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Friday, 6 November 2020

मेरे हमसफ़र (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


मेरे हमसफ़र 
(कविता)
मैं ओर तुम,
कभी इक दूजे से अनजान,
ना जान ना पहचान,
किन शब्दों में करूँ बयान।

अब ये रिश्ता,जन्म जन्म का,
सजनी सजन का,
रब ने गढ़ा तुम्हें मेरे लिए,
सोंप दी तुम्हें,
जीवन की डोर,सदा के लिए।
ना करना कभी विश्वासघात,
करती हूँ अटूट विश्वास,
चलेंगे साथ साथ,
तय करने को जहाँ के फ़ैसले,
पस्त ना होने देंगे होसले,
भले ढा ले सितम समय हम पर,
दिखा कर अदम्य साहस ,
होसलों की उड़ान,
थकना नहीं है हमें,
रख कर होंठों पे मुस्कान,
चलते रहेंगे  हाथ थाम कर,
मनाते रहेंगे,शादी की वर्षगाँठ,
ना आने देंगे आँच,
दोड़ते रहेंगे,मिला क़दम से क़दम,
ए मेरे दोस्त,मेरे हमदम।
कहना चाहती हूँ ,एक मन की बात ,
कोई बात बिगड़ने से पहले,
थाम लेना मेरा हाथ,
रहेंगे हम साथ साथ,
इस जन्म ,उस जन्म,हर जन्म,
ए मेरे हमसफ़र, मेरे हमदम।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Sunday, 18 October 2020

अस्तित्व और व्यक्तित्व (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


अस्तित्व और व्यक्तित्व
(कविता)
शरीर के भरणपोषण की प्रक्रिया तो,
जानवर भी बच्चों को सिखाते हैं।
पर संस्कारों का भोजन,
कहाँ दे पाते हैं ?
तभी तो जानवर  जानवर हैं,
इंसान कहाँ बन पाते हैं।

ईश्वर ने इंसान को ,
दो दो इंद्रियाँ दी है।
शरीर भी दो हिस्सों में बाँटा है।
इन दो शरीरों के मिलन से ही,
इंसान का व्यक्तित्व तैयार हो पाता  है।
माँ जब बच्चे में,
समझ को उतारती है,
अपने भीतर...
आधे पुरुष को पाती है।
उसके लालन पालन की प्रक्रिया में..
पुरुष भी हाथ बँटाता है।
अपने अंदर छिपी एक माँ का..
अहसास उसे हो जाता है।
वह अंदर के व्यक्तित्व की ,
पहचान कर पाता है।
जो  इंसान अपने भीतर के अस्तित्व को,
नहीं पहचानता।
स्त्री में पुरुष है,  पुरुष में स्त्री,
वह नहीं जानता।
जो अस्तित्व ओर व्यक्तित्व में ,
फ़र्क़ ना कर पाए,
कुटिल उसके कर्म हो जाए,
फिर इंसान ओर जानवर ,
में फ़र्क़ क्या रह जाए ?
इंसान ही इंसान को ,
संस्कार सिखाता है।
अस्तित्व ओर व्यक्तित्व ,
में फ़र्क़ समझ जिसे आता है।
वही इंसान इंसान कहलाता है।
वरना जानवर ओर आदमी में ,
फ़र्क़ क्या रह जाता है।।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Tuesday, 4 August 2020

लॉकडाउन में (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


लॉकडाउन में
(कविता)
लोकडाउन में भी....
घर से बाहर निकलने को..
मचल रहा मन।
सोच रही हूँ...
करूँ कुछ यत्न ।
थोड़ा इधर उधर टहल लू..
तो क्या होगा..?
इसमें किसी का क्या बिगड़ेगा?
देखूँ तो सही..
बाहर क्या हाल है..?
सब कुछ वैसा ही है,
या कुछ बदलाव है..?
निकल पड़ी....यूँ ही आस पास,
लगा कर मुँह पर मास्क।
शायद रंगीन हो गया हो पार्क,
लोग घूम रहे हों आस पास।
पर ये क्या..?यहाँ कोई नहीं आता?
सोच रही थी,लोग घूम रहे होंगे,
चर्चा कर रहे होंगे।
संवाद कम..विवाद ज़्यादा चल रहे होंगे।
पर कोई नहीं दिया दिखाई....
बस मैं थी...ओर मेरी तन्हाई।
मैं बड़बड़ाई...डरपोक कहीं के..?
सब दुबके बैठें हो...?मुँह छिपा के।
फिर सुनाई दिए..
पेड़ों पर पत्ते फड़फड़ाते,
दीवारों पर सूचनाओं के बोर्ड ,
मुँह चढ़ाते..।
समझ गई...सब क़ैद हैं,
नज़र बंद हैं..।
पुलिस पहरा दे रही...
बस उन्हीं के होसले बुलंद हैं।
ना चोरी का डर...ना डकैती का,
बस हर तरफ़ मौत का साया..
ये कैसा समय आया..?
पर इस मानव मन की भी कोई थाह नहीं,
ये मेरा पागलपन है....?
या मुझे अपनी अपनो की परवाह नहीं?
फिर झाँका मैंने मोहल्ले में...सोचा..,
किसी सहेली से ही मिल आऊँ।
बोर हो रही हूँ..,
थोड़ी गप शप लड़ा आऊँ.।
ज्यों ही गली में निकली,
सहेली भी दिखी।
उसने छत से ही हाथ हिलाया,
पर अंदर नहीं बुलाया।
मुझे थोड़ा ग़ुस्सा भी आया।
सोच रही थी...,
ये तो मेरी अन्तरंग सहेली थी..?
फिर ये कैसी पहेली थी..?
ये तो रोज़ मिलने आती थी,
मेरे बिना कहाँ रह पाती थी..?
पंचतत्व  बना ये तन..
उसमें इक अशान्त सा..अधीर सा मन।
ज़िंदगी तुम भी कितनी अजीब हो,
कभी ख़्वाब सी,कभी नापाक सी
कभी दूर, कभी इतने नज़दीक हो।
ना जाने कब किस राह चल दो,
जैसा विचारो .. उसमें ढाल दो।
ना रुकती हो, ना सुनती हो।
बस सपने बुनती हो ।
फिर सोचा...,
मंदिर ही हो आऊँ..।
भगवान को ही ढोक  लगा आऊँ।
निकल पड़ी मंदिर की राह पर,
पर ये क्या...?कोई नहीं दिखा यहाँ पर।
मंदिर में भी ताले जड़े हैं।
भगवान भी कोरंटाइन हो गए है?
क्या ये विषाणु इतना ख़तरनाक है..?
जो भगवान भी इससे डरे हैं..?
फिर मुझे समझ आया,
मैंने अपने आप को समझाया।
लौट जा अपने घर..
मत बन इतनी निडर,
कुछ रचनात्मक काम कर।
कुछ लिख.., कुछ पढ़।
ओर नहीं तो कुछ कवितायें ही गढ़।
भले ही सब परेशान हैं..,
पर जान है..तो जहाँन है।
अपना घर....अति हितकारी,
घर मंदिर.....बाहर बीमारी।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Saturday, 8 May 2021

सामना मौत से (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


सामना मौत से 
(कविता)
*8 मई २०२ ,महाराष्ट्र में रेल हादसे में प्रवासी मज़दूरों की मौत पर”*
तपती गर्मी में...
छोटे छोटे बच्चों को गोदी में दबाए,
घर पहुँचने की आस लगाए,
ज़िंदगी की गठरी सिर पर उठाए,
ये मज़दूर..पैदल चलने को मजबूर।
गाँव से आए थे शहर..,
ढाया करोंना ने क़हर..,
जब टूटने लगा हौसला,
किया घर जाने का फ़ैसला।
हालात ने छीन लिए मुँह के निवाले,
ज़िंदगी कर रब के हवाले।
चल दिए मौत से बच कर,
पसीने से लथपथ.
खा कर सूखी रोटी..चटनी से लथपथ
ललचा गया मन,आराम करने को,
हालात से थक कर।
सो गए रेल की पटरी को..
तकिया समझ कर।
शायद रोजी रोटी का सफ़र ,
था यही तक...।
यूँ तो बसें ट्रेनें सब बंद थी,
पर ज़िंदगी बदनसीब थी।
दौड़ती ट्रेन...जिससे ..
घर पहुँचने की उम्मीद थी,
सकूँन का सबब थी..इतने क़रीब थी।
समेट लिया पलक झपकते ही मौत ने,
गाँव पहुँचने से पहले ही...
गहरी नींद..सुला दिया इस सौत ने।
कैसी आइ ये भौर..?
पसरा ख़ामोशी का शोर..।
बिखरी रोटियाँ..इंसानी बोटियाँ।
मर्घट बनी पटरियाँ।
मिल गए मिट्टी में..
मंज़िल तय करते करते ।
सो गए चिर निद्रा में..
ज़िंदगी से लड़ते लड़ते।
ना कोई चीख़ा,ना चिल्लाया..
ज़िंदगी ने मौत से मिलाया।
सुबह बस रेल की पटरियाँ थी,
बिखरी रोटियाँ थी,
चिथडो में बंटी जिंदगियाँ थी।
परिवार इंतज़ार करता रहा..
पिता सोचता रहा..
बेटा आएगा..कमा के लाएगा,
बुढ़ापा कुछ आसान हो जाएगा।
कब सोचा था..ऐसा वक़्त भी आएगा,
ज़िंदगी पटरी पर लाने चले थे,
पटरी ही मौत का कारण बन जाएगा।
क्षत विक्षत शरीर....
पटरी पर बिखर गया,
बह चला लहू का समुन्दर,
उफ़्फ़..ये खोफ़नाख मंज़र,
ना कभी देखा,ना सुना,
मौत ने भी कैसा ये ताना बाना बुना।
टूट गई आशाए..
जिस्म एक गठरी में सिमट गया।
मिल गए मिट्टी में...
मंज़िल तय करते करते,
सो गए चिर निद्रा में ...,.
ज़िंदगी से लड़ते लड़ते।
संवेदनहीनता बरक़रार रही..
इंसानियत शर्मसार रही।
काश कुछ ऐसी नीतियाँ बनती,
जो इन ग़रीबों की सुनती।
ये मौतें इन नीतियों का नतीजा है..?
या किसी की जिम्मेदारी है ?
किसे दोष दें..?ऐसा लगता है..
संवेदनहीनता ही इनकी हत्यारी है।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Monday, 8 March 2021

मैं स्त्री (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


मैं स्त्री
(कविता)
मैं स्त्री हूँ......
कायनात की रचयिता,
सृष्टि का चक्र चलाती।
ममता,  धैर्य ,  भरोसे के साथ।
जो चाहती हूँ...कर सकती हूँ,
है विश्वास..।
मेरे पास हैं...कुछ ऐसी शक्तियाँ,
सम्भावनाएँ, मिसालें ,उपलब्धियाँ ।
उस पर भी...,
असंवेदनाए  पैर पसारती,
भ्रूण हत्या,ऐसिड अटैक,
अस्मिता पर हमलों से..
ख़ुद को बचाती।
समाज की निशानदेही पर रह कर भी,
ख़ुद को हारने ना देती।
झूझती रहती...।
सहती सब हँसके,
कभी ख़ामोशी से...,कभी विद्रोह  करके।
पार पा लेती हूँ..., मुश्किलों से।
चोबीस घंटो की ड्यूटी में,
ना छुट्टी लेती, ना ढिलाई बरतती ,
ना ही कोई काम टालती।
पगार के नाम पर...
बस थोड़ा सा प्यार चाहती।
बाहर की ज़िम्मेदारी से मुँह ना मोड़ती,
घरेलू दायित्वों को नहीं छोड़ती।
सृष्टि की कड़ियाँ जोड़ने की क्षमता समेटे,
तनाव जीतने की ख़ुशी लपेटे,
प्रकृति द्वारा असाधारण गुनो से नवाजी ,
ख़ुद पर भरोसा करती गई....,चलती गई।
अंतर्मन के आइने में झाँकती,
अपने को आँकती...,
मैं सृष्टि की रचयिता ,
नव निर्माण की शक्ति ,
मैं हूँ तो ये कायनात है।
चाहती हूँ....
चलती रहे ये कायनात,
क्योंकि चला सकती हूँ।
मैं धरा स्वरूपा...,जानती हूँ,
बादलों में बीज नहीं बोए जाते।
डरती नहीं किसी बात से,
देखती हूँ दुनिया,विश्वास से।
मैं....स्त्री....।

-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Tuesday, 22 September 2020

मैं और लेखन (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


मैं और लेखन 
(कविता)
दिल में छिपे दर्द जब,
नासूर बन पलने लगे,
शब्दों की इक पोटली,
खुल कर बिखेरने सी लगी।
वर्ण शामिल हो गए,
मात्राओं का दे वास्ता,
लेखनी रफ़्तार से ,
काग़ज़ पे फिर चलने लगी।

गुमनाम सी थी ज़िंदगी,
शब्दों ने घेरा आ मुझे,
खोल कर दहलीज़ दिल की,
खिड़कियाँ खुलने लगी।
आगे आगे लेखनी ओर,
शब्द पीछे चल दिए,
ग़म तो बे हिसाब थे पर,
ख़ुशियाँ भी आ मिलने लगी।

आँख के आँसू मेरे ,
संतोष का आधार थे,
ग़म की क़तारें छँट गई,
ख़ुशियों का वो भंडार थे।
देख कर के रास्ता,
ये राह जो मैंने चुनी,
तन है काग़ज़,मन है जीवन
ज़िंदगी लेखन बनी।

मार के ठोकर ग़मों को,
रास्ते बनने लगे,
यूँ लगा ज्यों हाथ थामे,
ज़िंदगी चलने लगी,
मन में जो जज़्बात थे ,
निकले तो कवितायें बनी,
मेरे लिए लेखन नहीं,
लेखन के लिए मैं बनी।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Friday, 4 September 2020

कविता मुझे लिखती है (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


कविता मुझे लिखती है
(कविता)
कविता मुझे लिखती है...
मैं नहीं लिखती कविता।

ढूँढ लेती है....
अंदर मन के छिपे जज़्बात।
ज़बरदस्ती उगलवा लेती है,
मेरे मन की बात।
उत्तर दे कर मेरे मौन प्रश्नों का,
पकड़ा के क़लम  हाथ में...
सबब बन जाती मेरे लिखने का।
भाँप कर मन में छिपे भावों को,
हर बात उगलवा लेती है,
काग़ज़ों के पन्नों पे,
हर बात मेरी दिखती है।
मैं नहीं लिखती कविता,
कविता मुझे लिखती है।

जकड़ रखा है उसने मुझे इस क़दर,
ज्यों पहरेदार खड़ा  दरवाज़े पर।
काग़ज़ों पर उतर जाती..
जब ख़ामोशी मेरी।
बन के माध्यम ...
बन जाती अभिव्यक्ति मेरी।
राह जो भूल जाऊँ...
तो कविता में राह दिखती है,
मैं नहीं लिखती कविता,
कविता मुझे लिखती है।

मुझमे मुझको खोज कर,
विश्वास दिला देती है,
इक ख़ुशनुमा माहोल का,
अहसास करा देती है।
कह ना पाऊँ जो रूबरू होकर,
तो पन्नों से मिल सिसकती कविता।
कविता मुझे लिखती है,
मैं नहीं लिखती कविता।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Sunday, 4 October 2020

सफलता चूमेगी क़दम (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

सफलता चूमेगी क़दम
(कविता)
मैं सफलता...चूमूँगी तुम्हारे क़दम।
अगर है तुम्हारे में...
क्षमा,सहयोग ओर सहायता की भावना,
करना  जानते हो  आड़े वक़्त में...
मुसीबतों व मुश्किलों का सामना।
तो अपनी सोई प्रतिभा को जगाओ,
व्यर्थ पड़ी इच्छाओं की योजना बनाओ।
ज्ञान ओर विवेक से बढ़ाने होंगे क़दम,
मैं सफ़लता हूँ...चूमूँगी तुम्हारे क़दम।।

अगर पहुँचना है  शिखर पर,
शुरूआत करो निचले स्तर पर।
समय से डरना नहीं, ख़ुद से हारना नहीं,
विवेक खोना नहीं,  क्रोधित होना नहीं।
मुश्किलें आती हैं , लड़ना सिखाती हैं।
मैं तपस्या हूँ, मुझे पा लो करके प्रयत्न,
मैं सफलता हूँ..चूमूँगी तुम्हारे क़दम।

ज़िंदगी में ...चुनौतियाँ तो आएँगी,
हार भी गए तो,कुछ सिखा के जाएँगी।
हार भी मौक़ा है ,ख़ुद को तराशने का,
अपने आप को   आँकने का।
जो ठाना है, पूरा कर के दिखाओ,
इच्छा शक्ति को अपनी ताक़त बनाओ।
रह कर मज़बूत, आगे बढ़ाओ क़दम.,
मैं सफलता हूँ....चूमूँगी तुम्हारे क़दम।

भले ही तुम  साधन रहित हो,
मत हो उदास, विचारों के धनी हो।
अपने विचारों पर रखो भरोसा,
समय कभी एक सा नहीं होता।
खोना नहीं आत्मविश्वास, करो विश्वास,
लहराएगा तुम्हारा भी परचम।
मैं सफलता हूँ...चूमूँगी तुम्हारे क़दम।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Tuesday, 18 August 2020

मैं गृहिणी (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा


मैं गृहिणी
(कविता)
अल सुबह उठ ..
शुरू करती हूँ अपनी कविता..
संस्कारों को मान दे,
बड़ों को सम्मान दे,
बजुर्गों को ढोक  लगा,
बच्चों का टिफ़िन बना,
बच्चों को तैयार कर,
बस स्टॉप तक छोड़ते।
भागते दौड़ते...
पति का नाश्ता लगा,
ऑफ़िस जाने का समान पकड़ा,
सोचती रहती..
कहीं कुछ छूट तो नहीं गया..?
सबकी फ़िक्र मेरी क़िस्मत है,
हड़बड़ाहट मेरी फ़ितरत है,
गृहिणी हूँ ना....!

सुबह से शाम,खटती रहती ,
देखूँ दर्पण तो...
ख़ुद को पहचान नहीं पाती।
ना जाने किसके बल पर...
दिन भर चलती हूँ।
ना रुकती हूँ,...ना थकती हूँ।
मेरी कोई पगार नहीं,
छुट्टी का सरोकार नहीं,
मेरा कोई इतवार नहीं,
मानता कोई आभार नहीं।
मेरा अथाह श्रम ..मेरी परीक्षा,
सुबह गुलाब सा चेहरा,
शाम को कबाब सा दिखता ।
सृजन करती, जन्म दायनी कहलाती,
चुप चुप रहती...,सब कुछ सहती,
कोई पूछता जब ,
क्या करती हूँ मैं..?
मेरे भाग्यविधाता बन तुम कहते,
ये कुछ नहीं करती...
गृहिणी हैं ....घर पर ही रहती है।

हाँ..
गृहिणी हूँ  मैं....!
सीखा है मैंने ....
समर्पण ओर सेवा भाव,
शिक्षक, मेड, रसोईया बन,
घर की साफ़ सफ़ाई...
रख रखाव।
रखती हूँ दूसरों के प्रति..
प्यार ओर सेवा भाव का इरादा,
अंतिम पड़ाव तक...
साथ निभाने का वादा।
सुबह से शाम.....
नहीं करती आराम।
दिन भर की थकान को ...
ठोकर मार कर,
अपनी भावनाओं को ...
किसी कोने में दबा कर,
जीवन में जो बचा शेष...
बना कर विशेष,
बिस्तर पर जा कर,
कुछ सपने सज़ा कर,
पूरी कर लेती हूँ कविता।
पारिवारिक संस्कारों परम्पराओं से..,
उपजी रूडीयों की बेड़ियाँ,
गर मैंने तोड़ दी होती..
तो ये कविता ना बनती।
कविता ..भले बदलाव ना लाए,
पर उम्मीद तो जगाती है,
बदलती रुतो का अहसास तो कराती है।
जो हूँ....,   उसका गर्व कराती हैं,
मेरे कारण सबकी थाली में ,
गर्म रोटी तो आती है,क्योंकि....
गृहिणी हूँ ना...!
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-०-



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Friday, 14 February 2020

कोटा शहर के (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

कोटा शहर के
(कविता)
कोटा में नवजात शिशुओं की मौत पर
***
रोज़ गिन रही हूँ....।
कोटा शहर के ,जे.के.लोन अस्पताल में,
नवजात शिशुओं की मौत का आँकड़ा,
जो पार कर गया सैकड़ा।
माँओंकी उजड़ रही गोद,
सुन रही हूँ....,
ख़ामोशी का पसरता शोर।
सरकार उदासीन...,संवेदनहीन..।
कैसे होगा इसका निवारण..?
जानना होगा, इसका कारण ।
ठण्डी बयार ...? उपचार का अभाव...?
या ख़राब उपकरण ..?
जनता जानने को बेताब,
दम तोड़ चुके वेंटिलेटर, वार्मर ख़राब।
चिकित्सा सेवाओं में बरती लापरवाही,
प्रशासन को ख़ामियाँ ,नज़र नहीं आ रही।
मासूमों की मौत पर राजनीति ...?
बयान बाज़ी...?
नेताओं पर पैसे की बर्बादी..?
क्या होगा इससे ज़्यादा शर्मनाक..?
कैसे मिले सरकार की,योजनाओं का लाभ?
ताकी शिशुओं का हो पाए,
समय पर इलाज ।
मासूमों की मौत पर,
राजनीति का सिलसिला चलता रहेगा,
प्रशासन मंत्रियों की आवभगत में व्यस्त रहेगा ?
संवेदनहीनता बरक़रार रहेगी ?
इंसानियत शर्मसार रहेगी ?
क्यों नहीं तय कर पा रहा प्रशासन ?
लापरवाही किसकी ज़िम्मेवारी है ?
ऐसा लगता है....,
संवेदनहीनता ही बच्चों की हत्यारी है।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-0-


***
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Monday, 17 August 2020

वीरांगना के जज्बात (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

वीरांगना के जज्बात
(कविता)
मेरे दिल की धड़कन थे तुम,
तेरे दिल मैं धड़क रही थी।
जीवन वहाँ थमा था मेरा,
मेरी दुनिया पलट गई थी।
ओढ़ तिरंगा जब तुम आए,
लिपट गई मैं,सिसक पड़ी थी।
देह तुम्हारी बिछड़ गई पर,
अंदर इक आवाज़ सुनी थी।
आँसू पोंछ लिए फिर मैंने,
दर्द को अंदर जज़्ब लिया।
दुख के बादल को समेट कर,
आसमान में दफ़्न कर दिया।
साथ तुम्हारा छूट गया पर,
क़िस्मत मेरी रूठ गई पर।
रूठा भाग्य मनाने निकली,
सपने साथ तुम्हारे लेकर।
यादों का इक सिरा थाम कर,
नए सिरे से खड़ी हुई हूँ।
याद तेरी बन गई सहारा,
नई राह पर निकल रही हूँ।
धैर्य नहीं खोया है मैंने,
समझा नहीं अभागन हूँ मैं,
मेरा सिंधूर है भारत माता,
रहूँगी सदा सुहागिन ही मैं।
जब भी कोई सपना टूटा,
मेरी आँखे भी बरसी है।
मैं भी ऐसे ही तड़पी ज्यों ,
बिन पानी मछली तड़पी है।
अंदर ग़म है, आँखे नम हैं,
पर रुकने की बात नहीं है,
राष्ट्र पर्व पर बहने वाला,
ये कोरा जज़्बात नहीं है।
वायू सेना का बन हिस्सा,
सपनो को पूरा कर लूँगी,
रही अधूरी कथा हमारी,
उसको लिख पूरा कर दूँगी।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-0-


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Monday, 4 May 2020

मैं और तुम (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

मैं और तुम
(कविता)
“मैं ओर तुम “कब हो गए हम।
पता ही ना चला।
याद हैं वो पल? जब मिले मैं ओर तुम।
कुछ बातें रोमांस की, कुछ प्यार की,
रंग जमाती बसंती बयार थी।
दो अनजान दिलों ने जब बात छेड़ी थी,
दो धड़कते दिलों को ,
रूमानी रंग देने में,
कहाँ कसर छोड़ी थी?
प्यार में डूबे कुछ अंतरंग पल थे,
कब मेरे तुम्हारे रिश्ते बदलने लगे थे ,
पता ही ना चला ...।
फिर शादी से पहले,ओर शादी के बाद,
वक़्त के साथ साथ...
बदलता रहा हमारा रिश्ता,
रिश्ते नाते,दिल दोस्ती की बातें,
वो पहला स्पर्श,प्यार का अहसास,
कब ले आता तुम्हें मेरे पास ।
पता ही ना चला...।

तन मन से जुड़े कुछ सवाल,
उन सवालों के समाधान,
तुम्हारे ज़िद्दी स्वभाव के ,
पीछे का मनोविज्ञान।
ज़ायक़े में दिल परोसने का,
मेरा अनूठा अन्दाज़ ,
कब ले आता तुम्हें मेरे पास ?
पता ही ना चला...।

मेरा तुम्हारा रिश्तों का नया समीकरण,
बन जाते मैं ओर तुम “हम”।
कुछ सार्वजनिक तो कुछ ,
नितांत निजी पल।
कुछ साधारण,
तो कुछ असाधारण सी हलचल।
कब बंध गए थे इस अटूट बंधन में,
पता ही ना चला..।

क़ैद कर लेते तुम,
तस्वीरों में स्मृतियों में,
हर पल हर दिन,खड़े रहे मेरे साथ ,
दुशवार से दुशवार स्थितियों में ,
बदलती परिस्थितियों में..,
देते रहे मेरा साथ,
कब मुझे हो गया विश्वास,
पता ही ना चला...।

कभी कभी हमारे व्यवहार में,
लड़कपन की बू आती,
बातों बातों में ठन जाती,
तुम मनाते, मैं रूठ जाती,
तुम रूठ जाते, मैं मनाती।
झगड़े के बाद,
समझोते की राह अपनाते,
ज़िंदगी को फिर ख़ुशनुमा मोड़ पर ले आते।
शांत पड़ी दोस्ती में ,
कब गरमाहट आ जाती,
कब मैं ओर तुम ,हो गए हम,
पता ही ना चला..।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-0-


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Saturday, 29 February 2020

आहटें सुनी सुनी (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

आहटें सुनी सुनी
(कविता)
सर्द रात के बाद,
अल सुबह ,
दरवाज़े पर,
दस्तक देता अख़बार।
ख़बरें ,सुर्ख़ियाँ बटोरती,
कुछ आहटें सुनी सुनी,
मन को कचोटती।
पर क्या ये सिर्फ़ सुर्ख़ियाँ हैं ?
घटनाएँ है...? जो घट गई।
आज आइ,कल गई ?
कुछ पल की चर्चा,
कुछ पल की बातें,
ख़बरें ही तो हैं,
आती हैं,जाती है,
अगले दिन भूल जाती हैं।
कुछ सपनों को ,
उम्मीदों को,आकांक्षाओं को,
रौंदते हादसे,
ज़िम्मेदार ,ज़िम्मेवारी से भागते।
सोच ओर सिस्टम के प्रहार,
जन जन पर पड़ रही,इनकी मार,
नक़ाबों में छिपे,
कुछ असामाजिक तत्व,
नज़ारे विभत्स ।
मूक बन देख रहा समाज।
दे रहे ख़तरनाक संकेत,
ग़ुस्से,तनाव,अराजकता का माहोल,
कौन बना रहा ,नहीं मालूम।
सरकारी अस्पतालों में,
क़ब्रगाह बनते मासूम।
कैसे मिले सकूँ ?
हिचकोले खाता स्वास्थ् शिक्षा विभाग,
मंदी का मकड़जाल।
संकट में पड़ी महत्वकांक्षा
,बाज़ार बर्बाद, घोर निराशा।
हर दिन,हर पल,
इन ख़बरों का का जीवन पर,
धीमें विष सा असर।
निपटने का खोजते रास्ता,
कोशिशें विफल।
हुडदंगियो से पटी गालियाँ,
मरता इंसान,कीड़े मकोड़ों सा,
इंसान ही इंसान की बर्बादी के तत्व बोता ।
कहाँ गई,नए साल की उम्मीद..?
अच्छे दिनों की ताक़ीद..?
बदलनी होगी,
मानव विकास की परिभाषा,
टूट रही आशा,पसरती निराशा।
उठ रहे सवाल..?
खोजने होंगे जवाब।
कैसे सम्भाले,कैसे रोकें ?
कुछ तो करें,कुछ तो सोचें।
प्रश्न करता अख़बार,
है ...कोई...जवाब...?-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)

-0-


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Sunday, 29 March 2020

हम भारतीय (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

हम भारतीय
(कविता)
हमारी मानसिकता...
अनंतकाल से,सहनशीलता।
हम संतोषी...
खोज ही लेते हैं..
दुर्गम से दुर्गम हालातों में भी,
अपनी ख़ुशी।
हम फरियादी ...
जब ना मिले सुख संतोष,
माँग लेते रब से,
करके फ़रियाद।
जब होती कोफ़्त...
जब कोई घटना,
मन को कचोटती,
कहीं किसी रोज़।
दर्द से बिलबिला कर,
अंगड़ाई लेते,
पर करवट नहीं बदलते,
हम भारतीय....
अपनी मानसिकता नहीं बदलते।
जैसा “वो” रखेगा,
रहेंगे..।
कुछ चाहिए तो,
अपने ज़िंदा होने का ,
सबूत भी देंगे।
हम भारतीय ,
सीधे साधे...
बात से कभी नहीं मुकरते ,
दिल माँगोगे,जाँ दे देंगे।
गर कह दें तो,कर के रहते।।
-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
-0-


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Sunday, 29 December 2019

कोख से बेटी की गुहार (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

कोख से बेटी की गुहार
(कविता)
यदि मैं बोल पाती तो ,
तुम सुन पाती माँ।
मेरी पुकार...मेरी चीत्कार ...!
मत करो मुझे जन्म देने से इंकार।
रोक लो.....!
मेरे शरीर को चीरते हुए ओजारो को,
नकार दो.....!
तुम्हें मजबूर करने वाले हत्यारों को।
इस हत्या को ,मत दो अंजाम,
आना है मुझे इस दुनिया में,
करने है कुछ काम।
कब तक हम बेटियाँ ,
होती रहेंगी क़ुर्बान...?
गर यूँ ही चलता रहा तो,
अनुपात बिगड़ जाएगा।
किसी विलुप्त होते प्राणी की तरह,
बेटियों का संसार,
विलुप्ती की कगार पर पहुँच जाएगा।
मिल रही हमें,किस बात की सज़ा..?
क्या बेटी होना ही है गुनाह.....?
मैं तो तेरे अस्तित्व का प्रमाण हूँ।
सृष्टि का कथानक हूँ,
जननी हूँ, इंसान हूँ।
कन्या हूँ ,तो सपने देखने की इजाज़त नहीं है..?
अब मुझे बेड़ियाँ पहन कर,
चलने की आदत नहीं है।
मेरा जन्म लेना ज़रूरी है,
हमारे बिन सृष्टि अधूरी है।
सामंजस्य से ही परिवार है,
उसी से देश का आधार है।
जानती हूँ....,
जन्म लेते ही जंग लड़नी होगी,
मुझे जन्म देने की इच्छा तो पूरी करनी होगी।
तू डर मत माँ...,मैं भी नहीं डरूँगी,
इस दुनिया से अकेले लड़ूँगी।
मैं रोटियाँ बेलूँगी,तलवार भी लहराऊँगी,
विकास के सोपानों पर,
अपने बल पर चढ़ जाऊँगी।
मेरी कोमलता को कमज़ोरी मत आँको ,
मुझे गर्भ में ही कुचल कर मत मारो।
यूँ भी देश में...,
दरिंदगी पसर रही है,
दुष्कर्म ओर दरिंदगी की,
घटनाए घट रही हैं।
सरकार सो रही है,
बेटियाँ रो रही हैं।
इंसान जानवर से गिद्ध बनने को चला है,
हर कोई भेड़िया बन,
अबला को नोच रहा है।
मैं ऐसा नहीं होने दूँगी,
सामना करूँगी।
माँ मैं फूलन बनूँगी,
कोई आँख उठा देखे तो,
सर क़लम करूँगी।
क़ानून कमज़ोर है,
केस बनेगा,
सालों साल चलेगा।
प्रशासन चुनाव लड़ेगा,
जीतने वाला ,
अपनी सरकार गढ़ेगा
कोई जिए या मरे,
उसे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
तू डर मत माँ...।
माना कि ज़माना ख़राब है,
तेरी बेटी भी ,
काली बनने को बेताब है।
तुम सुन रही हो ना.....माँ..?
मुझे .....जन्म तो ....दोगी ना....?-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)

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Sunday, 2 February 2020

आशीर्वाद (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

आशीर्वाद
(कविता)
जन्मदिन के अवसर पर,
बजुर्गों से मिला आशीर्वाद।
शतायू भव:
चरितार्थ हो वेद वाक्य,
“शत् जीव शरदों वर्धमान “
अर्थात -
निरंतर हो विकास,
बढ़े आन बान ओर शान।
पर हे परमात्मा ...
सुनना मेरी प्रार्थना,
ऐसा देना आशीर्वाद,
केवल देह की आयू ना बढ़े,
आत्मा की स्पष्टता भी बढ़े,
मिले ऐसा प्रसाद।
दीन हो कर ना जियें,
सक्षम हो करके जिए,
ना आए अवसाद।
शरीर की स्वस्थता बढ़े,
भीतर की प्रखरता बढ़े,
सबका हो विकास।
जीर्ण क्षीण देह में,
ओज का हो आवास,
मानो अभी जन्में हो,
ऐसा हो अहसास,
ज़िंदगी ऐसी जियें
ऊर्जा का हो अहसास,
ऐसी जागृति प्राप्त हो,
प्रभु ऐसा देना आशीर्वाद।
तब हो चरितार्थ वेद वाक्य,
शत जीव शरदो वर्धमान:-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)

-0-


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Tuesday, 14 January 2020

मशीन बनते बच्चे (कविता) - श्रीमती कमलेश शर्मा

मशीन बनते बच्चे
(कविता)
सुबह सुबह कड़कती ठण्ड में,
कच्ची नींद से जागते बच्चे,
जल्दी जल्दी तैयार हो,
स्कूल को भागते बच्चे।
साथ साथ ,
मम्मी की भाग दौड़,
नाश्ता बीच में छोड़,
होम वर्क पूरा करवाती,
बच्चे के वज़न से भारी बस्ता,
कंधे पर लादे,
बस तक छोड़ने जाती।
सुबह सुबह ,
जल्दी जल्दी चल कर,
ऊपर से टीचर की डाँट का प्रेशर,
मानो चार छः वर्ष की आयू में ही,
बनाना है उन्हें,
इंजीनियर या कलेक्टर।
टिफ़िन में ठण्डा खाना,
देख कर भूख मर जाना,
घर लौटते ही ज़बरन नहाना,
उलटा सीधा खा कर,
टयूशन पढ़ने जाना,
आते ही,
होम् वर्क में सर खपाना,
उफ़्फ़ ! बच्चों पर इतना दबाव ?
ना खेलने का समय,
ना आराम का।
बच्चों की जान लोगे क्या..?
अगर ऐसे ही चलता रहा तो,
एक दूसरे की होड़ में,
बच्चों का बचपना फिसल जाएगा,
उनका स्वाभाविक विकास रूक जाएगा।
हिम्मत है तो,सुबह पाँच बजे उठ,
उनकी तरह काम कर के दिखाओ,
बच्चों को बच्चा रहने दो,
उन्हें आराम ओर खेलने का समय दो,
मशीन मत बनाओ।-०-
पता
श्रीमती कमलेश शर्मा
जयपुर (राजस्थान)

-0-


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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

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हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

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हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ