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Monday, 11 January 2021

शायद तुमको पता नहीं (कविता) - अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'

   

शायद तुमको पता नहीं,,,
 (कविता)

आकर्षण बेघर कर देगा

शायद तुमको पता नहीं

कब ज़ख्मों को तर कर देगा।

शायद तुमको पता नहीं।।,,,


रोज़-रोज़ का सपना बुनते

नहीं किसी का कहना सुनते,

नये-नये सन्दर्भों को हम

चुनते जाते गुनते-धुनते।

जग सब तितर-बितर कर देगा,

शायद तुमको पता नहीं,,,


कोई मन का मीत न मिलता,

यौवन फिर सुपुनीत न मिलता,

तुम आते यदि नहीं जुबाँ पर,

शब्दों को संगीत न मिलता।

शाप कोई पत्थर कर देगा,

शायद तुमको पता नहीं,,,


तुम मेरा सब नेह छोड़कर,

दूर गए क्यों गेह छोड़कर,

अरमानो के मेह(बादल)मोड़कर

संकल्पों की देह तोड़कर।

-०-
पता 
अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'
गया (बिहार) 


-०-

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Thursday, 22 October 2020

यह जीवन कितना देता है (कविता) - अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'


यह जीवन कितना देता है
 (कविता)

यह जीवन कितना देता है यदि धैर्य रखे तू जीवन में।
अमृत भी अनायास देता मदिरा के खाली बर्तन में।।

परतों पर परतें लाद के तू जग में पावन अभिमानों की,
अभिनयी शक्ति से हर पल ही नव मूर्ति गढ़े इंसानों की।
यश अपयश हानि लाभ जीना मरना सब सौंप विधाता को,
जब आत्मगंग में मज्जन कर मुख देख ज़रा अब दर्पण में।।
यह जीवन कितना,,,,,

भेजा माँ ने कर्तव्य मार्ग पर डट जाने का मंत्र फूँक,
"माँ!आजाना" बस कह कर चुप हो जाती है शाविका हूक।
हम सम्बन्धों की डोर बनाकर नित ही जूझा करते हैं,
पर अहा! मुक्त आभास हुआ करता है मुझको बन्धन में।।
यह जीवन कितना देता है,,,

हिलता डुलता घट कब कोई परिपूर्ण कहाँ हो सकता है,
हर अवसर पंख लगा उड़ता कब किसके आगे रुकता है।
उस महाकाल की रचनाओं में तू भी एक संरचना है
कब अवगुंठित अखिलेश हुआ किस इंद्रधनुष आकर्षण में।।
यह जीवन कितना देता है
यदि धैर्य रखें तू जीवन में।| 

-०-
पता
अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'
गया (बिहार)

-०-



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Monday, 16 November 2020

आज-कल (कविता) - अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'

 

यह जीवन कितना देता है
 (कविता)

जिंदगी कसमसाने लगी आज-कल

मौत भी आजमाने लगी आज-कल

नीड़ निर्माण करने के सपने लिए

आँख भी डबडबाने लगी आज-कल

रोए-धोए बहुत उम्र की सीढियाँ

मैल रंगत दिखाने लगी आज -कल

देवता सा बना ही रहा आज तक

धीर नौका सिराने लगी आज-कल

टूटता भी नहीं ,दिल भी फटता नहीं

साँस दामन छुड़ाने लगी आज कल।

हे जगत के नियंता बुला लो मुझे

आपकी याद आने लगी आजकल।

-०-
पता 
अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'
गया (बिहार) 


-०-



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Thursday, 24 December 2020

मधुरिम परिणय (कविता) - अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'

  

मधुरिम परिणय
 (कविता)

"मधुरिम परिणय की बेला पर आमंत्रण स्वीकार करो।

गौरी-गणपतिगण साक्षी हैंब

गठबंधन स्वीकार करो।।


मेंहदी लगे हुए हाथों को उस दिन पहली बार छुआ,

जीवन के सत्संकल्पों का सेंदुर बन श्रृंगार हुआ।

दो वंशों के सम्बन्धों पर जीवन आज निसार करो।।

मधुरिम परिणय,,,,


मैं माँ की गुदड़ी का लालन तुम पापा की रानी हो,

मेरी यात्रा की सहगामी मेरी अमर कहानी हो।

अब सुख दुःख के पार निकल कर  जीवन का व्यवहार करो।।

मधुरिम परिणय,,,


तेरे स्वप्न नहीं जैसा मैं और न सुन्दर काया है,

भीतर एक तपोवन करके यह सब मैंने पाया है।

पूज्य देहरी पर्णकुटी की दीपक बन उजियार करो।।

मधुरिम,,


बिन दहेज के दूल्हन के पग घर आएँ यह कर डाला,

इस समाज को राह दिखाती सदा रहेगी वरमाला।

सुविधाभोगी मत करना मन पीढ़ी में संस्कार भरो।।

मधुरिम,,,


नियत समय की सरल सीढ़ियों पर हमने दो दीप धरे,

हे प्रभु इनकी रक्षा करना चाहे जितने मेघ घिरे।

हम जब बूढ़े हो जाएँगे सोचो संव्यवहार करो।।

मधुरिम परिणय की बेला पर आमंत्रण स्वीकार करो।।

-०-
पता 
अखिलेश चंद्र पाण्डेय 'अखिल'
गया (बिहार) 


-०-



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