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Friday, 26 March 2021

कैसे खेलूँ होली (कविता) - पता: रीना गोयल

कैसे खेलूँ होली 
(कविता)
घटा घनी आतंकी छायी , खून भरी लगती होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

धूमिल होती सब आशाएं, सो गई हैं कामनाएं ।
रुद्र गीत ही धमनियों में ,गा रही हैं वेदनाएं ।
नाचूँ गाऊँ कैसे फिर.मैं ,कैसे फिर खेलूँ होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

धरा बहाती आँसू बूंदे , सुन विलाप विधवाओं का ।
पुँछना है सिन्दूर अभी तो , कितनी ही सधवाओं का।
धरा रंग जब लाल रक्त से ,कैसे फिर खेलूँ मैं होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

जलती शहीदों की चिताएं ,है ज्वाल भरती श्वास में ।
तब ही जलेगी होलिका जब ,दुश्मन हो मृत्यु पाश में ।
घायल अभी सम्वेदनाएँ , कैसे फिर खेलूँ होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Monday, 8 March 2021

नारी तुम्हें नमन (कविता) - रीना गोयल

नारी तुम्हें नमन
(कविता)
(कुकुभ छंद गीत)

जिसके  बिन जीवन मे तम है ,दीप वही  प्रकाशित नारी 
घर -आँगन जो सुरभित करती ,सुमन सुशोभित वह क्यारी।
त्याग ,समर्पण ,दया,शीलता ,सब मिल नारी बनती है।
कभी तोड़ने अहं दुष्ट का , चण्ड रूप भी धरती है ।
भिन्न -भिन्न रुपों को धारे , दुर्गा की है अवतारी  ।
घर -आँगन जो सुरभित करती ,सुमन सुशोभित वह क्यारी  ।

नारी है बहते पानी सम ,हर स्थिति में ढल जाती ।
पुत्र पले जब लाड़ चाव से ,पुत्री यूँ ही पल जाती  ।
जननी  भी है जग पालक भी ,नहीं किसी क्षण वह हारी ।
घर -आँगन जो सुरभित करती ,सुमन सुशोभित वह क्यारी ।

नमन करें इस महा शक्ति को ,नारी जग की मर्यादा ।
संस्कार की शाला नारी  , प्रेम लुटाती वह ज्यादा।
आदि काल से पूजित नारी , रहती हर नर पर भारी ।
घर -आँगन जो सुरभित करती ,सुमन सुशोभित वह क्यारी  ।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Wednesday, 9 December 2020

अँधियारा (कविता) - रीना गोयल

 

अँधियारा 
(कविता)
आशा की स्वर्णिम किरणें फिर ,लायी नवल प्रभात ।
अब होगा उत्थान मनुज का ,तम पर कर प्रतिघात ।।

💫💫💫🌹🌹💫💫💫

रंग भेद औ जाति- पाति की,टूटेंगी दीवार ।
क्षमताओं की दीप्त प्रभा में ,छँटे सभी अँधियार ।
ऊँचा रहे मनोबल तो हो ,निराशाओं की मात ।
अब होगा उत्थान मनुज का ,तम पर कर प्रतिघात ।।

💫💫💫🌹🌹💫💫💫

जीवन है श्रम और साधना ,सहज सरल  मनभाव ।
श्वास डगर के सभी पथिक हैं ,नहीं तनिक ठहराव ।
दृश्य जगत मत उलझ बटोही ,मत कर उर आघात ।
अब होगा उत्थान मनुज का ,तम पर कर प्रतिघात ।।

💫💫💫🌹🌹💫💫💫

अभी नहीं हिम्मत  हारो तुम ,करो विजय की आस ।
पार क्षितिज के जाना तुमको ,सोच यही हो खास ।
तुम्हें कभी जो  छू भी पाए ,दुख की क्या औकात ।
अब होगा उत्थान मनुज का ,तम पर कर प्रतिघात ।।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Tuesday, 20 October 2020

सृजन महोत्सव : माह सितंबर २०२० की उत्कृष्ट रचनाएँ

 सृजन महोत्सव पटल की माह सितंबर २०२० की उत्कृष्ट रचनाएँ 

               आप सभी को बताते हुए हर्ष हो रहा है कि पिछले वर्ष दीपावली के पावन पर्व पर प्रारंभ किए इस पटल पर आज तक ३२५ से अधिक साहित्यकार एवं उनकी लगभग १२०० से भी अधिक रचनाएँ प्रकाशित की जा चुकी है. सभी रचनाकारों की विभिन्न विधाओं में प्रेषित और इस पटल पर प्रकाशित रचनाएं मौलिक एवं स्तरीय है, इसमें कोई दोराय नहीं है. आप सभी सृजन धर्मियों का बहुत ही अच्छा प्रतिसाद, स्नेह और प्रेम मिल रहा हैं. इसके चलते आज तक लगभग ५२,००० से भी अधिक  लोगों ने इस पटल को भेट दी है.
              आज इस पटल के माह सितंबर २०२० की सर्वाधिक पसंदीदा गद्य और पद्य विधा की सर्वाधिक पसंदीदा रचनाकार को भी सृजन महोत्सव परिवार की और से प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया जा रहा है. वह निम्न हैं -


गद्य विधा में भारत वर्ष के सरस्वती नगर (हरियाणा) की 
रीना गोयल जी की लघुकथा 'शुद्धिकरण' पर
'गद्य सृजन शिल्पी' 
सम्मान से 
पटल की ओर से सम्मानित करते हुए तथा
सम्मान पत्र सपुर्द करते हुए हर्ष हो रहा हैं.


यह रचना पढ़ने के सम्मान पत्र पर क्लिक करें
-०-
पद्य विधा में भारत वर्ष के मंगळवेढा (महाराष्ट्र) के
गोरक्ष जाधव जी की कविता 
'स्व-अनुशासन' पर
'पद्य सृजन शिल्पी'
सम्मान से 
पटल की ओर से सम्मानित करते हुए तथा
 सम्मान पत्र सपुर्द करते हुए हर्ष हो रहा हैं. 


यह रचना पढ़ने के सम्मान पत्र पर क्लिक करें
****
दोनों सृजन शिल्पियों का एवं हमारे साथ जुड़े सभी साहित्य कर्मियों का
हार्दिक आभिनंदन !!!



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Tuesday, 29 September 2020

शुद्धिकरण (लघुकथा) - रीना गोयल

शुद्धिकरण 
(लघुकथा)
            माया देवी एक धनाढ्य परिवार की  उच्च जाति की महिला थी ।पति की असमय मृत्यु के बाद उन्होने  ही अपने दोनों बेटों ,मनुज ओर अनुज को अकेले पाला था। किन्तु उच्च जति का गर्व उनकी हर बात में झलकता था... मनुज का विवाह अपनी जाति और बराबर के खानदान में करके फूली नही समायी थी  वे । लेकिन अनुज को  उसके साथ काम करने वाली दलित सुधा से प्रेम हो गया था । माँ के बहुत विरोध करने पर भी अनुज ने सुधा से विवाह कर अलग रहना शुरू कर दिया ।माया देवी ने स्वीकार जो नही किया सुधा को ...
            समय बीतता रहा ......
             दो वर्ष बाद जाने कैसे माया देवी के पूरे बदन में कोढ़ निकल आया कोई पास लगने को तैयार नही 
मनुज की पत्नी तो देखती भी नही थी । बहुत बुरी हालत हो चली थी माया देवी की लेकिन ऐसी स्थिति में सुधा ने दलित होते हुए भी माया देवी की जी जान से सेवा की  ओर रोग मुक्त करके ही  चैन लिया। सुधा के अथक प्रयास से वह बिल्कुल स्वस्थ हो गयी  अब माया देवी  सुधा से किये अपने  व्यवहार पर बहुत शर्मिंदा थी ।
"सोच रही थी शुद्धि कर्ण किसका हुआ था "
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Sunday, 13 September 2020

दिलासा, सांत्वना (कविता) - रीना गोयल

दिलासा, सांत्वना
(कविता)
क्यों जीवन से हार गए हो ,आस किरण को मत तोड़ो ।
मन को तनिक दिलासा दो तुम,दुख से यूँ मुँह मत मोड़ो ।

क्यों संताप करें अतीत पर ,बुरे समय में रुदन करें ,
दुविधा से टकराना सीखें,असफलता का दमन करें ,
संकल्पों को नई राह दो ,मन उम्मीदों से जोड़ों।।

मन को तनिक दिलासा दो तुम,दुख से यूँ मुँह मत मोड़ो ।

मौन निशा के अंधकार के ,बाद सवेरा होता है ,
पाने का सुख वो ही समझे ,जो अपना कुछ खोता है ,
धन दौलत तो मात्र चंचला ,व्यर्थ मोह इनसे छोड़ो ।।
मन को तनिक दिलासा दो तुम,दुख से यूँ मुँह मत मोड़ो ।

अगर निरंतर यतन रहे तो ,किस्मत साथ निभाती है ,
धर्म समझ लो अगर कर्म को ,मंजिल गले लगाती है ,
ठोकर देती सीख सदा ही ,तार दिलों के मत तोड़ो ।।
मन को तनिक दिलासा दो तुम,दुख से यूँ मुँह मत मोड़ो ।।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Wednesday, 2 September 2020

क्या इसको जीना कहते हैं (कविता) - रीना गोयल

क्या इसको जीना कहते हैं
(कविता)
भड़क रही सीने में पल- पल ,आग नफरतों की यह कैसी ।
दुखी हृदय सब देख विकल है ,क्या इसको जीना कहते हैं ।

भ्रष्ट हो गयी राजनीति है , भूल चुकी ईमान तभी ये,
क्यों विनाश की और चले हैं,भ्रमित हुए इंसान सभी यें ,
होली खेलें चलो रक्त से ,चौड़ा कर सीना कहते हैं ।।
दुखी हृदय सब देख विकल है ,क्या इसको जीना कहते हैं।।

चेहरे पर चेहरा रख घूमें,हैवानों की भीड़  बढ़ी अब,
अस्मत लुट जाए अबला की ,क्या जाने किस दुखद घड़ी रब ,
वस्त्रहीन कर जला जिस्म कर ,रसिक ज़रा पीना कहते हैं ।।
दुखी हृदय सब देख विकल है ,क्या इसको जीना कहते हैं।।

कैसी ये आजादी पायी ,क्या अब झूमूं नाचूँ गाऊं ,
जाति धर्म टकराव देखकर ,या रब जिंदा ही मर जाऊं ,
कदर गँवा दी वही देश जो गौरों से छीना कहतें हैं ।।
दुखी हृदय सब देख विकल है ,क्या इसको जीना कहते हैं।।
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पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Monday, 24 August 2020

विनय सुनो मेरी (कविता) - रीना गोयल

विनय सुनो मेरी
(कविता)
हे! दुख हरता हे!सुख करता ,विनय सुनों मैं दास तुम्हारा ।।
आया हूँ अब शरण तुम्हारी ,काटो सकल कलेश हमारा ।।

शिव गौरी के राज दुलारे ,दीन दुखी के रखवारे ।
रिद्धि सिद्धि के दाता प्रभु जी ,जग पालक,पालन हारे ।
हृदय लुभाती भोली सूरत ,अनुपम है परिवेश तुम्हारा ।।
हे! दुख हरता हे!सुख करता ,विनय सुनों मैं दास तुम्हारा।।


सब देवों में प्रथम पूज्य हो ,मंगल करते मंगलकारी ।
अति प्रिय भोग तुम्हें मोदक का ,मूषक राजा बने सवारी ।
सकल भुवन है चरण ;शरण में ,जब जब हो आदेश तुम्हारा ।।
हे! दुख हरता हे!सुख करता ,विनय सुनों मैं दास तुम्हारा।।

थाल सजा हम करें आरती ,द्वार दया का प्रभु अब खोलो ।
लम्बोदर,गणपति,गणनायक,सारे मिलकर जय हो बोलो ।
दशों दिशा दिगपाल जहाँ में , है सत्कार विशेष तुम्हारा ।।
हे! दुख हरता हे!सुख करता ,विनय सुनों मैं दास तुम्हारा।।
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पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Monday, 17 August 2020

जाड़े की धूप (कविता) - रीना गोयल

जाड़े की धूप
(कविता)
कँपकपाती सर्दियों में ,धूप जाड़े की लुभाई ।
रौशनी बिखरी हवा में ,रश्मियां रवि की सुहाई ।

थरथराता था बदन जब ,शीत झोंके चल रहे थे ।
शूल सी उनकी चुभन में ,रात दिन बस ढल रहे थे ।

वो दिसम्बर का महीना ,ओस में अवनी नहाई ।
रौशनी बिखरी हवा में ,रश्मियां रवि की सुहाई ।

किन्तु बर्फीले दिनों में ,पीर हृद की सह रहा मन ।
सर्दियां मुझको सताएं ,क्यों अकेले रह रहा मन ।

शर्म से तब लजलजाती इक दुल्हन सी धूप आयी ।
रौशनी बिखरी हवा में ,रश्मियां रवि की सुहाई ।
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पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Saturday, 15 August 2020

हिदुस्तान हमारा प्यारा (कविता) - रीना गोयल


हिदुस्तान हमारा प्यारा
(कविता)
सार  ललित छन्द
हिदुस्तान हमारा प्यारा ,जन जन का है नारा ।
भारत माँ के जयकारों से , गूंज रहा जग सारा ।
         
छटा प्रकृति की अद्भुत बिखरी ,अनुपम रूप घनेरे ।
ऋषियों ,मुनियों ,विद्वानों के ,सदा रहे हैं डेरे ।

गंगा, जमुना ,सरस्वती की ,बहती निर्मल धारा ।
भारत माँ के जयकारों से , गूंज रहा जग सारा ।।

लाल किला है शान देश की ,ध्वजा यहीं फहराते ।
चिह्न प्रेम का ताजमहल  है,सभी  देखने आते ।

वीर सपूतों ने इस भू पर ,तन मन अपना वारा ।।
भारत माँ के जयकारों से , गूंज रहा जग सारा ।।

नीलवर्ण परिधान पहन नभ,  करता करतब न्यारे ।
सागर में भी गहरे कितने , मोती बिखरे प्यारे ।।

सूरज निकले बाँह पसारे ,करे दूर अँधियारा।।
भारत माँ के जयकारों से , गूंज रहा जग सारा ।।

सुरभित,सुंदर पुष्प निराले , नई ताजगी देते ।
औषधियों से पूरित वन भी , कठिन रोग हर लेते ।

इस भारत माता पर अपना  ,अर्पण जीवन सारा ।।
भारत माँ के जयकारों से ,गूंज रहा जग सारा ।।
-०-
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)




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Monday, 25 May 2020

माँ तुम ही हो मीत (कविता) - रीना गोयल

माँ तुम ही हो मीत
(कविता)
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।
सूने सूने वन उपवन सब ,मौन हृदय के गीत ।

रंग धूप का धुआं हुआ है ,गहन हुआ अँधियार ।
सन्नाटा लिपटा तरुवर से ,बर्फ बनी जलधार ।
सुबह खोजती है सूरज को , लगा धूप से आस ।
ओझिल आकृतियां है सारी ,कौन बुलाये पास ।
बीहड़ इस निर्जन जंगल में,मात दिखाए प्रीत ।
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।।

अपनी साँसों की गर्मी से ,शीत करे माँ दूर ।
ममता के आँचल में छुपकर ,सुख मिलता भरपूर ।
है ममत्व में मात बिचारी ,मौन नैन के बैन ।
कभी धूप के देव जगेंगे ,तब आये कुछ चैन 
कठिन हुआ है जीवन जबसे ,बिछड़ गया मनमीत ।
सिकुड़ गया है गात ठंड से ,चुभे शूल सा शीत ।।
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पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Monday, 11 May 2020

हाय रे मोटापा ! (हास्य दोहे) - रीना गोयल

हाय रे मोटापा !
(हास्य दोहे)
मोटापे से हो रही , भारी भरकम देह।
विरला ही कोई मुझे, अब करता है स्नेह।।१।।

लापरवाही थी करी, खूब किया नित भोज।
पर गरिष्ठ आहार की ,आँखें करती खोज।।२।।

चर्बी घटती ही नहीं, बनी हुई हूँ ढोल ।
सुंदर तन इतिहास का, बदल गया भूगोल।।३।।

दर्पण में देखूं अगर , उठती मन में पीर।
कुछ ही दिन में हाय रे! हथिनी बना शरीर।।४।।

लेकिन यदि कोई कहे, मोटी मुझको आज।
जीभ काटकर फेंक दूँ , यह मेरा अंदाज़।।५।।
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रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Saturday, 25 April 2020

कैसा आया नया जमाना (कविता) - रीना गोयल

कैसा आया नया जमाना
(कविता)
माँ की ममता लगे भुलाने ,कैसा आया नया ज़माना ।
मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।।१।।

बहु ब्याह मैं चाव से लाई,सीख गृहस्थी की सिखलाई ।
शायद कोई कमी रह गयी ,मैं ही उनको कभी न भाई ।
दबी ज़ुबाँ वो पति से कहती ,इनको आता नही निभाना ।।२।।

मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।
हाथ पिया ने भी छिटकाया ,चले गए क्यूं तन्हा करके ।
साथ जियेंगे साथ मरेंगे ,वादे धुआँ -धुआँ सब करके ।
बहुत विवश लेकिन जिन्दा हूँ ,जीने का क्या करूँ बहाना ।।३।।

मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।
विनती की दी लाख दुहाई ,दया ज़रा तो मुझ पर खाओ ।
इक कोने में पड़ी रहूंगी ,पकी उम्र में मत ठुकराओ ।
लेकिन बंद किये दर मुझ पर ,मुझको समझा है बेगाना ।।४।।

मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।
किस्मत के हैं खेल अनोखे ,आज छिने हैं सभी सहारे ।
उन अपनों ने दिल को तोड़ा ,जिनको कहती आँख के तारे ।
मात-पिता अब लगते गाली ,बदल गया वो दौर पुराना ।।५।।

मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।
बीच राह लाचार खड़ी हूँ ,तुम ही सुनलो आन कन्हाई ।
बिदा किया बेटों ने घर से ,दुनियाँ से तुम करो बिदाई ।
अर्ज यही बस तुमसे मेरी ,दर-दर मुझको मत भटकाना ।।६।।

मेरे बच्चे कहते मुझसे ,माँ अब ढूंढो और ठिकाना ।।
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रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Thursday, 26 March 2020

मजदूर (कविता) - रीना गोयल

मजदूर
(कविता)
भोर से ही काम मे रत हो रहे मजदूर ।
साँझ को थक हार घर को लौटते मजदूर ।
ध्येय है पैसा कमाना ,पेट की है मांग ।
बेइमानी ना करें पर ,सत्य निष्ठा लांघ ।।

बोझ कांधो पर चढ़ा है ,पालते परिवार ।
फावड़ा ले हाथ करता ,कर्म हेतु प्रहार।
बांध नदियों पर बनाते ,श्रम करें भरपूर ।
तोड़ते हैं पत्थरों को ,रात दिन मजदूर ।।

चीथड़े तन पर लपेटे ,कर्म में तल्लीन ।
जूझते मजबूरियों से ,लोग कहते दीन ।
है बना उनका बसेरा ,ये खुला आकाश ।
एक दिन किस्मत खुलेगी ,मन भरा विश्वास ।।
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रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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Friday, 13 March 2020

कैसे खेलूं होली (कविता) - रीना गोयल


कैसे खेलूं होली
(कविता)
घटा घनी आतंकी छायी , खून भरी लगती होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

धूमिल होती सब आशाएं, सो गई हैं कामनाएं ।
रुद्र गीत ही धमनियों में ,गा रही हैं वेदनाएं ।
नाचूँ गाऊँ कैसे फिर.मैं ,कैसे फिर खेलूँ होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

धरा बहाती आँसू बूंदे , सुन विलाप विधवाओं का ।
पुँछना है सिन्दूर अभी तो , कितनी ही सधवाओं का।
धरा रंग जब लाल रक्त से ,कैसे फिर खेलूँ मैं होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।

जलती शहीदों की चिताएं ,है ज्वाल भरती श्वास में ।
तब ही जलेगी होलिका जब ,दुश्मन हो मृत्यु पाश में ।
घायल अभी सम्वेदनाएँ , कैसे फिर खेलूँ होली ।
चिर निद्रा हैं वीर धरा के ,कैसे फिर खेलूँ होली ।
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Wednesday, 11 March 2020

पराई बेटियां (गीतिका छन्द) - रीना गोयल

पराई बेटियां
(कविता)
गीतिका छन्द-

दो घरों को हैं सजाती बेटियां 
पर परायी ही कहाती बेटियां ।

हाथ से दोनों लुटाएं वो हसीं,
जब कभी आँगन में आती बेटियां ।

हर थकन से फिर मिले आराम है ,
खूब खुल जब खिलखिलाती बेटियां ।

आत्मा में है बसी पितु मात की ,
फिर पराये घर क्यों जाती बेटियां। 

बन सुकोमल फूल हर इक़ बाग का ,
प्रीत की बगिया सजाती बेटियां ।
पता:
रीना गोयल
सरस्वती नगर (हरियाणा)

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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

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हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ