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Thursday, 6 August 2020

रंगीला सावन (कविता) - बलजीत सिंह

रंगीला सावन 
                (कविता)
       गरज-गरजकर आये बादल,
       हवा हिलाये पेड़ों की चोटी ।
       पंख फड़फड़ाने लगे परिन्दें  ,
       जब गिरी धरा पर बूंदें मोटी ।।

       चिड़ियां चहकी गदराई बेल  ,
       हवा-पानी का अद्भुत मेल ।
       सुरूर सावन का ऐसा छाया ,
       बिल से बाहर अजगर आया ।।
       बकरी-मुर्गा मुड़-मुड़ देखे ,
       कुत्ता खाये भीगी रोटी ।।
       पंख फड़फड़ाने लगे परिन्दें ,
       जब गिरी धरा पर बूंदें मोटी ।।

       गिलहरी सुने कोयल का गाना ,
       चूहा खाये छुप-छुपकर दाना ।  
       मोर मस्ती में हुआ मग्न ,
       तितली रानी का भीगा बदन ।
       आसमानी बिजली कड़कने पर ,
       जोर से भागी हिरण छोटी ।।
       पंख फड़फड़ाने लगे परिन्दें  ,
       जब गिरी धरा पर बूंदें मोटी ।।

       पानी बरसा फसल लहराई ,
       नदी-झरनों ने ली अंगड़ाई ।
       उठे सागर में लहरें तेज ,
       इंद्रधनुष की सतरंगी सेज ।।
       टूटी डाल पर थिरक-थिरककर ,
       नाच दिखाये बंदरिया खोटी ।।
       पंख फड़फड़ाने लगे परिन्दें  ,
       जब गिरी धरा पर बूंदें मोटी ।।
     
       गरज-गरजकर आये बादल,
       हवा हिलाये पेड़ों की चोटी ।
       पंख फड़फड़ाने लगे परिन्दें  ,
       जब गिरी धरा पर बूंदें मोटी ।।
-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
-०-

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Monday, 19 October 2020

रिश्तो की डोर (कविता)- बलजीत सिंह

 

रिश्तों की डोर की 
                (कविता)
         सादगी -शराफत रह गई पीछे ,
         धन-दौलत पर भटके ध्यान ।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान । ।

         मनचले लोगों के सुनो विचार --
         लड़की हो चाहे उम्र में बड़ी,
         सगाई से पहले
         हमारे द्वार पर
         हो जानी चाहिए गाड़ी खड़ी ।
         घरवाले मजे से घूमेंगे
         होगी मोहल्ले में ऊंची शान  । ।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान । ।

         लालची लोग भी करे पुकार --
         हमें रंग-रूप से एतराज नहीं,
         शर्त यही है   
         लेन-देन के मामले में   
         गड़बड़ ना हो जाये कहीं ।
         अड़ोसी-पड़ोसी बार-बार देखें,
         मजबूत और टिकाऊ सामान । ।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान । ।

         साधारण लोग तो सोचे यही --
         दो तरह की लक्ष्मी पधारे घर  ,
         दुल्हन और दहेज
         जब उतरे गाड़ी से
         लगे न किसी दुश्मन की नजर । 
         गली -गली बांटेंगे लड्डू  ,
         इच्छा पूरी करो भगवान ।।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान ।

         विशेष लोग गर्व से कहते --
         दुल्हन हो सुशील एवं संस्कारी ,
         हमें दहेज से नफरत
         बस चाहिये इतना जो निभा सके
         एक आदर्श बहू की जिम्मेदारी ।
         खुशियों से महके घर-आंगन
         छोटे-बड़ों का हो सम्मान ।।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान ।

         सादगी -शराफत रह गई पीछे ,
         धन-दौलत पर भटके ध्यान ।
         रिश्तों की डोर बड़ी अलबेली  ,
         इन्हे जोड़ना-तोड़ना नहीं आसान ।

-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Thursday, 17 December 2020

माँ (कविता) - बलजीत सिंह

  

             माँ
                (कविता)
           बेटा व बेटी
           जिसकी नजर में
           एक समान ।            
           वो माँ होती है
           कभी नहीं घटती
           उसकी शान ।।
           बड़े प्रेम से
           गोद में बैठाकर
           खिलाये खाना ।                        
           बच्चों को चाहे
           पलकों की छाँव में
           सदा बिठाना ।।                                                               
           अपनी आयु
            लग जाये बच्चों को
            माँ का सपना ।
            मुसीबत में
            चीरकर दिखा दे
            दिल अपना ।।
            जन्मों तक भी
            कोई चुका ना पाये
            दूध का कर्ज ।
            माँ निभाती है
            मरते दम तक
            अपना फर्ज ।।

-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Tuesday, 26 November 2019

कर्तव्य (आलेख) - बलजीत सिंह

कर्तव्य
(आलेख)
किसी गाड़ी को स्टार्ट करने के लिए ,उसमें चाबी लगानी पड़ती है । अगर हम उस चाबी को विपरीत दिशा में घुमाएं तो वह स्टार्ट नहीं होगी , क्योंकि हमने चाबी को गलत दिशा में घुमाया है । इसी प्रकार जब व्यक्ति सोच -समझकर गलत दिशा की ओर कदम उठाता है , समझो वह अपने कर्तव्य से भटक चुका है ।

प्रत्येक मनुष्य की ,परिवार ,समाज एवं देश के प्रति कुछ जिम्मेदारियां होती है , उन जिम्मेदारियों को निष्ठा के साथ निभाना , कर्तव्य कहलाता है । जो व्यक्ति कर्तव्य का पालन करता है ,वही जीवन में आगे बढ़ता है ।

एक अंधा व्यक्ति सड़क पार करने के लिए जब आवाज देता है , हमारा कर्तव्य बनता है , हम उसका हाथ पकड़कर सड़क पार करवाएं ‌। ऐसा करना हमारा कर्तव्य है ,परंतु यहां हमारे ऊपर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है । किसी की सहायता इस तरह से करना कि उसके मान -सम्मान एवं मर्यादा को ठेस न पहुंचे ।भूखे व्यक्ति को अगर रोटी न दें सके , तो उसका अपमान भी मत करो , क्योंकि ऐसा करना हमारा कर्तव्य नहीं बनता ।

फूलों में खुशबू होती है ,कोई इन्हें चुरा नहीं सकता या अलग नहीं कर सकता । इसी प्रकार कर्तव्य भी हमारे पास सुरक्षित होते हैं , कोई इन्हें हमसे छीन नहीं सकता । कर्तव्य की डोर हमारे हाथों में होती है । हम चाहे तो इसे ढीली छोड़ सकते हैं और चाहे तो इसे कस भी सकते हैं ।

देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर जवान दिन-रात पहरा देते हैं ।उनको आपातकालीन स्थिति में गोली चलाने का अधिकार है , परंतु अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य की भी जरूरत होती है । युद्ध के समय , कोई भी सैनिक बीमारी का बहाना बनाकर , छुट्टी का अधिकार तो प्राप्त कर लेगा , परंतु ऐसा करना उसका कर्तव्य नहीं बनता । उसका यह कर्तव्य बनता है , वह देश की रक्षा के लिए अपना सहयोग दें अर्थात कर्तव्य के बिना अधिकार अधूरा है ।

बेटी के जवान होते ही ,उसका पिता उसके लिए वर ढूंढना शुरू कर देता है । एक ऐसा वर जो सुन्दर ,सुशील एवं सर्वगुण संपन्न हो ,जो उसकी बेटी को जीवन भर खुशियां दे सके । कुछ ऐसा ही सोचकर ,वह अपनी बेटी के पीले हाथ करने के लिए ,रात को चैन की नींद नहीं सोता और आखिर वह दिन भी आता है , जब वह अपनी लाडली को अपने घर से विदा करके , एक पिता का फर्ज पूरा करता है ।

कुत्ता जिस घर में रहता है ,वह उसी घर की रखवाली करता है । अगर घर में मालिक न हो , वह किसी अनजान व्यक्ति को वहां घुसने नहीं देगा । उस जानवर को कोई हक नहीं मिला होता , वह किसी को घर में आने दे या न आने दे । परंतु वह अपना कर्तव्य पूरी वफादारी के साथ निभाता है । वह जब भी भौंकता है , अपने मालिक के दुश्मनों पर भौंकता है । एक जानवर होकर भी वह अपने फर्ज के प्रति सचेत रहता है ।

किसान बड़ी मेहनत से अपने खेत में फसल उगाता है और समय-समय पर उसमें खाद एवं पानी भी देता है । इसी तरह एक अध्यापक भी छात्रों को समय के अनुसार पढ़ाता है ,लिखाता है और उनको जीवन में हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ उज्ज्वल भविष्य की कामना भी करता है । इसलिए कर्तव्य का दायरा बहुत बड़ा होता है । यह केवल रिश्ते- नातों तक ही सीमित नहीं होता । किसी रोगी को अगर रक्त की आवश्यकता होती है , हम अपना रक्त देकर ,इंसानियत का फर्ज अदा कर सकते हैं । ऐसा करने से हमें उसके मायूस चेहरे पर ,फिर से मुसकुराहट देखने को मिल सकती है ।

नदी के किनारे , सड़क के किनारे , खेत में , विद्यालय में , अगर कहीं पर थोड़ी- बहुत खाली जगह नजर आये , हम वहां पर फलदार वृक्ष लगा सकते हैं । ऐसा करने से हमारा पर्यावरण भी शुद्ध होगा और प्रकृति के प्रति हमारा जो कर्तव्य बनता है ,उसे निभाने में हम सफल भी अवश्य होंगे ।
-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Saturday, 26 October 2019

सादगी (आलेख) - बलजीत सिंह

सादगी
(आलेख)
सड़क में जितने ज्यादा मोड़ होंगे , उस पर चलने में उतनी ही ज्यादा परेशानी होगी । अगर उस सड़क को सीधा कर दिया जाए , उसकी दूरी भी कम होगी और पहुंचने में समय भी कम लगेगा । इसी प्रकार हमारे जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं । अगर हम उतार-चढ़ाव के समय थोड़ा -सा संभल कर चलें , हमारा जीवन पहले की अपेक्षा अच्छा हो सकता है । जीवन को अच्छी तरह से जीने के लिए मनुष्य में सादगी का होना बहुत जरूरी है ।

हमारी सोच एवं व्यवहार में किसी प्रकार के बाह्य दिखावे का न पाया जाना , सादगी या सादापन कहलाता है । जिस मनुष्य में सादगी होती है , उसका वैभव कभी कम नहीं होता ।

चेहरे पर मालिश करने से चमक आ जाती है , परंतु वह चमक कुछ समय बाद फीकी पड़ जाती है । उस चमक को बरकरार रखने के लिए , हमें सबसे पहले अपने शरीर को स्वस्थ रखना पड़ेगा । शरीर से पसीना बहाना पड़ेगा ।उसके बाद चेहरे पर जो चमक आएगी ,वह कभी फीकी नहीं पड़ेगी ।चमक को पैदा किया जा सकता है , उसके लिए किसी बाह्य पदार्थ को चेहरे पर लगाने की आवश्यकता नहीं होती ।

कच्छी ककड़ी को काटकर , उसे अच्छी तरह से साफ करके ,उस पर नमक लगाकर ,जब हम खाते हैं, वह उतनी स्वादिष्ट नहीं लगती , जितनी एक पक्की हुई ककड़ी लगती है । पक्की हुई ककड़ी खाने में स्वादिष्ट होती है , उस पर नमक लगाने की आवश्यकता नहीं होती ,क्योंकि उसकी सादगी में ही उसकी ताजगी होती है ।

अच्छे कपड़े पहनना अच्छी बात है ,परंतु ऐसा भी मत पहनो ,जिसमें अश्लीलता नजर आती हो । जिन वस्त्रों को पहनने से अश्लीलता नजर आती है , उनसे कभी सुंदरता नहीं बढ़ती । सुंदरता तो उन वस्त्रों से बढ़ती है , जो अच्छी तरह से पहने जाते हैं , अच्छी तरह से साफ- सुथरे होते हैं अर्थात् सुंदरता हमेशा सादगी से ही बढ़ती है ।

मकान की दीवारों पर सुंदर-सुंदर तस्वीरें तभी अच्छी लगती है , जब हम उस मकान में सफाई रखते हैं । उन तस्वीरों पर धूल जमने से , उस मकान को कोई सुंदर नहीं कहेगा । जिस मकान में सफाई होती है , उसे ही सुंदर मकान कहा जाता है । सफाई में वह सादगी होती है , जिसके सामने रंग-बिरंगी दीवारें भी फीकी दिखाई देने लगती हैं अर्थात् सादगी सर्वगुण संपन्न होती है ।

सोने के गिलास में पानी का स्वाद वैसा ही होता है , जैसा कांच के गिलास में होता है । यहां पर हमें पानी पीने की इच्छा होती है , गिलास की नहीं । ऐसे समय में हमें गिलास की गुणवत्ता को नहीं देखना , पानी की गुणवत्ता को देखना है । वह पानी कितना शुद्ध है , यह बात हमारे लिए महत्वपूर्ण है । पानी कौन से गिलास में पीते हैं , यह बात महत्वपूर्ण नहीं है ।

गर्मी के मौसम में , किसी छायादार वृक्ष के नीचे बैठने से जो आनंद प्राप्त होता है , वह आनंद किसी वातानुकूलित कमरे में प्राप्त नहीं होता । वृक्ष के नीचे हमेशा ठंडी हवा लगती है , उस हवा में शुद्धता भी होती है । शुद्ध हवा में ताजगी होती है , जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है । इसलिए खुले वातावरण में हमें ताजगी का अनुभव होता है ।

हम जैसा भी हम खाते हैं , हमारा मन वैसा ही हो जाता है । बाजरा , मक्का आदि मोटा अन्न खाने से हमें ताकत मिलती है और नींद भी गहरी आती है । गेहूं , चावल , चना आदि इन सभी अन्नों में पौष्टिक गुण होते हैं । हमें मौसम के अनुकूल सभी अन्न खाने चाहिए । इसी प्रकार सादगी भी सर्वगुण संपन्न होती है , हमें इसके गुणों को अवश्य पहचाना चाहिए ।

भोजन पकाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है । इसी प्रकार सादा जीवन व्यतीत करने के लिए , हमारे अंदर ऊर्जा का होना अति आवश्यक है । अतः सादगी ही वह ऊर्जा है ,जो हमारे जीवन को उभार सकती है ।
-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Tuesday, 28 January 2020

जीवन सार (हाइकु) - बलजीत सिंह

जीवन सार
          (हाइकु)
(1) जीवन- सार
सकारात्मक सोच
उच्च विचार ।

(2) अच्छे संस्कार
जीवन में खोलते
खुशी के द्वार ।

(3) आशा-निराशा
जीवन का तराजू
पलटे पासा ।

(4) मान-सम्मान
मानसिक संतुष्टि
करे प्रदान ।

(5) नियत सच्ची
मेहनत की रोटी
लगती अच्छी ।
-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Wednesday, 26 February 2020

पानी (हाइकु) - बलजीत सिंह

पानी
           (हाइकु)
(1) बारिश आई
ठहरा हुआ पानी
ले अँगडाई ।

(2) वर्षा का पानी
एक-एक पौधे को
दे जिंदगानी ।

(3) जलती घास
अंतिम साँस तक
पानी की आस ।

(4) फसलें धानी
अमृत कहलाता
नदी का पानी ।

(5) भूमि में वास
जल ही जीवन है
बुझाएँ प्यास ।
-०-
बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Saturday, 7 December 2019

क्रोध (आलेख) - बलजीत सिंह

क्रोध
(आलेख)
हम गर्मी के मौसम में कभी कभी ठंडा पेय पदार्थ 'सोडा' भी पी लेते हैं ,जिसके कारण हमारे शरीर की गर्मी थोड़े समय के लिए दूर हो जाती है । वह पेय पदार्थ इतना ठंडा होता है, अगर उसमें थोड़ा सा नमक डाल दिया जाए , वह उफान के साथ बाहर निकलता है । उसमें इतना जोश हो जाता है, वह रोकने पर भी नहीं रुकता । परंतु मनुष्य की रगों में तो खून बहता है। अगर उसके जख्मों पर कोई नमक से छिड़कता है, उसके हृदय में भी एक तूफान आता है , जो क्रोध का रूप धारण कर लेता है ।

जब व्यक्ति किसी बात या घटना के कारण आग-बबूला हो उठे,उसे क्रोध कहते हैं । यह हृदय की वह आग है ,जो आंखों में स्पष्ट दिखाई देती है । क्रोध की भावना मनुष्यों में ही नहीं ,जीव जंतुओं में भी पाई जाती है ।

किसी जंगल में तेज गति से तूफान आने पर ,वहां चारों तरफ हाहाकार मच जाता है ।पेड़ हिलने लगते हैं , टहनियां टूटने लगती हैं, सभी जीव अपनी- अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगते हैं ।पक्षियों के घोंसले ,वृक्षों के नीचे गिर जाते हैं और रेत वृक्षों की शाखाओं पर चल जाता है । यह कुछ समय का तूफान सारे जंगल को तहस-नहस कर देता है। इसी प्रकार क्रोध भी तूफान के समान होता है ।जब व्यक्ति क्रोध आता है ,वह अपने -पराए को नहीं पहचानता । उससे होने वाली हानि का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता । जब क्रोध धीरे-धीरे शांत होता है, तब उसे अपनी गलती का एहसास जरूर होता है ।

आकाश में जब कोहरा छाया रहता है ,उसमें कुछ भी नजर नहीं आता । सारा वातावरण अदृश्य होने लगता है । ऐसे में अगर हम किसी को आवाज देकर बुलाएं, वह कोहरे में अच्छी तरह सुनाई नहीं देगी । इसी प्रकार जब क्रोध उत्पन्न होता है, वह पूरे शरीर को अपने वश में कर लेता है। क्रोध के आवेश में व्यक्ति अपने होश- हवास भूल जाता है, जिसके कारण उसे अच्छा- बुरा कुछ भी दिखाई नहीं देता ।

एक जलते अंगारे को हम आग के पास ले जाएं ,वह पहले की अपेक्षा तेजी से जलना लगेगा । अगर हम उसे ठंडे स्थान पर रख दें ,वह जल्दी से बुझने लग जाएगा । इसी प्रकार क्रोध भी एक अंगारे के समान है । हमें जिस व्यक्ति पर क्रोध आता है, उसके सामने रहने से हमारा क्रोध और भी बढ़ जाता है । हम उससे जितना भी दूर जाएंगे ,तब हमारा क्रोध धीरे -धीरे शांत होगा ।

किसी कठोर फल को खाते समय, दांत भी टूट सकता है । ऐसे फल को खाने से पहले, हमें उसकी कठोरता को अवश्य देखना चाहिए ।परंतु उसे भूख में खाना किसी की मजबूरी भी हो सकती है ।इसी प्रकार भीड़ में, कोई हमारे पांव पर पांव रख देता है, उस समय हमें भी क्रोध आता है । हम उसकी मजबूरी को अच्छी तरह से समझते हैं , क्योंकि उसने ऐसा जान -बूझकर नहीं किया ।

जिस व्यक्ति को दौलत का नशा हो जाता है ,वह अपने -पराए को नहीं पहचानता । उसके अंदर अहं की भावना उत्पन्न हो जाती है , उसे दौलत के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता ।इसी प्रकार क्रोध के आवेश में व्यक्ति अंधा हो जाता है। उसके हाथ में कुछ भी वस्तु आती है, वह उसे तोड़ने का प्रयास करता है। वह उस वस्तु की कीमत को नहीं पहचानता ।

पौधे की जड़ में कीड़ा लगने पर, वह पौधा सूखने लगता है । उस पर किसी प्रकार के फल एवं फूल नहीं आते ।अगर समय पर उसकी देखभाल न की जाए, वह अपने आप नष्ट हो जाएगा । इसी प्रकार क्रोध भी एक कीड़े के समान है ,जो हमारे जीवन का विनाश करता है ।यह मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर बनाता है ।

लोग अक्सर केला खाने के पश्चात उसका छिलका रास्ते में फेंक देते हैं ।उस छिलके से किसी को चोट लग सकती है और वह दुर्घटना का कारण भी बन सकता है ।इसी प्रकार क्रोध का कारण चाहे कुछ भी हो ,परंतु उसका परिणाम कभी-कभी दूसरों को भी भुगतना पड़ सकता है । 
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बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Thursday, 26 December 2019

फूल (हाइकु) - बलजीत सिंह

फूल 
          (हाइकु)
(1) डाली का फूल
नाजुक सी जिन्दगी
करे कबूल ।

(2) फूलों की झोली
बिखर जाने पर
बने रंगोली ।

(3) तितली रानी
रंगीन फूलों पर
हुई दीवानी ।

(4) चाँद न तारे
अभिलाषा के पुष्प
सबसे प्यारे ।

(5) मिट्टी न धूल
विश्वास से महके
रिश्तों के फूल ।
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बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Friday, 10 January 2020

प्रकृति (हाइकु) - बलजीत सिंह

प्रकृति 
          (हाइकु)
(1) प्रत्येक पौधा
पर्यावरण हेतु
बना है योद्धा ।

(2) अनोखी बात
इन्द्रधनुष एक
रंग है सात ।

(3) तिरछी नोक
झालरदार पत्तें
पेड़ अशोक ।

(4) बादल काले
नील गगन पर
काजल डाले ।

(5) दृष्टि हैरान
गोल - गोल पर्वत
शंख समान ।
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बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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Thursday, 12 December 2019

ताना (आलेख) - बलजीत सिंह

ताना 
(आलेख)
खेल के मैदान में जब दो खिलाड़ी खेलते हैं ,उनमें से एक की जीत तथा दूसरे की हार निश्चित होती है । किसी भी कारण अगर एक खिलाड़ी घायल हो जाए, उसे खेल से बाहर कर दिया जाता है ।परंतु जिंदगी के मैदान में हार- जीत होती रहती है ।इसमें वही घायल होता है ,जिस पर ताना कसा जाता है ।

वह तीखी बात ,जो हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए, उसे ताना या व्यंग्य कहते हैं ।जब कोई व्यक्ति किसी को ताना देता है, यह दो अक्षरों वाला शब्द उसके दो जहान को हिलाकर रख देता है ।यह कड़वा सच है, इसका सामना सभी को करना पड़ता है ।

दौड़ते हुए रथ का एक पहिया निकलकर अलग हो जाए ,वह रथ वहीं पर चक्कर काटकर रुक जाएगा । इसी प्रकार जब व्यक्ति के मन में कोई बात चुभ जाती है ,उसकी स्थिति भी रथ के निकले पहिये के समान होती हैं । उसके मन में सोच -विचार बार-बार चक्कर लगाते रहते हैं। जैसे हवा सूखे पत्तों को अपने साथ उड़ाकर ले जाती है ,वैसे ही विचार मन को कहीं और ले जाते हैं ।

नदी के बहते हुए पानी की सतह पर, अगर हम रंग करना चाहे ,हमारा प्रयास विफल हो जाएगा, क्योंकि बहते पानी में रंग घुलकर आगे चला जाता है ।इसी प्रकार मन को समझाने का कितना भी प्रयास करें , वह अतीत की यादों में खोया रहता है ।ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने आप पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है । कभी-कभी उसे अपने आप से भी नफरत होने लगती है ।

उड़ते हुए गुब्बारे से अचानक हवा निकल जाए, वह घूमता हुआ नीचे की ओर आता है । इसी प्रकार जब व्यक्ति का मनोबल टूटने लगता है, उसका हृदय भी बिना हवा के गुब्बारे के समान हो जाता है । ऐसे अवसर पर मन की स्थिति कुछ इस प्रकार होती है । जैसे : ----

बसंत में मुरझाए फूल की तरह, सावन में उड़ती धूल की तरह ।
आग से निकलते धुएं की तरह , बिना पानी के कुएं की तरह ।
जहर उगलते हुए सांप की तरह ,उबलते पानी में भाप की तरह ।
भीगे होठों में प्यास की तरह , जंगल में सूखी घास की तरह ।
शेर की डरावनी दहाड़ की तरह , सागर में बर्फीले पहाड़ की तरह ।
कटी हुई बेल की तरह , भूल भुलैया के खेल की तरह ।
पानी की सतह पर रंग की तरह , लोहे की धातु पर जंग की तरह ।
कोयले की उड़ती राख की तरह , सर्दी में फटी पोशाक की तरह ।
आंधी में भड़कती आग की तरह , बुझे हुए चिराग की तरह ।
मिट्टी की सूखी पपड़ी की तरह , जाल में उलझी मकड़ी की तरह ।
कलम से बहती स्याही की तरह , जंग में लड़ते सिपाही की तरह ।
खाल में चुभती सुई की तरह , जलती हुई रुई की तरह ।
भोजन में मिले बाल की तरह , पेड़ पर लटके छाल की तरह ।
बहती नदी में उफान की तरह , बारिश में आए तूफान की तरह ।
भीगी हुई लकड़ी की तरह , फटी हुई ककड़ी की तरह ।
टूटे हुए मीनार की तरह , पत्थर में आई दरार की तरह ।
ग्रहण लगते सूरज की तरह , पानी में डूबे नीरज की तरह ।
घाव पर लगे नमक की तरह , आसमानी बिजली की चमक की तरह ।
रेत में धंसे पांव की तरह । सुनसान हुए गांव की तरह ।
मयूर के टूटे पंख की तरह , कभी न बजने वाले शंख की तरह ।
बिना रंगों की रंगोली की तरह , फीके पानी की होली की तरह ।
पानी में पड़े गत्ते की तरह , फटे ताश के पत्ते की तरह ।
भंवर बनाती हुई झील की तरह , निशाना साधती हुई चील की तरह ।
जाल बनाती हुई रस्सी की तरह , बिना मक्खन के लस्सी की तरह ।
कान में घुसे जल की तरह , बिना छिलके के फल की तरह ।
लहराते हुए सागर की तरह , छलकते हुए गागर की तरह ‌।
हाथ से निकले तीर की तरह , टेडी़ -मेडी़ लकीर की तरह ।

जल में रहने वाली मछली को कभी-कभी मगरमच्छ का सामना करना पड़ता है । उसी प्रकार जब व्यक्ति घर के आंगन से बाहर निकलता है , उसे भी जमाने की निगाहों का सामना करना पड़ता है । इस दुनिया में वे लोग भी रहते हैं , जिनके पास व्यंग्य- रुपी हथियार हैं । इन हथियारों के प्रभाव से व्यक्ति की आत्मा बंजर हो जाती है , जो मरते दम तक हृदय को तड़पाती रहती है ।
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बलजीत सिंह
हिसार ( हरियाणा )
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गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

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हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

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सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

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हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ