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Saturday, 19 December 2020

माँ ! मैं तेरी लाडली (कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

 

माँ! मैं तेरी  लाडली
(कविता)
माँ ! मैं तेरी  लाडली,
सीख रही सब काम
पढ़ लिख करने हैं मुझको
बड़े बड़े सब काम ।

लेकिन तुम घबराना ना
हार कभी ना मानूँगी
बेलन और कलम दोनों के
राज सभी पहचानूँगी ।

गोल गोल रोटी बनी
पृथ्वी भी है गोल
अग्नि लकड़ी से जली
प्रकृति चारों ओर ।

पढ़ कर मैं भी कर दूँगी
नए नए आविष्कार
हाथ सने आटे से ही माँ
करूँगी  मैं चमत्कार ।

उडूँ आसमां की ऊँचाई
चाँद, सितारे छू लूँगी
धरती से अंबर तक सारे
नक्षत्रों को छू लूँगी ।

अब न रुकूँगी, नहीं थमूँगी
आगे बढ़ती जाऊँगी
कितनी भी बाधाएँ आएँ
अब मैं नहीं घबराऊँगी ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-

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Sunday, 23 August 2020

चल पड़ा था एक दिन (कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

चल पड़ा था एक दिन
(कविता)
चल पड़ा था एक दिन
यूँही अकेला राह पर
आस थी मिल जाएगा
कोई तो देगा साथ अब

मिल तो रहे थे बहुत से
मुझ औजैसे, जो थे चल पड़े
पर सभी थे गुम यहाँ
कोई ना मिलना चाहते

मन में छुपाए लाख गम
नजरों से करते थे बयाँ
लेकिन वो अपनों से भी
दर्दे दिल छुपाकर चल रहे

चल रहे कुछ साथ ,पर
ना चाहते थे बोलना
डर था कहीं सब मर्म
पड़ जाए ना उनको खोलना

हमउम्र भी थे हम सभी
थे जख्म सबके ही हरे
रिस भी रहे थे कुछ यूँही
नासूर थे जो बन गए

मरहम लगाता कौन?
एक-दूजे से सब ही कट रहे
मुस्कुराते देखकर , पर
मौन ही सब चल रहे

बैठे भी थे फिर साथ में
लेकिन ना कोई बात की
मैने जरा सा छेड़ा तो
बहने लगी  अश्रु कड़ी

सबके ही जख्म थे एक से
मरहम भी था वो एक ही
लेकिन वो डिबिया ना मिली
हमको किसी बाजर में

चलना है यूँ ही राह में
धीरज ये मन में धर रहे
भीड़ है चारों तरफ
फिर भी अकेले चल रहे।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-

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Friday, 7 August 2020

साजन एक बार आ जाओ (गीत) - श्रीमती सुशीला शर्मा

साजन एक बार आ जाओ
(गीत)
साजन एक बार आ जाओ
भेज संदेसा इस बिरहन को
तुम विश्वास दिलाओ
साजन एक बार आ जाओ

जेठ गया  ,आषाढ बीत गया
ना ही ली नी खबरिया
अब सावन के झूले पड़ गए
तरस गई है नजरिया ।

साजन एक बार आ जाओ
भेज संदेसा इस बिरहन को
तुम विश्वास दिलाओ
साजन एक बार आ जाओ

तुम बिन सूनी मोरी अटरिया
सावन  मोहे सतावे
ठंडी-ठंडी पुरवाई में
जिया मोरा घबरावे

साजन एक बार आ जाओ

बरखा की ये छमछम बूँदे
अंग-अंग सिहराए
बिजली चमके बादल में
पिव का संदेसा लाए

साजन एक बार आ जाओ
भेज संदेसा इस बिरहन को
तुम विश्वास दिलाओ
साजन एक बार आ जाओ

राह बिछाए नैना तरसे
अब तो दरस दिखाओ
विरह वृथा को दूर करो अब
आलिंगन कर जाओ

साजन एक बार आ जाओ
भेज संदेसा इस बिरहन को
तुम विश्वास दिलाओ
साजन एक बार आ जाओ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-

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Monday, 17 February 2020

प्री वेडिंग फिल्म (आलेख) - श्रीमती सुशीला शर्मा

प्री वेडिंग फिल्म 
(आलेख)
कुछ दिन पहले हम एक शादी में गए।पंडाल मुख्य द्वार तक कृत्रिम फूलों, लड़ियों, बंदनवारों, मूर्तियों से सजा था। साथ ही नव वर-वधू के बड़े-बड़े पोस्टर होल्डिंग में बाहर से अंदर तक अपना परिचय दे रहे थे। आश्चर्य तो तब हुआ, जब अंदर मैदान में स्टेज के साइड में एक बड़ा सा स्क्रीन लगा था और उसमें वर-वधू की फिल्म चल रही थी। उसमें बाग बगीचे, दर्शनीय स्थल, मॉल ,सड़क आदि में फिल्माए गए अंतरंग दृश्य एक फिल्म की तरह दिखाई दे रहे थे और आगंतुक स्टेज में बैठे लाइव वर वधु से ज्यादा स्क्रीन का लुफ्त उठा रहे थे। हमारे लिए यह सब चौंकाने वाला था क्योंकि पहला पहला अनुभव था। सोच रही थी कि अभी तो शादी हुई नहीं तो ऐसे हनीमून सीन पहले से ही कैसे बन गए?घर आकर चर्चा की तो हमारे युवाओं ने हमें बैकवर्ड करार कर दिया। बोले ,"मम्मी जमाना बदल गया है ।उसके लिए फोटोग्राफर शादी से पहले ही यह सब शूटिंग कर लेते हैं और पता है इसका पैकेज है कम से कम लाख डेढ़ लाख रुपए ।मेरा तो मुंह खुला का खुला ही रह गया। कुटिल दिमाग में यही आया ,"यदि शादी छूट गई तो ?क्योंकि आजकल हमारे युवा बहुत जल्दी फैसले ले लेते हैं। शादी के बाद कितने समय साथ रहना है, या नहीं। कैसे रहना है? फिर इस तरह की प्री वेडिंग की फिल्मों का क्या होगा? एक दूसरे के प्रति सारा प्यार तो इन्होंने पहले ही उंडेल दिया। खैर, भविष्य किसने देखा है ।मेहमानों का काम है आशीर्वाद दो खाना खाओ और चिंता छोड़कर घर जाओ। अब तो हम भी अनुभवी हो गए हैं, क्योंकि आए दिन जहाँ जाते हैं ऐसी शूटिंग होते देख कर मुंह फेर लेते हैं।
ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी को गुमराह होने से बचा ले ताकि वसुधैव कुटुंब बने रहें।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Monday, 23 December 2019

बच्चे का दिल दुखा दिया (संस्मरण) - श्रीमती सुशीला शर्मा

बच्चे का दिल दुखा दिया
(संस्मरण)
बात कुछ दिन पहले की है ।हम दोनों कार में बाजार जा रहे थे ।अजमेरी गेट से चौड़े रास्ते के सिग्नल पर लाल लाइट में रुके तो एक दस -बारह साल का बच्चा गाड़ी के पास आकर बाॅल पैन दिखाकर बोला, "आंटी लेलो ।पहले तो मैने इशारे से मना कर दिया, लेकिन बहुत कहने पर शीशा खोलकर पूछ ही रही थी कितने का है? वो बोला दस रुपये का ।उसने दो पैन जरा से खुले शीशे से अंदर कर दिए ।इतने में ही हरी बत्ती जल गई और हड़बड़ा कर मैने शीशा बंद किया तो उसका एक पैन टूट गया ।मेरी मजबूरी थी, क्या करती ।मन बहुत दुखी हुआ ,पर क्या करती ।ट्रेफिक ज्यादा था इसलिए आगे बढ़ना पड़ा।रामलीला मैदान में गाड़ी पार्क की और जल्दी से बाहर आकर चौराहे तक गई भी ताकि वो दिखाई दे तो उसे टूटे पैन का हर्जाना दे दूँ और पैन भी लेलूँ ,लेकिन वो तो आस पास कहीं नजर ही नहीं आया।बाजार में भी मेरा मन अशांत ही रहा ।मुझे अभी भी उसके लिए पछतावा हो रहा है ।
जब आपने गांधी दिवस पर आलेख की बात की तो स्वतः ये घटना याद आ गई कि मैने एक गरीब का दिल दुखाया।वो बच्चा जहाँ भी हो, मुझे क्षमा करे ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Monday, 9 December 2019

निर्भया से मुक्ति कब? (आलेख) - श्रीमती सुशीला शर्मा

निर्भया से मुक्ति कब?
(आलेख)
आए दिन होने वाली निर्भया कांड के समाचार, लेख, कविताएँ, कहानियाँ पढ़ने से लगता है जैसे हम युग परिवर्तन करने जा रहे हैं ।कांड होता है, हल्ला होता है, मोमबत्तियाँ जलती हैं और हजारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं, नारे लगाते हैं, कहानियाँ घड़ते हैं ।टीवी चैनल, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ मुद्दे को मसालेदार बनाकर पी आर पी बढ़ाते हैं।
आज मुझे याद आती है महान कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर की कविता "एक फूल की चाह "।भले ही विषय भिन्न हो, लेकिन सुखिया जैसी कई निर्भया हैं जिन्हें जलाया गया है ।सुखिया तो महामारी का शिकार हुई थी लेकिन आज फैल रही बलात्कार, भ्रष्टाचार की महामारी का क्या इलाज है ।लोगों की मानसिकता को कैसे बदला जाए ।ये बीमारी तो हमारे किशोरों,युवा,प्रौढ और यहाँ तक कि वृद्धों तक महामारी के रूप में फैल रही है ।इसका ना तो कोई 'टीका ' बना है ना ही कोई 'इंजेक्शन '।कितनी विडंबना है कि एक पिता को अपनी बेटियाँ "राख के ढेर " के रूप में मिलती हैं।मजबूर है वो पिता जो बेटी का बाप होकर अपने को कोसने लगता है ।
हमारे देश की चंद बेटियाँ बड़े बड़े विलक्षण काम करके देश का नाम विश्व स्तर पर कायम कर रही हैं लेकिन क्या वे अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हैं? सरकार उन्हें आत्म सुरक्षा की ट्रेनिंग देने की मुहिम तो चलाती है लेकिन कितने अभिभावक हैं जो अपनी बेटियों को उसके लिए भेजते हैं या बचपन से उन्हें इतना ताकतवर बनाते हैं जो वो अपनी सुरक्षा के लिए कम से कम हाथ-पैर तो मार सके ।लेकिन ये सिलसिला तबतक चलता रहेगा जब तक अमानुष विकृत बुद्धि के लोगों का इलाज नहीं होगा ।क्यों आदमी, औरतों को कुदृष्टि से देखता है? कहाँ चली जाती है मर्यादा जो वो अपनी स्वयं की बेटियों के लिए चाहता है ।झंडे और मोमबत्ती लेकर तो हजारों लोग निकल पड़ते हैं मगर कौन जानता है कि उनमें सभी दूध के धुले हैं।जुलूस निकालना, तोड़ा फोड़ी करना, सार्वजनिक चीजें तोड़ना ,अराजकता फैलाकर सरकार के कानून को दोषी ठहराना तो आज आम बात हो गई है ।हम दुनिया बदलने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन स्वयं को नहीं बदल सकते ।
हमारे देश में खाली दिमाग शैतान का घर बनता जा रहा है ।अधिकांश बच्चे, युवा, प्रौढ, वृद्ध ऐसे हैं जिनके पास व्यस्त रहने के लिए कोई काम नहीं है ।छोटे काम करने में वे अपनी तौहीन समझते हैं ।घरेलू काम, खेती-बाड़ी ,छोटा काम करने को छोड़कर हर कोई कुर्सी में बैठने के सपने देखता है ।खाली बैठना, लूट पाट, धोखाधड़ी, चोरी, ह्त्या से तो अब डर हट ही गया है ।सोचते हैं जब तक पकड़े नहीं जाते, वारदात को अंजाम देते रहें ।पकड़े भी गए तो जमानत से छूट जाएँगे वर्ना सरकारी जवाँई बन कर रोटी तो मिल ही जाएगी ।
सारी बातों का निचोड़ है मानसिकता में बदलाव ।अब ये कैसे आएगा, हमारे मनोचिकित्सक, समाज सुधारक, शिक्षक, अभिभावक एवं गुणगान ही इसका समाधान निकालें ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Thursday, 23 January 2020

एक नई सोच (आलेख) श्रीमती सुशीला शर्मा

एक नई सोच
(आलेख)
मेरी एक मित्र बहुत दिनो से मुझे अपने घर बुला रही थी ।शनिवार को सुबह का काम निपटाकर करीब ग्यारह बजे मैं उसके घर गई ।पूर्व सूचना मैने उसे नहीं दी ।घर के बरामदे में पहुँची तो अंदर से खूब ठहाके लगने की आवाजें आई ।मै थोड़ी देर रुकी ।लग रहा था जैसे अंदर और महिलाएँ भी हैं ।जब आवाज कम हुई तो मैने घंटी बजाई ।एक महिला ने दरवाजा खोला ।वो मुझे नहीं पहचानती थी लेकिन बड़ी ही शालीनता से उसने मुझे नमस्ते किया और अंदर आने के लिए कहा ।जब मेरी मित्र ने मुझे अचानक देखा तो बहुत खुश हुई और मेरा परिचय अपनी बहू से करवाया ।निकटता जानते ही उसने पैर छूकर आशीर्वाद लिया ।बेटे की शादी को अभी अधिक समय नहीं हुआ था ।मैं भी किसी कारण से शादी में नहीं जा पाई थी ।खैर अब उसने अन्य महिलाओं से भी परिचय करवाया ।पता चला वहाँ मोहल्ले की पार्टी चल रही थी ।सभी महिलाएँ सास - बहू की जोड़ी में थीं ।काफी हँसी ठिठोली, चुहलबाजी और बातों के चटकारे चल रहे थे ।वातावरण बहुत ही सकारात्मक था ।एक दूसरे पर व्यंग्य भी हो रहा था ।यहाँ सास -बहू का कोई दबाव या भय का माहौल नहीं था ।बस सब तनाव मुक्त थे ।मुझे बहुत अच्छा लगा ।मै तो सोच में पड़ गई कि सास - बहुओं में इतना खुला और तनावरहित रिश्ता वास्तव में सराहनीय है।मन ही मन उन सबको शुभकामनाएँ दीं और चाय नाश्ता कर मैं एक नई सोच के साथ घर लौटी और
घरवालों से सारी बातें साझा करके मन प्रसन्न हो गया ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Monday, 30 March 2020

यादों का पिटारा (कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

यादों का पिटारा
(कविता)
तहखाने में मैंने देखा, इक लोहे का बक्सा
रखा हुआ था उसमें मेरी, किस्मत का लेखा-जोखा
झाड़ पौछ कर खींचा आगे, लगा हुआ था ताला
चाबी लाकर खोला तो, निकली यादों की माला ।

एक कोने में रखे खिलौने , छोटे चकला बेलन
एक कढ़ाई, करछी, थाली, चूल्हा और एक झाड़न
एक तरफ था मेरे प्यारे, गुड्डे - गुड़िया का जोड़ा
बैठ के गुड्डा जिसमें आया, वो भी था एक घोड़ा ।

धूमधाम से हमने मिलकर, उनका ब्याह रचाया
घर के पिछवाड़े में मंडप, फूलों का सजाया
फेरे लेकर गुड़िया रानी, मेरे घर आई थी
मित्र मंडली नाच नाच कर, उसे संग लाई थी ।

पास में कुछ छोटे कपड़े ,जो मुझको चिड़ा रहे थे
जिनकी खातिर लड़ती थी मैं, सब कुछ बता रहे थे
दीदी वाली पुस्तक भी , जो मैनें भी पढ़ डाली थी
ड्रेस भी दीदी वाली थी, जो पहन के स्कूल जाती थी ।

एक छड़ी भी रखी थी इसमें, माँ हमको हड़काती थी
हल्ला ,गुल्ला करने पर वो, इससे हमें डराती थी
कुछ दद्दू की चिट्ठी भी थीं, जिससे हमें बुलाते थे
गर्मी की छुट्टी में हम सब, गाँव घूम कर आते थे ।

गेहूँ, गन्ना, चने, मटर की, फसलें वहाँ लहराती थीं
दूध, दही, घी लस्सी, मक्खन, दादी हमें खिलाती थी
हृष्ट-पुष्ट हो कर आते थे, स्वस्थ सभी रहते थे
लेकिन पढ़ने की खातिर हम, शहर में ही रहते थे ।

बक्से में सब मिला पिटारा, यादें हो गईं ताजा
भूल गए वो सादा जीवन, किससे करेंगे साझा
अब हम दादा-दादी हैं पर, कुछ भी ना कर पाते
क्योंकि बच्चे अब छुट्टी में ,परदेस घूमने जाते ।

अब तहखाना होता है पर, बक्सा ना होता है
ना वैसे गुड्डे -गुड़िया का, ब्याह कोई करता है
ना दादी की चिट्ठी होती, ना पीपल की छाँव
कृत्रिम जीवन हुआ आज है, ना मिलता विश्राम ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Wednesday, 11 March 2020

स्वच्छ भारत की धज्जियाँ ( आलेख) - श्रीमती सुशीला शर्मा

स्वच्छ भारत की धज्जियाँ
(आलेख)
कुछ समय पूर्व जब हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी को समुद्र किनारे से सुबह-सुबह कचरा उठाते देखा तो शर्म से सिर झुक गया ।महसूस हुआ कि यदि भारत का सर्वोच्च नागरिक अपने देश को सुंदर, स्वच्छ और मनोरम बनाने के लिए स्वयं व्यक्तिगत रूप से निस्वार्थ सेवा में प्रस्तुत है तो हम इस अभियान में सौ प्रतिशत भागीदारी क्यों नहीं दे पा रहे हैं ।
हमारे भारतीय आजकल धड़ल्ले से विदेश यात्राओं में जा कर अपना मनोरंजन कर रहे हैं और हफ्ते भर की यात्राओं से आते ही वहाँ की स्वच्छता और सुन्दरता का बखान दिल खोलकर करते हैं लेकिन वो ही लोग अपने घरों का कचरा स्वच्छ भारत की गाड़ी में डालने पर भी आलस करते हैं और रात के अंधेरे में यहाँ वहाँ फैंक कर राहत की साँस लेने लगते हैं। 
हर छोटे-बड़े समारोह, रैली, शादियाँ आदि होने के दूसरे दिन सड़कों ,मैदानों, भवनों में नेता, समाजिक कार्यकर्ता या सफाई कर्मचारी हाथ में बड़ी बड़ी झाडुएँ लेकर प्लास्टिक की ग्लासेज, पेपर प्लेट,पानी की खाली बोतलें, इश्तिहारों के पैम्प्लेट्स,फूलों की मालाएँ और ना जाने क्या-क्या गंदगी बटोरते नजर आते हैं और मीडिया के सामने बड़ी बड़ी बातें करते हैं और टीवी चैनल्स में छाए रहते हैं।
सवाल ये उठता है कि क्या हमारी जनता इतनी अनपढ़ गँवार है जो हाथों में झंडे और स्वच्छ भारत के बैनर लेकर नारे लगाने के लिए तो सड़कों पर निकल पड़तीं लेकिन जब भी किसी समारोह में जाती है तो उन्ही नारों की धज्जियाँ उड़ा देती है ।बराबरी तो हम विदेशों की करना चाहते हैं लेकिन सफाई की सारी जिम्मेदारी प्रशासन, सरकार और सफाई कर्मचारियों पर थोप देते हैं।हमें हर जगह सफाई चाहिए चाहे वह ट्रेन ,सड़क, उद्यान, धार्मिक स्थल या घर के बाहर । "स्वच्छ भारत का इरादा " गाती हुई गाड़ियाँ सुबह से रात तक हमारा गंदा और बदबूदार कचरा भर कर ले जाती है ।क्या वे इंसान नहीं है जो हम सबके कचरे को अपने हाथों से दबा दबाकर गाड़ियों के ऊपर अपना दिन गुजार देते हैं ।धिक्कार है हमें जो हम स्वयं को सभ्य नागरिक समझते हैं और जहाँ भी जाते हैं अपनी असभ्यता और असामाजिक होने की छाप छोड़ आते हैं।
धन्य हैं हमारे प्रधानमंत्री जी जिन्होंने कुंभ मेले में सफाई कर्मचारियों को सम्मानित किया ।वास्तव में ऐसे ही लोग सम्मान देने योग्य हैं जो अपने वजूद को भुलाकर देश की निस्वार्थ सेवा करते हैं ।नेता, अभिनेता और सफेदपोश लोग हाथ में झाडू लेकर मीडिया के लिए बड़ी बड़ी तस्वीरें खिंचवा कर अंतर्ध्यान हो जाते हैं ।जब तक देश का हर व्यक्ति अपनी गंदगी स्वयं साफ नहीं करेगा, भारत स्वच्छ कभी नहीं हो पाएगा ।जागो भारत जागो ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Sunday, 23 February 2020

अस्पताल के फेरे (व्यंग्य रचना) - श्रीमती सुशीला शर्मा

अस्पताल के फेरे
(व्यंग्य रचना)
ईश्वर इस द्वार के फेरे किसी को ना लगवाए ।नरक -स्वर्ग के इस विशाल भवन की भूल-भुलैया में मरीज ऐसा गुम जाता है कि जांचों के मायाजाल में अपनी असली बीमारी तो भूल ही जाता है । रिपोर्टें आते ही नई नई लघु बीमारियाँ और पता चल जाती हैं जिससे वो स्वयं को आजीवन मरीज मान बैठता है ।सही इलाज हो गया तो स्वर्ग वर्ना नरक तो भुगतना ही होगा ।
यदि आपने अपना चिकित्सा बीमा करवा रखा है तो सच मानिए कि किसी बड़े अस्पताल में जाते ही आपकी ऐसी आव भगत होगी जैसे लक्ष्मी स्वयं उनके द्वार पर चलकर आई है ।बीमारी भले ही छोटी सी हो लेकिन डॉक्टर उसके ऐसे नामों से आपका परिचय करवाएँगे जो कभी आपने सपने में भी नहीं सुने होंगे ।आज के डाक्टर मरीज की नब्ज देखने या हाथ लगाकर बीमारी बताने का हुनर तो रखते ही नहीं ।बीमारी सुनते ही हजारों की जाँचे लिखकर मरीज और घरवालों की आधी कमर तोड़ देते हैं ।जाँचें करवाने में मरीज और उसकी सुश्रुषा करने वाला विभिन्न जाँच शालाओं के इतने भ्रमण कर लेता है कि यदि पहले इतनी घुमाई करता तो शायद बीमार ही नहीं पड़ता ।खैर यहाँ के सारे काम राजा शाही होते हैं ।एक दिन खून देकर आओ, दूसरे दिन रिपोर्ट लाओ, तीसरे दिन ईसीजी आदि आदि ।इस जाल से बाहर आकर हाथ में रिपोर्टों का पुलिंदा लिए जब डॉक्टर के पास जाओगे तो उसके चेहरे की रौनक देखते ही बनती है कि अब ये पोषित बकरा जल्दी हलाल होने को तैयार है और बस फिर क्या आपको शाही बीमारी के साथ सबसे पहले "आई सी यू "कहकर यमद्वार के भीतर प्रवेश दे दिया जाएगा।अंदर कोप भवन में आपके सम्पूर्ण शरीर की जाँचें होंगी ।बीमारी पकड़ में आ जाए तो आपकी किस्मत वर्ना दाए की जगह बाएँ अंग का इलाज हो जाएगा ।
डाक्टर को हमने देवदूत माना है इसलिए थोड़ी सी शारीरिक व्यथा होते ही उनकी शरण में चले जाते हैं फिर वो 'तारे या मारे ' उसकी कृपा पर निर्भर है ।बाबा रामदेव जी बेचारे आँख को जोर दे देकर प्रकृति से जुड़ने की हिदायत देते हैं ।आयुर्वेद की जड़ी-बूटी खाने को कहते हैं लेकिन आधुनिक शरीर बिना कृत्रिम साँस और ग्लूकोज की नली लगाए बिना ठीक ही नहीं होता ।खानपान, रहन-सहन, दिनचर्या को अव्यवस्थित करके हमने अपने पैर खुद कुल्हाड़ी मारी है तो आए दिन अस्पताल रूपी यम द्वार के दर्शन तो करने ही होंगे ।
स्वस्थ रहें, मस्त रहें,यही कामना करती हूँ ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


***
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Wednesday, 15 April 2020

राजा का ऐलान (बाल कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

राजा का ऐलान
(बाल कविता)
जंगल के राजा ने कर दिया
एक बड़ा ऐलान
शहर ना जाएगा अब कोई
तभी बचेगी जान ।

कचरा गलियों में फैला है
पेड़ ना कोई वहाँ बचा है
ऑक्सीजन की मारामारी
फैल रही लाखों बीमारी ।

आँखों में चश्मा पहना है
मुँह में सबके मास्क लगा है
तरह-तरह की हैं महामारी
जिससे मर रही जनता सारी ।

जंगल हमें बचाना है
मानव के पास ना जाना है
यदि वहाँ तुम जाओगे
अपनी जान गँवाओगे ।

सबने मिलकर ठानी है
राजा की बात भी मानी है
शहर ना जाएगा अब कोई
सबको जान बचानी है ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Monday, 27 January 2020

भारत माँ की शान है (कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

भारत माँ की शान है
(कविता)
शीश मुकुट हिम गिरि का पहने
गंग धारा जयमाल है
हरित धरा का वसन निराला
भारत माँ की शान है ।

एक हाथ विंध्याचल पर्वत
दूजे हिम की झालर है
चरण पखारे सागर जिसके
ऐसा रूप निराला है ।

वेद पुराणों के जयकारे
घर-घर गूँजे जाते हैं
ऋषि-मुनियों के तप बल भी
धरती पावन कर जाते हैं।

गंगा, यमुना, सरस्वती की
धारा जब मिल जाती है
संगम होता जब तीनों का
प्रयाग राज कहलाती है ।

अमृत बिखरा है धरती पर
देव भूमि कहलाता है
भारत माता का अतीत
सब जग में पूजा जाता है ।

आओ हम भी वंदन कर लें
गुण गौरव का गान करें
शीश नवा कर भारत माँ पर
गर्व करें अभिमान करें ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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Tuesday, 7 January 2020

माँ की जन्म घुटी (कविता) - श्रीमती सुशीला शर्मा

माँ की जन्म घुटी
(कविता)

माँ जो तूने घुटी पिलाई
अब वो काम नहीं करती
बदल गया है आज जमाना
वो युक्ति ना अब चलती

प्यार मुहब्बत नहीं चाहिए
नहीं भावना ही चलती
बच्चों की माँ-बाप से केवल
व्यापारी दिनभर रहती ।

रूपया पैसा उन्हें चाहिए
भौतिक जीवन जीने को
फर्ज गिनाते माता-पिता का
होश नहीं है कुछ उनको ।

हमने लाज रखी माँ तेरी
सारे फर्ज निभाए हैं
उम्र के इस अन्तिम पड़ाव में
माँ तू ही याद आए है ।
-०-
पता:
श्रीमती सुशीला शर्मा 
जयपुर (राजस्थान) 
-०-


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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ