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Monday, 18 January 2021

मेरा भारत महान है (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

  

मेरा भारत महान है
(कविता) 
मेरे देश को नमन करता यह जहान है,
हृदय गाता रहे मेरा भारत महान है।

जहाँ कल - कल बहती है गंगा पावन 
जहाँ  प्रतिक्षण बरसता है प्रेम का सावन,
जहाँ विवाह होता है सात जन्मों का बंधन
उस देश की भूमि को शत- शत वंदन,
पूण्य भारत भारती पर प्राण कुर्बान है।
हृदय गाता रहे मेरा भारत महान है...

जहाँ अहिंसा ही होती परम् धर्म है
जहाँ व्यक्ति जानते वेद,पुराणों का मर्म है,
जहाँ भाग्य से बड़ा होता सत्कर्म है,
जहाँ पिता नारियल का जैसा सख़्त और नर्म है,
मेरे देश में हिंदी भाषा का सम्मान है।
हृदय गाता रहे मेरा भारत महान है...

जहाँ प्रस्तर का भी पूजन होता है,
रूप तुलना में गुणों का नमन होता है,
त्योहारों पर आत्मीयता से आलिंगन होता है,
बुजुर्गों की सेवा का प्रचलन होता है,
भारत में माँ- बाप भगवान के समान हैं।
हृदय गाता रहे मेरा भारत महान है  ..
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

-०-


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Sunday, 22 November 2020

प्रेम (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

 
प्रेम
(कविता) 
प्रेम नश्वर देह की जैसे श्वांस है
हृदय का अडिग सा विश्वास है।
प्रेम है प्रियतम का सानिध्य,
दिल का रिश्ता बहुत खास है।
प्रेम जीवन की अनमोल पूँजी
धनी है वो,यह जिसके पास है।
प्रेम आत्मा से आत्मा का मिलन,
ईश्वरीय शक्ति का जैसे एहसास है।
प्रियतम की अनुपस्थिति लगती है,
जैसे चाँद बिन चकोर उदास है।
प्रेम है अनुभूतियों का विषय,
समर्पण,निष्ठा का इसमें वास है।
प्रेम भौतिकवादिता से है परे,
अलौकिक सौंदर्य का दास है।
प्रेम है औषधीय गुणों से परिपूर्ण,
आनंद, हर्ष और उल्लास है।
प्रेम है आशाओं का अखण्ड दीपक
यही जीवन की एकमात्र आस है।
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

-०-


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Tuesday, 3 November 2020

अरमान (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

 

अरमान
(कविता) 
आओगे जब पास हमारे,
हृदय में बिखरेंगे उजियारे।

अरमान की लौ जलती रहेगी,
सदियों तक दिल के द्वारे।

रवि से प्रतीत होंगे हमको,
साथ खड़े आशा के तारे।

कह दो व्याकुल मन से आज,
आकुल होकर नहीं पुकारे।

प्रेम दीप जलकर कहता है,
दूर हुए पथ से अँधियारे।

साँसों की गति बढ़ती जाती,
आओ न प्रिय निकट हमारे।

सीने की बढ़ती है धड़कन,
वश में नहीं अब जिया रे।

सिमट रही रात चादर में,
लाज का घूँघट हमको मारे।

प्रथम स्पर्श से रोमांचित
होने लगा प्रेम पिया रे।

बनकर मीत मनोरम साथी,
आ जाओ प्रियतम प्यारे।

भावुक स्नेहिल भावों से,
परिपूर्ण हुए हैं सभी नज़ारे।

आशाओं का जलता दीपक,
प्रेम ज्योति से रवि हुआ रे।

आकर गले लगा लो साथी,
विरह वेदना कौन गुजारे।

मैं कलिका बन जाऊं आज
तू भ्रमर बनकर मंडरा रे।
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

-०-


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Wednesday, 14 October 2020

पर्यावरण दिवस (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

 

पर्यावरण दिवस
(कविता) 
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रृंगार करें,
वृक्षारोपण करें, पतझड़ को हम बहार करें।

वृक्ष हमारे होते हैं सभी जीव जंतुओं के मित्र,
इनकी छाँव है अनुपम, सौंदर्य भी है विचित्र,
वृक्षों की देखरेख करके जीवन का उद्धार करें।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रंगार करें...

कोई रुग्ण न होवे जग में,बाधा न आवे मग में,
हरियाली हो आच्छादित कोई शूल न चुभे पग में,
हम दया सुधा से रोगी मानवता का उपचार करें।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रंगार करें...

कलम को बनाकर साथी,जीवन दर्शन लिख देवें,
विटप को पोषित करने की समाज को सीख देवें,
आओ व्यक्त हृदय के अनकहे सभी उद्गार करें।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रृंगार करें।

 पादप संरक्षण में प्रतिभाग करें सब मिलकर,
उद्यान बन जायेगी बंजर धरा भी खिलकर,
भौतिकवादी सोच पर आओ प्रहार करें।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रंगार करें..

वृक्ष ही होते हैं शुद्ध प्राणवायु के  वाहक,
मानव जाति बनी है क्यों इनकी संहारक?
आज प्राथमिकता से इस विषय पर विचार करें।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रृंगार करें..

स्नेह हस्त से साफ़ करें हम प्रकृति के अश्रु,
बिना तरुवर छाया के निराश्रय हैं निरीह पशु
सर्वत्र हरियाली हो व्याप्त, न कोई हाहाकार करे।
पर्यावरण दिवस पर धरा का दुल्हन सा श्रृंगार करें...
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

-०-


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Sunday, 27 September 2020

पितृ पक्ष (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

 

पितृ पक्ष
(कविता) 
पितृ पक्ष में हम अपने पितरों का स्मरण करते हैं,
श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं,
 पिंडदान की यह रीति है बहुत पुरातन,
 हृदय प्रसूनों का भावपूर्वक अर्पण करते हैं।

पूर्वज पूजा की यह प्रथा बहुत प्राचीन है,
 बिन पूर्वजों के हमारा जीवन प्राण- विहीन है,
 आभारी हैं हम अपने पितृ जनों के बहुत,
उनके स्नेहरूपी मेघों से आच्छादित हृदय जमीन है।


इसे अपर पक्ष नाम से भी जानते हैं हम,
पितरों को अपना सर्वस्व मानते हैं हम,
सोलह दिन की अवधि का होता है पितृ पक्ष,
पूर्वजों हेतु ब्रह्मभोज को मानते हैं हम।
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)


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Wednesday, 26 August 2020

नवजीवन (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

नवजीवन
(कविता) 
नवजीवन उर को देता है प्रेम,
दुःख सारे हर लेता है प्रेम,
जीवन के इस रंगमंच का,
असली अभिनेता है प्रेम।

पवन है नवजीवन का स्त्रोत,
परहित के भाव से ओतप्रोत,
सबकी श्वांस चलती है पवन से,
जलती इससे ही जीवन ज्योति।

नवजीवन प्रदान करता है जल,
जल से सुरक्षित आज और कल,
जल है जीवन हेतु अपरिहार्य,
जल से ही जीवन शुभ मंगल।

सावन करता है नवजीवन प्रदान,
अलंकृत करता है समस्त जहान,
कलियों में रंग भरतीं नेह बूंदे,
बिन सावन सूना है उद्यान।

नवजीवन सदैव देती है माता,
ईश्वर सदृश वह भाग्य विधाता,
सृष्टि की निरंतरता नारी से,
अंतस में ममत्व सागर लहराता।

नवजीवन मात्र एक शब्द नहीं है,
जीवन का ध्येय, प्रारब्ध यही है,
नवजीवन में सृजनात्मकता है,
रचनात्मकता में उपलब्ध यही है।
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)


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Tuesday, 28 July 2020

वेदना गान (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

वेदना गान
(कविता) 
असहाय जीव हो गया अमानवीय कृत्यों का शिकार,
ऐसी 'असभ्य- साक्षरता' पर है मुझको धिक्कार।

तनिक हुआ न हृदय में कम्पन,नयनों में अश्रु नहीं आये,
ऐसे पाषाण हृदय वाले आखिर क्यों मानव जन्म हैं पाये,
क्या दोष था उस हथिनी का, जो भूख से थी अति व्याकुल?
  उदर की भूख तृप्ति का उसे फल प्राप्त हुआ बेकार,
 इंसानों पर भरोसा करके काया हुई जल- जल कर अंगार।

गर्भ में ही जीवित जल गया नन्हा हाथी शावक,
अंतर्मन को झुलसाए प्रतिपल दुःख की पावक,
यदि तुम किसी भूखे को भोजन नहीं दे सकते हो,
तो फल रूपी मृत्यु देने का भी नहीं तुम्हें अधिकार।
तुम्हारे अपराधों की सजा तुम्हें मिलेगी बारम्बार।

मनुज नहीं तुम दैत्य हो, न कहना स्वयं को मानव,
तुम्हारे क्रूर कृत्यों ने बना दिया तुम्हें दानव,
 हृदय प्रस्तर हो चुका तुम्हारा,जम गया है रक्तप्रवाह?
जो कर्ण असमर्थ रहे सुनने में, एक जीव का चीत्कार,
क्या तुम्हारे अंतस में ग्लानि का, होता नहीं हाहाकार?

हम जी रहे हैं अब कैसे निकृष्ट समाज में?
दृग झुक रहे हैं पीड़ा, संताप और लाज में,
 उस निरीह प्राणी की मूक पीड़ा आकाश से बरसेगी,
बनकर प्राकृतिक आपदाओं का असीमित भंडार।
 लम्हों की इस खता को सदियों भोगेगा संसार।
-०-
पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)


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Saturday, 9 May 2020

कौमी एकता (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

कौमी एकता
(कविता) 
कौमी एकता का बीज अंकुरित करो जहान में,
सद्भाव की फसल उपजे,खेत और खलिहान में।

हिंदू, मुस्लिम,सिक्ख, ईसाई, आपस में सब भाई- भाई,
आखिर सच्चे रिश्तों पर क्यों शक की दीवार लगाई?
लहू सभी का जब है लाल,क्यों हो नफ़रतों से बदहाल?
नेहरू,कलाम,फर्नांडिस जैसे सुमन खिले उद्यान में।
कौमी एकता का बीज अंकुरित करो जहान में।

जब निर्मल बहती पवन करती है समान व्यवहार,
बिन भेदभाव के इंदु बांटे प्रकाश का उपहार,
क्यों धर्म के नाम पर हम करें नित्य तक़रार?
एकता के अखण्ड दीप जलाएं राष्ट्र के गुणगान में।
कौमी एकता का बीज अंकुरित हो जहान में।

मन वचन कर्म में शुचिता सभी धर्मों का मर्म है,
मज़हब का पर्यायवाची शब्द ही धर्म है,
मानवता की सेवा में निहित सर्वश्रेष्ठ कर्म है,
प्रत्येक धर्म साथ चले भारत के उत्थान में।
कौमी एकता का बीज अंकुरित करो जहान में।

बाइबिल, गीता , और कुरान एक ही हैं,
श्लोक,मन्त्र, आरती, अजान एक ही हैं,
धर्म, जाति, भिन्न हैं, हिन्दोस्तान एक ही है,
मतभेद की आंधियाँ न चलें वतन के मकान में,
कौमी एकता का बीज अंकुरित हो जहान में।
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पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

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Monday, 20 April 2020

साहस (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

साहस
(कविता) 
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा,
अपने संयम, सहनशक्ति को आजमाना होगा।

देश बन गया है असाध्य बीमारी का घर,
स्वयं पर अंकुश लगाकर देश बचाना होगा।
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा।

देश के हालात बद से बदतर हो रहे हैं,
हम सबको मिलकर अपना फ़र्ज निभाना होगा।
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा।

इस संकट में हिम्मत से काम लेने का प्रण करें,
अपनी सूझ-बूझ का परचम लहराना होगा।
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा।

वीरभूमि है भारत, देशभक्ति से ओतप्रोत है,
अपने भक्ति भाव का साक्ष्य दिखाना होगा।
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा।

अगर इस जहान में कहीं भी ईश्वर है साथियों,
मानव रूप में उसे धरती पर लाना होगा।
आज हम भारतीयों को साहस दिखाना होगा।
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पता
प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

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Sunday, 5 April 2020

जीवन यथार्थ (कविता) - प्रीति चौधरी 'मनोरमा'

जीवन यथार्थ 
(कविता) 
दुर्गंध युक्त वातावरण है बहुत
सड़कों पर चीरहरण है बहुत।

वास्तविक रूप कैसे देखें मनुज का,
नीयत पर ढका आवरण है बहुत।

वही करुण क्रंदन ,वही मन का रुदन,
जहाँ जीवन है, वहाँ मरण है बहुत।

जीवन की थकन अब विश्राम चाहे,
करता कोमल तन भ्रमण है बहुत।

शान्ति चैन अमन सब कल्पना की बातें,
प्रतिदिन जीवन में अब रण है बहुत।

जल वायु , मृदा सर्वस्व प्रदूषित,
मैला हुआ प्रकृति का कण- कण है बहुत।

मृत आशाओं का संग्रहालय सा जीवन,
मृगतृष्णा के पीछे विचरण है बहुत।

प्रसन्नता मां बाप के घर छोड़ आये प्रीति,
पराये देश में उदासी के कारण है बहुत।।
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पता

प्रीति चौधरी 'मनोरमा'
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)
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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

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हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ