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Saturday, 15 August 2020

एक शहीद ऐसा भी (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



एक शहीद ऐसा भी
                (कविता)
रो रही थी माता एक फूट फूट के
कि चल दिया था उसका लाल उसको छोड़ के

परेशान हो गयी वो उसको ढूंढ ढूंढ के
मिल ना रहा था बेटा कहॉं बैठा छोड़ के

जब बीते कई दिन और बीती कई रात
लोगो ने माँ को बोली फिर एक नयी बात

थाने मे जाके रपट लिखवा दो माँ हर हाल
इनके ही प्रयासों से अब मिलेगा तेरा लाल

कहने से सबके बूढी माता थाने पहुंच गयी
बेटे की फोटो देकर दरखास्त ये करी

लाल मेरा खो गया है कई दिन से सरकार
ढूंढ करके लादो ये माँ मानेगी उपकार

गजब का था निशाने बाज करता था बस कमाल
दुश्मन को मारने की ही करता था वो बात

कहता था फौज जाऊंगा पर ना था कोई ठिकाना
शिक्षण ना कोई प्रशिक्षण कैसे लगता उसका निशाना

मॉं रोये जा रही थी ना कोई था सपोर्ट
आखिर को अॉफिसर ने लिख दी उसकी रिपोर्ट

अफसर ने कहा जा मॉंअब चैन से घर जा
हम ढूंढ कर लायेंगे तेरा बेटा चुप हो जा

काफी दिनो के बाद मॉं को एक सूचना मिली
शिनाख्त बेटे की करने की उसे सजा मिली

लिपटा था लाल उसका आज तिरंगे झंडे मे
और देश गर्व कर रहा था उसके मरने मे

ना जाने कैसे पहुचा वो युद्ध के मैदान
 दुश्मन को मार स्वयं तज दिये थे प्राण

शरीर छलनी था सारा लगता था देख के
हैवानियत की हद पार कर दी थी बैरी  ने

गर्म लोहे की राड से उसके कानो को फोड़ा था
नाखुनो को खींच के सारी हड्डियो को भी तोडा़  था

धारदार शस्त्र से आँखे निकाल ली गयी थी
इंसानियत की सारी हदे पार कर दी गयी थी

सरहद मे जाके उसके पुत ने एैसा कमाल दिखलाया था
माँ ने देखा जब लाल को एैसे , फक्र उसे हो आया था

जो रो रही थी अब तक बेटे के विरह व्यथा से
अब हंसने लगी थी सुन कर बेटे के वीर कथा पे

धन्य हुयी मै आज हे धरती मॉं जो मुझको जनम दिया
इस पावन भूमि पे जन्म के एैसे लाल को जनम दिया

अट्टहास कर उठी अचानक हाँथ मे तिरंगा उठा लिया
जय हिन्द जय भारत जय मेरा लाल कहके उसने भी दम तोड़ दिया ।

एक नही अनेक हैं माता एैसी मेरे भारत देश मे
शत शत नमन है उनको आज अपने इस स्वदेश मे ।
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-



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Sunday, 16 February 2020

मायका (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला





मायका
                (कविता)
मायके की दहलीज लांघ कर 
आज के दिन ससुराल आई 
माता पिता के संस्कार ले कर 
नए परिवार को अपनाने आई

मा बाबा के प्यार भरे मन को 
हंसते रोते तोड़ आई 
भाईयो संग  लड़ने झगड़ने की 
परंपरा पीछे छोड़ आई 

सखियों के संग घूमना फिरना 
अमराई से आम चुराना
स्कूल कॉलेज की धमाचौकड़ी
वो सबकुछ मै भूल आई 

सप्तपदी के सात फेरों से 
मेरी सारी दुनिया ही बदल गई 
मायके की प्यारी रजनी बिटिया 
सासरे की बहु शुभा शुक्ला बन गई 

मां का ममता से भरा आंचल
पिता की उंगली का वो सहारा
भैया के बाग की सोन  चिरैया
मायके से उड़ ससुराल पहुंच गई

शादी को हो गये पच्चीस साल
जिंदगी के बीते साल बेमिसाल
मायके वालों का बहुत शुक्रिया
जिनसे मेरा जीवन है खुशहाल
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Saturday, 26 October 2019

विजया दशमी (मुक्तक कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला

विजया दशमी 
(मुक्तक कविता)

राम जी 
पधारे अपनी
नगरीया सजी अयोध्या
लगे प्यारी
दुल्हनिया

रामजी
आए मारके
कुटिल दसानन रावण
सीता लौटीं
पी के
संग

सर्वत्र
फैली है
स्वर्ण दीप माला
नाचे प्रजा
प्रसन्नचित्त

असत्य
पे सत्य
की विजय का
हुआ सिंहनाद
आज

दशरथ
के पुत्र
कोशल्या के लाला
कैकेयी प्यारे
राम

चौदह
वर्ष बाद
वन से लौटे
लक्ष्मण और
सिया के
साथ

मात
कोसल्या
पग पखार रही
नैनन अश्रु
बहाय

पश्चाताप
मे जल
कर हो गयी
मात कैकेयी
राख

ढोल
मृदंग बाजे
खुशियाँ अपार साजे
राम सिया
मुस्काय.
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
कृष्ना पब्लिक स्कूल के पीछे 
म.नं. 291 / शरद शुक्ला 
कोपलवाणी छात्रावास के सामने 
आम बगीचा सुंदर नगर रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Saturday, 28 March 2020

प्रेम के सब रस रंग (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



प्रेम के सब रस रंग
                    (कविता)
प्रेम प्यार स्नेह सब एक ही पेड़ के अंग
सतरंगी डालो में दिखे प्रेम के सब रस रंग

भाई बहन पितृ और माता
सबका सबसे है प्रेम का नाता
दादा नाना दोस्त और सखियां इनका आपस मै अद्भुत नाता

प्रेमरस की है अजब सी माया इससे कोई भी ना बच पाया
जो ना करे प्रेम किसे से तो
वो प्राणी दानव कहलाता

मुक बाघिर भी प्रदर्शित करते
मौन ही सही पर अपनी भाषा
मुक जानवर भी रखते मन में
प्रेम प्रदर्शन की अभिलाषा

राधा कृष्ण की प्रेम कहानी
हरेक के मन में प्रेम जगाती
एक दूजे पे अटूट श्रद्धा से
बिछड़े जोड़ो को मिलवाती

राधे राधे रट कर देखो
कृष्ण का संग यूं ही पा जाओगे
कृष्णा कृष्णा रटते रहना
प्रेम राधा का पा ही लोगे


युगों युगों तक याद रखी है
हमने लैला मजनू की प्रेम गाथा
ईश्वर की सुंदर सृष्टि में
प्रेम विरक्त कोई कैसे रह पाता

प्रेम करना बुरी बात नहीं
प्रेम से सच्चा कुछ भी नहीं
पर मर्यादा की हद पार करो
बस ये है युवाओं सही नहीं।

आधुनिक काल में बदल गये
प्रेम के सारे प्राचीन पैमाने
आंखों से उतरकर प्रेम आज तो
शर्तों की भाषा पहचाने

प्रेम की मर्यादाये भी तोड़ते
आज के प्रेमी पागल दीवाने
जाके कौन इन्हे समझाए
प्रेमी के होते दिल ही ठिकाने

सच्चे प्रेम की एक ही निशानी
सुनी तो होगी मीरा की जुबानी
कबीर के ढाई आखर का मतलब
कब समझेगी पीढ़ी नई दीवानी

आज प्रेम का अनुपम दिन है
प्रेम ही पाओ प्रेम ही बांटो
गर कोई दुखी मिल जाय
तो गले लगा उसके गम बांटो
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Tuesday, 10 March 2020

हमारी होली (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला




हमारी होली 
(कविता)
♥️
करती हूं याद आज भी मै बचपन की वो हंसी ठिठोली
जब घर चौबारा रंग दिनभर खेला करते थे हम होली

सुबह सबेरे तन पे अपने सरसों तेल मलवाते थे
चाचा पापा और बुआ फिर रंगों के हौज भरवाते थे

खाने पीने की सुध बिसरा क्या मस्त मलंग विचरते थे
राह में चलते राहगीरों को सतरंगी रंगों में रंगा करते थे

रंगीन पानी के वो छोटे फुग्गे आज भी पीठ पे पड़ते हैं 
 बच्चों के ये फुगगे खा हम अपने समय में पहुंचते हैं

वो भी क्या होली होती थी बिंदास मगन मन होती थी
पूरे परिवार के लोगों को जो स्नेह प्रेम मे रंग लेती थी

खोवे की गुजिया की सौंधी खुशबू मद मस्त हमें कर जाती थी
ठंडी ठंडाई और भंग की गोली क्या अपने जलवे दिखाती थी

होली आज भी वही है लोगो जो हमने भी खेली थी
पर आज की होली से वो पवित्र शुद्घ और अलबेली थी

बेईमानी और मिलावट के चलते आज कुछ भी स्वस्थ रह नहीं गया
मक्कारो से भरी दुनिया में कोई भी स्वच्छ रह नहीं गया

खैर धूल डालें इन बातो पर क्योंकि ऐसे लोग सुधर नहीं सकते
झूठ फरेब के गहरे दलदल में फंसे ये मानव कभी निकल नहीं सकते

ऐसे लोगों से विनती मेरी त्यौहार को त्यौहार ही रहने दें
इंसानियत को आगे रखकर त्यौहार हर्ष से मनने दें

आप सभी के शुभ आगमन से मन सुमन यूं खिल गया
होली का तो मिजाज ही रंगी, रंगीन चेहरे देख और भी निखर गया

-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Sunday, 26 January 2020

भारत की शान तिरंगा (कविता) -शुभा/रजनी शुक्ला






भारत की शान तिरंगा
                (कविता)
भारत देश की शान तिरंगा भारतीयों की पहचान तिरंगा
भारत मां के वीर सपूतों तुमसे ही लहराया अपना तिरंगा

जो लड़ते तुम ना देश के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत के
आज सांस ले रहे आजादी की कभी ना ले पाते भारत में

आज तो इंसानियत खत्म हो चुकी मासूमो की जान पे आ पड़ी
बच्चे औरतें कोई सुरक्षित नहीं नरभक्षी भेड़ियों की तादाद बढ़ी

आप ही हमको बचा सकते हो देश में सुख शांति ला सकते हो
शक्ति स्फूर्ति आपमें इतनी की,कि परिवर्तन क्रांति ला सकते हो

जैसे आजादी के लिए वीरों ने अपनी जान की बाजी लगा दी
आज भी उरी कारगिल और वामा में शहीदों ने अपनी जान गंवा दी

तुम रहते हो सरहद पे डटे तो देश में शांति स्थापित रहती
बाहरी शत्रु से रक्षा होती और देश की संपदा सुरक्षित रहती

स्वस्थ रहो प्रसन्न रहो कर्मयोग में यूं ही आसक्त रहो
है हम सब की दुआ यही कि देशसेवा में उन्मुक्त रहो

अव्यवस्थाओं और विषमताओं से लिप्त पड़ा है आज देश हमारा
अंदर बाहर से ध्वस्त त्रस्त निर्जन बीहड़ सा स्वदेश हमारा

राष्ट्र का गौरव हांथ आपके देश का इब क्या करना है
घिसी पिटी जर्जर परंपरा को रखना या राष्ट्र नया गढना है

खुदी को मिटा कर जो आप वीरों हम पे ये एहसान करते हैं
जान की अपनी परवाह ना करके हम पे जो जां कुर्बान करते हैं

आज सोचती हूं मैं कि कहीं से फिर कोई भगतसिंह गरजे मूछो पे ताव देकर
वीर नारायण और मंगल पांडे सा कोई तो विद्रोह करें गलत बात पर

धन्य धन्य भारत की मिट्टी जिसने इन जांबाजों को जन्म दिया
महा धन्य वो जन्मदात्रियां जिनसे ऐसे रत्नों का उदय हुआ
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Wednesday, 9 September 2020

सावन का महीना (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला


सावन का महीना गीत
                    (कविता)
सावन के झूले पड़े साजन सजनी  संग झूले
ऐसे दीवाने बने घर  परिवार भूले

सावन के महीने की ऋत मतवाली
जित देखू उत् है हरियाली
प्रेम सुमन खिले साजन सजनी झुलें

सारा आलम सतरंगी हो गया
मन हर्षित तन पुलकित हो गया
ओस के मोती सजे साजन सजनी झूले

ओढ़ी धरा ने चादर हरिभरी
सावन में कृषकों की भी खुशियां बढ़ गई
सुगंधित पुष्प महके साजन सजनी संग झूले

चातुर मोर पपिहा  गाए
कोयल मीठे गीत सुनाए
रिमझिम मेघ बरसे साजन सजनी झूले


सावन में पर्वो की धूम मची है गोरी के सर पे चुनर सजी  है
सोलह श्रृंगार सजे  साजन सजनी झूले।
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

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Monday, 27 January 2020

देश सेवा साहित्यकार की कलम से (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला






देश सेवा साहित्यकार की कलम से
                (कविता)
देश की सीमा में तैनात जवान सारी मुश्किलों से हमें बचाता
और एक साहित्यकार देशवासियों में देशभक्ति की धड़कने जगाता है

कलम की अपनी तेज धार चला कर वो जन जन में क्रांति लाता है
सैकड़ों युगों से चलते आ रहे ध्रश्टता के आइने लोगो को दिखलाता है

जब कलमकार अपनी पे आ जाता है तो अच्छे अच्छो को हिला जाता है
उसकी कलम की मार से फिर एक नया इतिहास रच जाता है

कलम की धार से हर शख्सियत खौफ जदा होता क्योंकि तलवार से भारी असर कलम का ही होता

प्रकृति का चित्रण हो या नारी सौन्दर्य कलम शोख़ अंदाज दिखाती

पर जब बात हो देश की शान की तो यही कलम आग बरसाती
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)
-०-

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Friday, 10 April 2020

हे माँ शेरावाली (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



हे माँ शेरावाली 
                    (कविता)
काल के फंदे से हमको छुडाओ
हे मां शेरावाली ।।
करोना के पंजे से हमको बचालो
हे वैष्णव महारानी मां......

हे शारदे किरपा करो महामाई
बचा लो मैंया छुडा लो भैया
चरणों में तेरी जयकार जयकार रे-- हे शारदे

धरती पे कैसा वाइरस आया
मौत का खतरा छाया
मुह फैला कर मासूमों को
अपना ग्रास बनाया
तुझपे सबकी है श्रद्धा अपार
बचालो मैया छुड़ा लो मैया
चरणों में तेरे जयकार जयकार रे --- हे शारदे

2-- वैसे तो इंसा ने खुद अपने
पाव कुल्हाड़ी दे मारी
जैसी उसकी करनी थी तो
ये सजा भी कम ही है माई
सबका जीवन हुआ दुश्वार
बचा लो मैया छुड़ा लो मैया
चरणों में तेरी जयकार जयकार रे -- हे शारदे

3-- तुम हो हमारी प्यारी माता
भक्तो की दुख हरता
जिसका नहीं गर कोई जगत में
तेरे प्रेम से भरता
अपने बच्चो को तू ही सम्हाल
ओ शेरा वाली ,पहाड़ा वाली
चरणों में तेरी जयकार जयकार री हे शारदे --
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

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