*** हिंदी प्रचार-प्रसार एवं सभी रचनाकर्मियों को समर्पित 'सृजन महोत्सव' चिट्ठे पर आप सभी हिंदी प्रेमियों का हार्दिक-हार्दिक स्वागत !!! संपादक:राजकुमार जैन'राजन'- 9828219919 और मच्छिंद्र भिसे- 9730491952 ***
Showing posts sorted by date for query शुभा/रजनी शुक्ला. Sort by relevance Show all posts
Showing posts sorted by date for query शुभा/रजनी शुक्ला. Sort by relevance Show all posts

Wednesday, 6 January 2021

बंटी की वापसी (लघुकथा) - शुभा/रजनी शुक्ला

  

बंटी की वापसी 
(लघुकथा)
बंटी आजकल बड़ा गुमसुम सा रहता था दोस्तो के साथ भी वह नहीं खेलता था आज उसके मम्मी पापा को टीचर ने मिलने स्कूल बुलाया था | उसके मम्मी पापा जो दोनों जॉब करते थे और दोनों ही हर रोज अपना तनाव अपना गुस्सा एक दूसरे पर घर पहुंचते ही निकालने लग जाते थे । दोनों उसे रास्ते भर डांटे जा रहे थे कि तुमने ऐसा क्या कर दिया जो टीचर ने बुला लिया पर बंटी एकदम शांत |
पर टीचर ने जो  कहा उसे सुनकर दोनों के पैरो तले की जमीन खिसक गई टीचर ने कहा बंटी आजकल एकदम चुपचाप रहता है किसी से बात नहीं करता सवालों के जवाब भी नहीं देता है आप लोग बताए क्या बात है क्या उसे घर पर कोई परेशानी है तब नेहा और राज को एहसास हुआ कि कुछ दिनों से उन दोनों के बीच लगातार तकरार हो रही थी उनकी तू तू मै मै में उन्होंने बंटी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था | उन्हें अपनी गलती समझ आ गई थी दोनों उसे प्यार से घर लेकर आए और उसके साथ बहुत ही सामान्य व्यवहार करने लगे अब वे उसके सामने सोच समझ कर बात करते,परिणाम ये हुआ कि उन्होंने अपना पुराना बंटी जल्द ही वापस पा लिया और वे दोनों भी एक हो गए ।
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Friday, 2 October 2020

मेरे बापू (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला

 

मेरे बापू 
(कविता)
राष्ट्र पिता भारत की शान 
      महात्मा गाँधी व्यक्तित्व महान 
सत्य अहिंसा सत्याग्रहों से 
          झुकवाए दुश्मन शैतान 

अँग्रेजों का क्रूर प्रशासन 
        भारतियों का बेबस हाल 
ग़ुलामी की बेड़ियाँ पहने 
      मजबूर माँ बाप,और औलाद 

फूट करो और राज करो 
       अँग्रेजो की ये कूट नीति थी 
बेइमानो और गद्दारों की 
         अपने यहाँ भी कमी नही थी 

कई जयचंद बैठे हुये थे 
      अँग्रेजों से हाँथ मिलाकर 
बने विभीषण कई राजा  
      शत्रु को गुप्त राज बताकर 

स्वार्थी और मक्कार लोगो के 
    कारण हमने बेपनाह दुख पाया 
गाँधी जी के सत्याग्रहों ने 
    फिर हमको स्वराज दिलवाया 

वीर नारायण माधव सप्रे ने ,
      देश हित अपनी जान गवाँ दी 
भगतसिंह लक्ष्मी बाई ने 
      इस क्रांति को और हवा दी 

क्राँतिकारियों का अपना तरीका 
       गाँधी जी का अनोखा सलीका 
प्रेम से पहले समझाते थे  
     फिर सत्याग्रह अपनाते थे 

पैदल दाँडी यात्रा कर 
     लोगो को अपने साथ कर लिया 
और हम ने उस विषम वक्त मे 
      मुकम्मल नेता पा ही लिया 

देशवासियों को स्वतंत्र
    जीने का तुमने मार्ग दिखाया बापू 
सत्य अहिंसा के सिद्धांतो से 
   जनता को प्रेम करना सिखाया बापू 

सौ सौ बार नतमस्तक होकर 
     आज तुमको हम करते याद 
आप ना होते भारत मे तो 
   होता कहाँ भारत साम्राज्य 

अपनी जान गँवाकर तुमने 
     देश को आजादी दिलवाई 
हे राम कहकर के अंत में 
      देश को ईश भक्ति भी दिखाई 

आज आपकी क़ुरबानी पे उस
       प्रश्चिंह लग रहे हैं बापू 
अपने वस्त्र तक त्यागने वाले 
    चरित्र पे दाग़ तक लग रहे है बापू 

अच्छा हुआ ये दिन देखने से पहले
तुम यहाँ से चल दिए थे बापू 
वरना ख़ुद पे ऐसे लांछन 
 कभी सहन ना कर पाते बापू 

सारी श्रृद्धा लुप्त हो चुकी 
   भ्रमित हो जनता क्षुब्ध  हो चुकी 
आज अगर तुम जीवित होते 
  तो ख़ुद को हि गोली मार लेते बापू 
      खुद ही गोली मार लेते बापू 
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Wednesday, 9 September 2020

सावन का महीना (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला


सावन का महीना गीत
                    (कविता)
सावन के झूले पड़े साजन सजनी  संग झूले
ऐसे दीवाने बने घर  परिवार भूले

सावन के महीने की ऋत मतवाली
जित देखू उत् है हरियाली
प्रेम सुमन खिले साजन सजनी झुलें

सारा आलम सतरंगी हो गया
मन हर्षित तन पुलकित हो गया
ओस के मोती सजे साजन सजनी झूले

ओढ़ी धरा ने चादर हरिभरी
सावन में कृषकों की भी खुशियां बढ़ गई
सुगंधित पुष्प महके साजन सजनी संग झूले

चातुर मोर पपिहा  गाए
कोयल मीठे गीत सुनाए
रिमझिम मेघ बरसे साजन सजनी झूले


सावन में पर्वो की धूम मची है गोरी के सर पे चुनर सजी  है
सोलह श्रृंगार सजे  साजन सजनी झूले।
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Saturday, 15 August 2020

एक शहीद ऐसा भी (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



एक शहीद ऐसा भी
                (कविता)
रो रही थी माता एक फूट फूट के
कि चल दिया था उसका लाल उसको छोड़ के

परेशान हो गयी वो उसको ढूंढ ढूंढ के
मिल ना रहा था बेटा कहॉं बैठा छोड़ के

जब बीते कई दिन और बीती कई रात
लोगो ने माँ को बोली फिर एक नयी बात

थाने मे जाके रपट लिखवा दो माँ हर हाल
इनके ही प्रयासों से अब मिलेगा तेरा लाल

कहने से सबके बूढी माता थाने पहुंच गयी
बेटे की फोटो देकर दरखास्त ये करी

लाल मेरा खो गया है कई दिन से सरकार
ढूंढ करके लादो ये माँ मानेगी उपकार

गजब का था निशाने बाज करता था बस कमाल
दुश्मन को मारने की ही करता था वो बात

कहता था फौज जाऊंगा पर ना था कोई ठिकाना
शिक्षण ना कोई प्रशिक्षण कैसे लगता उसका निशाना

मॉं रोये जा रही थी ना कोई था सपोर्ट
आखिर को अॉफिसर ने लिख दी उसकी रिपोर्ट

अफसर ने कहा जा मॉंअब चैन से घर जा
हम ढूंढ कर लायेंगे तेरा बेटा चुप हो जा

काफी दिनो के बाद मॉं को एक सूचना मिली
शिनाख्त बेटे की करने की उसे सजा मिली

लिपटा था लाल उसका आज तिरंगे झंडे मे
और देश गर्व कर रहा था उसके मरने मे

ना जाने कैसे पहुचा वो युद्ध के मैदान
 दुश्मन को मार स्वयं तज दिये थे प्राण

शरीर छलनी था सारा लगता था देख के
हैवानियत की हद पार कर दी थी बैरी  ने

गर्म लोहे की राड से उसके कानो को फोड़ा था
नाखुनो को खींच के सारी हड्डियो को भी तोडा़  था

धारदार शस्त्र से आँखे निकाल ली गयी थी
इंसानियत की सारी हदे पार कर दी गयी थी

सरहद मे जाके उसके पुत ने एैसा कमाल दिखलाया था
माँ ने देखा जब लाल को एैसे , फक्र उसे हो आया था

जो रो रही थी अब तक बेटे के विरह व्यथा से
अब हंसने लगी थी सुन कर बेटे के वीर कथा पे

धन्य हुयी मै आज हे धरती मॉं जो मुझको जनम दिया
इस पावन भूमि पे जन्म के एैसे लाल को जनम दिया

अट्टहास कर उठी अचानक हाँथ मे तिरंगा उठा लिया
जय हिन्द जय भारत जय मेरा लाल कहके उसने भी दम तोड़ दिया ।

एक नही अनेक हैं माता एैसी मेरे भारत देश मे
शत शत नमन है उनको आज अपने इस स्वदेश मे ।
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-



शुभा/रजनी शुक्ला जी की रचनाएं पढ़ने के लिए शीर्षक चित्र पर क्लिक करें! 

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Friday, 10 April 2020

हे माँ शेरावाली (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



हे माँ शेरावाली 
                    (कविता)
काल के फंदे से हमको छुडाओ
हे मां शेरावाली ।।
करोना के पंजे से हमको बचालो
हे वैष्णव महारानी मां......

हे शारदे किरपा करो महामाई
बचा लो मैंया छुडा लो भैया
चरणों में तेरी जयकार जयकार रे-- हे शारदे

धरती पे कैसा वाइरस आया
मौत का खतरा छाया
मुह फैला कर मासूमों को
अपना ग्रास बनाया
तुझपे सबकी है श्रद्धा अपार
बचालो मैया छुड़ा लो मैया
चरणों में तेरे जयकार जयकार रे --- हे शारदे

2-- वैसे तो इंसा ने खुद अपने
पाव कुल्हाड़ी दे मारी
जैसी उसकी करनी थी तो
ये सजा भी कम ही है माई
सबका जीवन हुआ दुश्वार
बचा लो मैया छुड़ा लो मैया
चरणों में तेरी जयकार जयकार रे -- हे शारदे

3-- तुम हो हमारी प्यारी माता
भक्तो की दुख हरता
जिसका नहीं गर कोई जगत में
तेरे प्रेम से भरता
अपने बच्चो को तू ही सम्हाल
ओ शेरा वाली ,पहाड़ा वाली
चरणों में तेरी जयकार जयकार री हे शारदे --
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Saturday, 28 March 2020

प्रेम के सब रस रंग (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



प्रेम के सब रस रंग
                    (कविता)
प्रेम प्यार स्नेह सब एक ही पेड़ के अंग
सतरंगी डालो में दिखे प्रेम के सब रस रंग

भाई बहन पितृ और माता
सबका सबसे है प्रेम का नाता
दादा नाना दोस्त और सखियां इनका आपस मै अद्भुत नाता

प्रेमरस की है अजब सी माया इससे कोई भी ना बच पाया
जो ना करे प्रेम किसे से तो
वो प्राणी दानव कहलाता

मुक बाघिर भी प्रदर्शित करते
मौन ही सही पर अपनी भाषा
मुक जानवर भी रखते मन में
प्रेम प्रदर्शन की अभिलाषा

राधा कृष्ण की प्रेम कहानी
हरेक के मन में प्रेम जगाती
एक दूजे पे अटूट श्रद्धा से
बिछड़े जोड़ो को मिलवाती

राधे राधे रट कर देखो
कृष्ण का संग यूं ही पा जाओगे
कृष्णा कृष्णा रटते रहना
प्रेम राधा का पा ही लोगे


युगों युगों तक याद रखी है
हमने लैला मजनू की प्रेम गाथा
ईश्वर की सुंदर सृष्टि में
प्रेम विरक्त कोई कैसे रह पाता

प्रेम करना बुरी बात नहीं
प्रेम से सच्चा कुछ भी नहीं
पर मर्यादा की हद पार करो
बस ये है युवाओं सही नहीं।

आधुनिक काल में बदल गये
प्रेम के सारे प्राचीन पैमाने
आंखों से उतरकर प्रेम आज तो
शर्तों की भाषा पहचाने

प्रेम की मर्यादाये भी तोड़ते
आज के प्रेमी पागल दीवाने
जाके कौन इन्हे समझाए
प्रेमी के होते दिल ही ठिकाने

सच्चे प्रेम की एक ही निशानी
सुनी तो होगी मीरा की जुबानी
कबीर के ढाई आखर का मतलब
कब समझेगी पीढ़ी नई दीवानी

आज प्रेम का अनुपम दिन है
प्रेम ही पाओ प्रेम ही बांटो
गर कोई दुखी मिल जाय
तो गले लगा उसके गम बांटो
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Tuesday, 10 March 2020

हमारी होली (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला




हमारी होली 
(कविता)
♥️
करती हूं याद आज भी मै बचपन की वो हंसी ठिठोली
जब घर चौबारा रंग दिनभर खेला करते थे हम होली

सुबह सबेरे तन पे अपने सरसों तेल मलवाते थे
चाचा पापा और बुआ फिर रंगों के हौज भरवाते थे

खाने पीने की सुध बिसरा क्या मस्त मलंग विचरते थे
राह में चलते राहगीरों को सतरंगी रंगों में रंगा करते थे

रंगीन पानी के वो छोटे फुग्गे आज भी पीठ पे पड़ते हैं 
 बच्चों के ये फुगगे खा हम अपने समय में पहुंचते हैं

वो भी क्या होली होती थी बिंदास मगन मन होती थी
पूरे परिवार के लोगों को जो स्नेह प्रेम मे रंग लेती थी

खोवे की गुजिया की सौंधी खुशबू मद मस्त हमें कर जाती थी
ठंडी ठंडाई और भंग की गोली क्या अपने जलवे दिखाती थी

होली आज भी वही है लोगो जो हमने भी खेली थी
पर आज की होली से वो पवित्र शुद्घ और अलबेली थी

बेईमानी और मिलावट के चलते आज कुछ भी स्वस्थ रह नहीं गया
मक्कारो से भरी दुनिया में कोई भी स्वच्छ रह नहीं गया

खैर धूल डालें इन बातो पर क्योंकि ऐसे लोग सुधर नहीं सकते
झूठ फरेब के गहरे दलदल में फंसे ये मानव कभी निकल नहीं सकते

ऐसे लोगों से विनती मेरी त्यौहार को त्यौहार ही रहने दें
इंसानियत को आगे रखकर त्यौहार हर्ष से मनने दें

आप सभी के शुभ आगमन से मन सुमन यूं खिल गया
होली का तो मिजाज ही रंगी, रंगीन चेहरे देख और भी निखर गया

-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Wednesday, 4 March 2020

जीवन साथी (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला



जीवन साथी
                (कविता)
जीवन साथी तेरे बिन
ये दुनिया दुनिया नही लगती
जब तक हो ना दो चार बातें
ये ज़िन्दगी बढिया नही लगती

चाहे हो तोहफ़े का मामला
या घूमने फिरने का माजरा
मै उत्तर तो तू है दक्षिण
मै दस तो तू नंबर ग्यारह

गर मुझको जाना हो पीहर
रूक जाऊँ तंरी हँसी देखकर
क्यों इतना ख़ुश हो जाते हो
मुझे अपनी ससुराल भेजकर

जब होती ख़र्चे की बात
बंद हो जाती तेरी ज़ुबान
दुनिया भर का ख़र्च तो करते
मेरे वक़्त कमान कस जाती

कम करो तुम अपना ख़र्चा
कह के मेरा जीना दूभर किया
और मैंने तेरा कहा मान
एैसा ही जीवन जी लिया

बात आये जब बच्चों की
उनकी परवरिश मुझे है करना
मै तो पैसा दे देता हुँ
अब आगे सब तुम्ही को करना

जब बच्चा कुछ अच्छा करता
बच्चे का पापा नाम कमाता
और जब हो कुछ उलटा सीधा
सारा इल्ज़ाम बस माँ पर आये

वाह मेरे प्यारे जीवन साथी
हम तुम दोनो एैसे दीपक बाती
साथ तो चलते रहते हरदम
पर राह कभी भी मिल नही पाती
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Sunday, 16 February 2020

मायका (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला





मायका
                (कविता)
मायके की दहलीज लांघ कर 
आज के दिन ससुराल आई 
माता पिता के संस्कार ले कर 
नए परिवार को अपनाने आई

मा बाबा के प्यार भरे मन को 
हंसते रोते तोड़ आई 
भाईयो संग  लड़ने झगड़ने की 
परंपरा पीछे छोड़ आई 

सखियों के संग घूमना फिरना 
अमराई से आम चुराना
स्कूल कॉलेज की धमाचौकड़ी
वो सबकुछ मै भूल आई 

सप्तपदी के सात फेरों से 
मेरी सारी दुनिया ही बदल गई 
मायके की प्यारी रजनी बिटिया 
सासरे की बहु शुभा शुक्ला बन गई 

मां का ममता से भरा आंचल
पिता की उंगली का वो सहारा
भैया के बाग की सोन  चिरैया
मायके से उड़ ससुराल पहुंच गई

शादी को हो गये पच्चीस साल
जिंदगी के बीते साल बेमिसाल
मायके वालों का बहुत शुक्रिया
जिनसे मेरा जीवन है खुशहाल
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)

-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

Monday, 27 January 2020

देश सेवा साहित्यकार की कलम से (कविता) - शुभा/रजनी शुक्ला






देश सेवा साहित्यकार की कलम से
                (कविता)
देश की सीमा में तैनात जवान सारी मुश्किलों से हमें बचाता
और एक साहित्यकार देशवासियों में देशभक्ति की धड़कने जगाता है

कलम की अपनी तेज धार चला कर वो जन जन में क्रांति लाता है
सैकड़ों युगों से चलते आ रहे ध्रश्टता के आइने लोगो को दिखलाता है

जब कलमकार अपनी पे आ जाता है तो अच्छे अच्छो को हिला जाता है
उसकी कलम की मार से फिर एक नया इतिहास रच जाता है

कलम की धार से हर शख्सियत खौफ जदा होता क्योंकि तलवार से भारी असर कलम का ही होता

प्रकृति का चित्रण हो या नारी सौन्दर्य कलम शोख़ अंदाज दिखाती

पर जब बात हो देश की शान की तो यही कलम आग बरसाती
-०-
शुभा/रजनी शुक्ला
रायपुर (छत्तीसगढ)
-०-

***
मुख्यपृष्ठ पर जाने के लिए चित्र पर क्लिक करें 

सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ