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Tuesday, 29 September 2020

मेरा आईना (कविता) - श्रीमती रमा भाटी

 

मेरा आईना
(कविता)
पूछता है मेरा आईना
क्या यह तुम ही हो
पहचानने की कोशिश 
करता हूं तुम्हें,
बहुत अनजानी सी
लगती हो तुम।

रोज देखा करता हूं
लेकिन कुछ बदली बदली
सी लगती हो तुम,
ना मुझे देख अब 
संजती संवरती हो तुम।

क्या अब तुम्हारा
मन नहीं करता
अपने को मुझमें देखो तुम,
तुम्हें क्या पता मेरा
अनुभव क्या कहता है।

याद है आज भी वो दिन
जब बार-बार आकर तुम
निहारती थी मुझे देख,
लगाती थी बिंदी तो
कभी संवारती थी बाल
मुझे देख तुम।

ना चुराओ तुम नजरें मुझसे
सवारों अपनी लहराती लटों को
जिनमें हिना का रंग है,
लगाओ अपनी चोटी में
फूलों का गज़रा तुम।
अब तुम्हें क्या हो गया
-०-
पता:
श्रीमती रमा भाटी 
जयपुर (राजस्थान)

-०-


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Tuesday, 28 July 2020

यादें (कविता) - श्रीमती रमा भाटी

यादें
(कविता)
क्या है यादें
किसी अपने के साथ
बिताए वो प्यारे पल,
यां देखे थे वो सपने
जो कभी पूरे ना हुए।
क्या है यादें।

खुशियों भरे वो लम्हे
प्यार भरे वो पल,
जी लिया तो प्यारा साथ
खो दिया तो हैं यादें।
क्या है यादें।

वो तुम्हारी सादगी
वो जुस्तजू तुम्हारी,
वो उदासी भरा चेहरा
ना खुलकर जिए कभी।
क्या है यादें।

उम्र के इस पड़ाव में
याद आती है वो मीठी
कड़वी यादें,
वो एक दूसरे का रूठना मनाना।
क्या है यादें।

कभी तुम्हारा देर से घर आना
और मेरा झूठा गुस्सा दिखाना,
बुढ़ापे में गर साथ
होता हमारा।
क्या हैं यादें।

क्या होता है अपनों
को खोने का दर्द,
अश्क हैं की याद
में उनकी थमते नहीं।
क्या है यादें।
हां यही है यादें
हां यही है यादें।
-०-
पता:
श्रीमती रमा भाटी 
जयपुर (राजस्थान)

-०-


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Saturday, 21 November 2020

मंजिल (कविता) - श्रीमती रमा भाटी

  

मंजिल
(कविता)
अगर चाहत हो मंजिल तक
पहुंचने की मत रुकना कभी
चलते रहना बस चलते रहना।

चाहे आयें मुश्किलें राहों में
या हो रास्ता चुनौती भरा
चलते रहना बस चलते रहना।

ना छोड़ना कभी उम्मीदों को
ना होना कभी मायूस तुम
चलते रहना बस चलते रहना।

उड़ान कितनी भी ऊंची हो
पांव जमीं पर ही रखना तुम
चलते रहना बस चलते रहना।

ख्वाहिशें सदा रखना जिंदा तुम
ना टूटने देना कभी विश्वास तुम
चलते रहना बस चलते रहना।

अंधियारों को चीरते हुए
जब दिखेगी रोशनी तुम्हें
वही होगी तुम्हारी मंजिल 
चलते रहना बस चलते रहना।
-०-
पता:
श्रीमती रमा भाटी 
जयपुर (राजस्थान)

-०-


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