिरंगा हो कफन तो फिर दूजी चाह क्या करना?
वतन के वास्ते बह जाये लहू का एक-एक कतरा,
वतन की गोद के आगे दूसरी पनाह क्या करना?
सिक्के कमाने के तो हैं मौजूद हजारों रास्ते,मगर
वतनपरस्ती ही न हो जिसमें वो राह क्या करना?
सरहदें देश की जिन्हें बुलाएं,वे ख़ुशनसीब होते हैं,
कफन बाँधे जो चलते हैं उन्हें आगाह क्या करना?
अपना वतन बसर नहीं करता जिनमें सलीके से,
उन्हें मंदिर से क्या लेना,उन्हें दरगाह क्या करना?
सारी की सारी दुनिया उतर आये उनमें तो क्या?
देश का अक्स न हो जिसमें वो निगाह क्या करना?
वतन के नाम पर भी सर कटाने से जो डरे निलय!,
हो लाख महान फिर भी ऐसा शहंशाह क्या करना?
-०-
पता: 
अनिल कुमार 'निलय'
प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश)

-०-



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