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Monday, 18 January 2021

रूठकर उदास (ग़ज़ल) - अलका मित्तल


रूठकर उदास 
(ग़ज़ल)
रूठकर उदास बैठी हैं ख़ुशियों इक ज़माने से
पर ग़म चले आते हैं किसी न किसी बहाने से

ओढ़ने से चादर ग़मों की हासिल कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी के कुछ दर्द चले जाते हैं मुस्कुराने से

कभी पा लूँ उसे ये तो शायद मुमकिन ही नहीं
तबियत बहल जाती है ख़्याल उसका आने से

ख़्वाहिश न हो जब तलक रिश्ते नहीं बनते
गर चाहो दिल से बात बन जाती है बनाने से।

तुम कभी दिल की गहराइयों से अपनी पूछना
कितना सुकूँ मिलता है ओरो के काम आने से

खामोशियाँ सी छा गईं उसके मिरे दरमियाँ
नहीं भूलती वो यादें”अलका”लाख भुलाने
-०-

पता:
अलका मित्तल
मेरठ (उत्तरप्रदेश)

-०-

***
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Thursday, 26 November 2020

किसी बहाने से (ग़ज़ल) - अलका मित्तल

 

किसी बहाने से
(ग़ज़ल)
रूठकर उदास बैठी हैं ख़ुशियों इक ज़माने से
पर ग़म चले आते हैं किसी न किसी बहाने से

ओढ़ने से चादर ग़मों की हासिल कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी के कुछ दर्द चले जाते हैं मुस्कुराने से

कभी पा लूँ उसे ये तो शायद मुमकिन ही नहीं
तबियत बहल जाती है ख़्याल उसका आने से

ख़्वाहिश न हो जब तलक रिश्ते नहीं बनते
गर चाहो दिल से बात बन जाती है बनाने से।

तुम कभी दिल की गहराइयों से अपनी पूछना
कितना सुकूँ मिलता है ओरो के काम आने से

खामोशियाँ सी छा गईं उसके मिरे दरमियाँ
नहीं भूलती वो यादें”अलका”लाख भुलाने
-०-

पता:
अलका मित्तल
मेरठ (उत्तरप्रदेश)

-०-

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Friday, 17 April 2020

काँटों पे चलना (ग़ज़ल) - अलका मित्तल


काँटों पे चलना
(ग़ज़ल)
गर पाना है मंज़िल तो,काँटों पे चलना पड़ता है,
जग के उजियारे की ख़ातिर सूरज को तपना पड़ता है।

ग़म अंदर हों चाहे जितने,उनको सहना पड़ता है,
अपनो का दिल रखने को अश्क़ो को छुपाना पड़ता है।

सच के आगे बिका झूठ,दाम लगाना पड़ता है,
चलन है ये इस दुनिया का दस्तूर निभाना पड़ता है।

नहीं देर तक रहता साया,मिटना तो उसको पड़ता है,
खेल है ये बस धूप छाँव का मन को समझाना पड़ता है।

क़द कितना भी हो ऊँचा,झुकना फिर भी पड़ता है,
घर की साख बचाने को दिल पत्थर करना पड़ता है।-०-
पता:
अलका मित्तल
मीरत (उत्तरप्रदेश)

-०-

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Thursday, 2 April 2020

मखमली अहसास (ग़ज़ल) - अलका मित्तल

मखमली अहसास 
(ग़ज़ल)
मखमली अहसास दिल में बसाकर रखना,
ख़्वाब आँखों में रोज़ इक सजाकर रखना।

यकीनन रात के बाद सुबह होगी ये तय है,
बदलेगा वक्त उम्मीद दिल में जगाकर रखना।

कितनी दूर तलक जाना है अब ये तुम जानो,
लौटकर आने का रास्ता भी बनाकर रखना।

बदल दिया है उसूलों को अपनो की खातिर,
वाजिब होगा आँखों के पर्दे गिराकर रखना।

भरोसा कितना है तुम्हें खुदपर ये तो तुम जानो,
ज़रूरी ये है सामने वाले पर भी नज़र रखना।

गुज़र जाती है ताउम्र इक उम्मीद के सहारे,
होगी शबे-विसाल साँसों को मुंतज़िर रखना।-०-
पता:
अलका मित्तल
मीरत (उत्तरप्रदेश)

-०-

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Wednesday, 16 December 2020

वादा-ए-वफ़ा (ग़ज़ल) - अलका मित्तल

  

वादा-ए-वफ़ा
(ग़ज़ल)
वादा-ए-वफ़ा निभाने का जमाना नहीं रहा,
चाँद तारे तोड़कर लाने का जमाना नहीं रहा।

सिमटकर वक्त की चादर भी छोटी हो गई,
अब मिलने और मिलाने का जमाना नहीं रहा।

दोस्ती के मायने भी अब पहले से कहाँ रहे?
इक दूजे पे जाँ लुटाने का जमाना नहीं रहा।

कुछ मसअले हल हो जाते थे आपस में भी,
दूसरों के काम आने का अब जमाना नहीं रहा।

दूर कहाँ होते थे कभी जो दिल के क़रीब थे,
अब रूठे हुओ को मनाने का जमाना नहीं रहा।

हर कोई अब अपने में ही मशगूल हो गया,
अपनो का साथ पाने का जमाना नहीं रहा।

रूह तक जुड़े होते थे कभी दिलों के अहसास,
अब दिलों में बस जाने का जमाना नहीं रहा।
-०-

पता:
अलका मित्तल
मेरठ (उत्तरप्रदेश)

-०-

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Friday, 8 January 2021

ग़मों का ज़िन्दगी (ग़ज़ल) - अलका मित्तल

   

ग़मों का ज़िन्दगी
(ग़ज़ल)
ग़मों का ज़िन्दगी में आना भी लाज़मी है,
मगर हर हाल में मुस्कुराना भी लाज़मी है।

मिले मंज़िल और सफ़र आसां हो जाये।
किसी को अपना बनाना भी लाज़मी है,

ग़र चाहत है हो जाएँ ख़्वाब सभी पूरे अपने,
दिल में ख़्वाहिशों को जगाना भी लाज़मी है।

छा जाए जब घटा दिल पर ग़मों की भारी,
दर्दे-दिल शायरी में बहाना भी लाज़मी है।

महसूस हो सहरा में भी चमन की ख़ुशबू ,
तो फिर कहीं दिल लगाना भी लाज़मी है।
-०-

पता:
अलका मित्तल
मेरठ (उत्तरप्रदेश)

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