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Saturday, 14 November 2020

जंगल में दीवाली (कविया) - नरेन्द्र श्रीवास्तव




जंगल में दीवाली
(कविता )
जंगल में पशुपक्षियों ने मिल
दीवाली का पर्व मनाया।
खेले-कूदे, झूमे-नाचे
हँसते-गाते हर्ष मनाया।।

चूहे, बिल्ली, लोमड़, बंदर
कचरा सारा ले गए ढोकर।
कौए, गलगल लीप-पोतकर
थककर लेटे बिछौने पर।।

चिड़ियों, तोतों ने पंखों से
मिलकर बढ़िया चौक बनाया।
जंगल मेंं पशुपक्षियों ने मिल
दीवाली का पर्व मनाया।।

घोड़े, भैंसे शहर से आए
मिठाई और फटाके लाए।
हाथी अपनी सूँड़ में लिए
लक्ष्मीजी की फोटो लाए।।

कछुए, खरगोशों ने मिल
फिर पूजा का थाल सजाया।
जंगल में पशु पक्षियों ने मिल
दीवाली का पर्व मनाया।।

जब जंगल के राजा आए
पूजन कर फिर दीप जलाए।
गधेलाल जी बाजा लाए
सबने मिलकर गाना गाए।।

पक्षियों ने फुलझड़ी चलायी,
पशुओं ने मिल बम चलाया।
जंगल में पशुपक्षियों ने मिल
दीवाली का पर्व मनाया।।
-०-
पता:
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-
 
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Tuesday, 17 November 2020

इंसान हो तो ईमान की बात कर (ग़ज़ल) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

इंसान हो तो ईमान की बात कर
(ग़ज़ल)
इंसान हो तो ईमान की बात कर।
बेवजह इंसान पर यूँ ना घात कर।।

छल,कपट,छीना,झपटी, ये लूटमार।
चैन से सोने देते क्या रातभर ?
 
प्रेम की दौलत से बढ़कर कुछ नहीं।
लो लगी शर्त मेरी इसी बात पर।।

भेद क्या जब खून सब में है एक-सा।
फिर पाल न यूँ मैल दिल को साफ कर।। 

दें वतन को जिन्दगी एकता के नाम पर।
मैं बढ़ाता हाथ तू भी अपना हाथ कर।।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Wednesday, 13 November 2019

याद (कविता) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

याद
(कविता)

मैं आया था
आपके पास
आपसे मिलने
आप पूजा कर रहे थे
मैं करने लगा था
आपका इंतज़ार
मेज पर रखा था अख़बार
पढ़ने लगा 
पढ़ा एक-एक पेज़
उस दिन जाना अख़बार को
खूब होती हैं ख़बरें
महानगर दिल्ली से लेकर
छोटे से गाँव की भी
छपती हैं खबरें
अपराधों से
दुर्घटनाओं से
अनियमितताओं से
भ्रष्टाचार से
तकरार से
भरा पड़ा था अख़बार
आँखों में भर आये थे आँसू
मैं भी करने लगा था याद
भगवान को
जब तक आप आये।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

***
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Thursday, 9 April 2020

देशहित में चूर होना चाहिए (ग़ज़ल) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

देशहित में चूर होना चाहिए
(ग़ज़ल)
आदमी को आदमी जरूर होना चाहिए।
आदमी में आदमी भरपूर होना चाहिए।।

चेहरा बेनूर है तो इससे कुछ हर्ज नहीं।
आदमी के दिल में मगर नूर होना चाहिए।।

लोग क्या कहेंगे ये बात सोचने की नहीं।
आदमी में ख़ुद में ही सऊर होना चाहिए।।

दिनोंदिन बढ़ता चला है शोर गली-गली में।
शोर को हर गली से अब दूर होना चाहिए।।

हरेक को नशा है कोई ना कोई तो एक।
आदमी को देशहित में चूर होना चाहिए।।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Friday, 6 December 2019

जाग जरा तू (कविता) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

जाग जरा तू
(कविता)

दिल में ऐसी आग जला तू।
सोया मत रह जाग जरा तू।।

सारे शिकवे,गिले भुलाकर।
आगे आ के हाथ बढ़ा तू।।

आँसू जो ख़ुद पीते रहते।
अपनेपन का स्वाद चखा तू।।

डगर अकेले सुगम नहीं है।
साथी बनकर साथ निभा तू।।
सुख,वैभव पायेंगे सब मिल।
प्रेम,शांति का पाठ पढ़ा तू।।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Monday, 13 January 2020

तुम्हारे मौन रहने का दर्द (कविता) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

तुम्हारे मौन रहने का दर्द
(कविता)
जब भी
मैंने
किसी गुलाब को
छुआ है
काँटों की चुभन
जबरदस्त
मेरी उंगलियों को
चुभो गई है
और गुलाब
केवल धीरे से
यह पूछकर
चुप हो गया है
दर्द तो नहीं हुआ?

जब भी
मैंने
नदी में
किसी किश्ती से
उस पार जाने की
कोशिश की है
तूफान का एक झोंका
जबरदस्त
उस किश्ती को
डुबो गया है
और नदी
केवल धीरे से
यही पूछकर
चुप हो गया है
दर्द तो नहीं हुआ?

जब भी
मैंने
किसी वट वृक्ष की
छाया में
तनिक सुस्ताने की
कोशिश की है
कौए की बीट से
जबरदस्त
मेरी कमीज में
दाग लग गया है
और वट वृक्ष
केवल धीरे से
यही पूछकर
चुप हो गया है
दर्द तो नहीं हुआ?

जब भी
मैंने
खुली धरती में आ
दमकते सूरज को
निहारने की
कोशिश की है
आकाश का एक टुकड़ा
जबरदस्त
मेरे सिर पर आ गिरा है
और सूरज
यही पूछकर
चुप हो गया है
दर्द तो नहीं हुआ?

दर्द तो हुआ
मगर इसलिए
कि
तुम मौन देखते रहे
मुझे
मैं जबाब देता हूं,उन्हें।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Tuesday, 29 October 2019

बच्चो!पटाखे फोड़ने और चलाते समय सावधानी रखें (आलेख) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

बच्चो!पटाखे फोड़ने और चलाते समय सावधानी रखें
(आलेख)
बच्चो!दीपावली का त्यौहार नजदीक है और आप सभी इस त्यौहार पर खूब पटाखे फोड़ने के लिये बैचेन होगे और अपने मम्मी-पापा से पटाखे दिलाने का वायदा ले रहे होंगे।
बच्चो! वैसे तो मैं पटाखे फोड़ने को केवल और केवल रुपयों की बरबादी ही मानता हूं ,पर मैं जानता हूं और मानता हूं बच्चे मेरी क्या अपने पालकों की भी इस राय से सहमत नहीं होंगे।
इसीलिये मैं पटाखे फोड़ने या चलाते समय रखने वाली सावधानियों को लेकर सचेत तो करना ही चाहूंगा।
1.बच्चो! पटाखे फोड़ते समय सबसे पहले आप अपने कपड़ों पर जरूर ध्यान देना। ज्यादा ढीले या ज्यादा चुस्त और सिन्थेटिक रेशे वाले कपड़े पहनकर पटाखे नहीं फोड़ना।
2.पटाखे कभी भी हाथ में रखकर ही जलाने का प्रयास नहीं करना।
3.पटाखे में आग लगाने के बाद यदि उसमें आग पकड़ने में देरी हो रही हो तो उसे फिर से जलाने के लिये बहुत सोच-विचारकर ही नजदीक जाना। कई बार ऐसा संयोग बनता है कि हम समझते हैं कि फटाके में आग नहीं पकड़ी है और हम देखने चले जाते हैं,जबकि वह धीरे-धीरे आग पकड़ रहा होता है और ऐसा संयोग बनता है कि हम नजदीक गये या उसे जरा भी छुआ और वह फट जाता है।जिससे हमारे साथ कुछ भी अनहोनी सकती है।
4.कुछ पटाखे ऐसे होते हैं जो जलने के बाद एक सीध में,सीधे भागते हैं।ऐसे पटाखों का मुंह इस प्रकार का रखें कि वह किसी के घर,भीड़ की ओर ना हो।बेहतर होगा कि उसका मुँह आसमान की तरफ हो,उस दिशा में भी इस बात का ध्यान रखें,कि उसकी दिशा में बिजली का तार ना पड़े।
5.पटाखे फोड़ते या चलाते समय छोटे बच्चों को दूर रखें।
6.पटाखे में आग लगाने के बाद दौड़ने के लिये खाली रास्ता बना कर जगह और दिशा को तय कर लें ।
7. घर में जहां सामान रखा है,घर के अन्य सदस्य या अन्य दर्शक खड़े हैं ऐसी जगह छोड़कर पटाखे फोड़ें या चलावें।
8.अच्छा और उचित रहेगा कि घर के किसी बड़े-बुजुर्ग की उपस्थिति में,उनके मार्गदर्शन में
आप पटाखे फोड़ें या चलावें।
9. देर रात को या देर रात तक पटाखें ना चलावें।
10.खतरनाक, ज्यादा तेज आवाज करने वाले, इधर-उधर भागने वाले पटाखें हरगिज ना फोड़ें।
11. किसी के साथ वैमनस्यता या मजाक में उसके नजदीक पटाखें ना फोड़ें।
12. पटाखें फोड़ते या चलाते समय बचाव के साधनों की व्यवस्था का भी ध्यान जैसे बड़े बरतन में रेत,पानी,कंबल आदि की व्यवस्था रखा जावे तो उचित रहेगा और समझदारी होगी।
13. सजग और सावधानी रखते हुये पटाखे फोड़ें।
14.अति उत्साह ,जल्दबाजी या पटाखे की शैली की जानकारी लिये बिना पटाखे न फोड़ें।
15.एक बार में एक ही सदस्य एक ही पटाखे फोड़े या चलावे।
16.पटाखे फोड़ने की फोटो या सेल्फी लेने का शौक,शेखी या जिद ना करें।
17. आप जहां पटाखे फोड़ या चला रहे हों,उसी के पास में घर का कोई अन्य सदस्य कोई दूसरा कार्य कर रहा हो जैसे कोई महिला सदस्य बहन,भानजी, भतीजी रंगोली बना रही हो,दीये सजा रही हो तो वह कार्य पूरा कर लेने दे,तभी पटाखे फोड़ें।
इसीलिये मेरा मानना है पटाखे फोड़ना या चलाना सरल और सहज भले ही लगे,जरा सी असावधानी या भूल के घातक परिणाम हो सकते हैं और त्यौहार का पूरा मजा बिगड़ सकता है।
आशा है,इन बातों के अलावा भी कोई और बातें या सावधानियां बताने से रह गयीं हों,उन सब को ध्यान में रखते हुये त्यौहार का आनंद लेंगे।
शुभ दीपावली।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
पलोटनगंज, गाडरवारा
जिला-नरसिंहपुर, म.प्र. 487551
-०-

***
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Friday, 13 March 2020

तेरे प्यार में... (कविता) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

तेरे प्यार में...
(कविता)
पास तुझे पाकर मेरा दिल,
प्यार में यूँ तरबतर हुआ।
मुझको मेरी खबर नहीं थी,
पा तुझको,मैं बेखबर हुआ।।

तेरे आने की खुशबू से
मौसम,मधुवन महक रहे
चाँद-सितारे चमक रहे हैं
पशु-पक्षी भी चहक रहे
चले पवन के झोंके सरसर
हर्षित पल हर पहर हुआ।

बजने लगी पाँव की पायल
हाथों की चूड़ी खनकी
झूम उठा आँखों का काजल
माथे की बिंदिया चमकी
छुअन तेरी से शीतल तन-मन
पोर-पोर पे असर हुआ।

अधर व्यथा न कह पाये कुछ
दिल भी चुप खामोश रहा
दीवाने दिल की बेताबी
मुझे न होश हवाश रहा
चाहत दिल की,पा नजदीकी
शुरू प्रेम का सफर हुआ।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

***
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Thursday, 29 October 2020

जैसा अन्न... वैसा मन (लघुकथा) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

जैसा अन्न... वैसा मन
(लघुकथा)
शर्मा जी भले ही शहर में आकर बस गए हैं परंतु पास के गाँव में उनकी खेती आज भी होती है। उन्हीं के गाँव का ननकू बहुत ही ईमानदार और मेहनती मजदूर है। वही उनकी खेती संभालता है। ननकू का एक लड़का है, दीनू।अभी उसकी उम्र होगी करीब 15-16 साल की। अक्सर वह शर्मा जी के पास आता रहता  है। उसके आने पर शर्मा जी कभी उसे सब्जी  लेने तो कभी नल, टेलीफोन, बिजली के बिल जमा कराने भेजते हैं । वह भी उसके पिता की तरह ईमानदार है। खर्च होने के बाद जितने रुपए बचते हैं, वह उन्हें लौटा देता है।शर्मा जी, ननकू की तरह दीनू की ईमानदारी पर भी गर्व करते हैं।
एक दिन शर्मा जी के एक मित्र उनसे कहने लगे, 'कोई ईमानदार लड़का हो तो बताओ, हमारे साहब को उनके घर में काम करने के लिए चाहिए।
उन्होंने दीनू के बारे में बतलाया और उनके यहां काम करने भेज दिया।
एक दिन दीनू , शर्माजी के पास आया तो उसने बतलाया, साहब अकेले रहते हैं। मैं ही उनके घर का पूरा काम करता हूं। खाना बनाता हूं, झाड़ू-पोंछा, बरतन धो-मांजना, बाजार से सामान लाना ऐसे सभी काम करता हूं। वहीं रहता हूं। वहीं खाना खाता हूं।उनकी मेम साहब दूसरे शहर में नौकरी करती हैं।
         फिर एक दिन जब दीनू आया तो उसने बतलाया - 'साहब की ऊपरी कमायी बहुत है। घर पर बहुत लोग आते हैं और रुपए दे जाते हैं।' शर्मा जी ने उसे गौर से देखा। उसके नये कपड़े, नये जूते देखकर पूछा- ' ये साहब ने ही... '
' हाँ, उन्होंने ही दिलाए हैं'  शर्मा जी की बात पूरी होने के पहले ही वह बोला।
शर्मा जी, उसे दो सौ रुपए देते हुए बोले, 'बाइक में पेट्रोल डलवा लाओ। ' वह बाइक लेकर गया तो बहुत देर बाद लौटा। आते ही कहने लगा- ' घर चला गया था। बहुत दिनों से नहीं गया था।'
       एक दिन जब वह आया तो शर्मा जी ने उसे बिजली का बिल जमा करने भेजा। वापिस आया तो उन्हें आश्चर्य हुआ, उसने बाकी के रुपए नहीं लौटाए। उससे बाकी के रुपए मांगे तो वह बोला-  ' मेरे दोस्त मिल गए थे, उन्हें चाय पिलाने में खर्च हो गए।'
शर्मा जी ने महसूस किया। वह बदलने लगा है और उसकी ईमानदारी कहीं खोती जा रही है।
        एक दिन उनका वही मित्र घबराते हुए आया और पूछा - ' दीनू ! यहां आपके पास  आया था क्या? मेरे साहब ढूँढ़ रहे हैं। दो दिन से वह उनके यहां नहीं जा रहा है।उन्होंने, उसे बैंक में रुपए जमा करने दिए थे वे भी उसने जमा नहीं किए। मैंने आपको ईमानदार लड़के का बोला था। वह तो बेईमान निकला।
 शर्मा जी स्तब्ध रह गए।
'जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन'... उन्हें बचपन में पढ़ी एक कहानी की सीख याद आ गई।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Monday, 18 January 2021

प्यार उनसे... (ग़ज़ल) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

 

प्यार उनसे...
(ग़ज़ल)
प्यार उनसे जो कर लिया हमने।
क्या बतायें क्या कर लिया हमने।।

उनके पहलू में हम जब आये।
सौ जनम जैसे जी लिया हमने।।

उनके जितने करीब आये हम।
दूर जमाने को कर लिया हमने।।

कौन है वो कि कभी जाना नहीं।
लुटा दिल अपना कर लिया हमने।।

आरजू कोई बाकी ना रही।
वो मिले तो सब पा लिया हमने।।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

***
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Monday, 23 December 2019

ये दुनियाँ (कविता) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

ये दुनियाँ
(कविता)
ये दुनियाँ हमने डटकर देखी।
रोकर देखी,हँसकर देखी।।

जाने कितने रंग लिये यह,
गिरगिट लगे, परखकर देखी।।

कभी जिन्दगी लगे अगन- सी,
बन के लोहा तपकर देखी।

कभी जिन्दगी कोमल इतनी,
छूते ही ये बिखरकर देखी।

कभी रेंगे न जूँ कानों में,
माइक से चिल्लाकर देखी।

दहशतगर्दी भी दुनियाँ में,
डरते,सहम-सहमकर देखी।

बात-बात पर अड़ें,बिगड़ते,
जुल्म बड़े,ये सहकर देखी।।

पत्थर दिल ये नहीं पसीजें,
मिन्नत ,तड़प-तड़प कर देखी।

बावजूद यहाँ निष्ठा, नेकी,
चलती दुनियाँ ,जिस पे देखी।
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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Thursday, 21 November 2019

चंदू चाचा (लघुकथा) - नरेन्द्र श्रीवास्तव

चंदू चाचा
(लघुकथा)
समिति के सदस्य उपाध्याय जी के बेटे हिमांशु का बैंक अधिकारी के पद पर चयन होने पर उन्होंने समिति के सभी सदस्यों के लिये शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर पर्यटन स्थल पर पिकनिक का आयोजन रखा था।
पिकनिक शानदार रही और सदस्य वापिस होने लगे।
मूंदड़ा जी कार लेकर आये थे। उनके साथ कार में समिति के चार सदस्य भी आये थे। उनमें चंदू चाचा भी थे।
मूंदड़ा जी की नजर सामने गई तो देखा,चंदू चाचा तो वहाँ खड़े किसी का इंतजार कर रहे हैं।
कार से उतरकर उन्होंने चाचा को आवाज देकर बुलाया।
कार में तिवारी जी बैठ थे।फौरन बोले-"चंदू मोटरसाइकिल से नेमाजी के साथ आ जायेंगे।मेरी बात हो गई है। उनके बदले मैं आपके साथ चल रहा हूं।"
मूंदड़ा जी बोले-"ऐसा क्यों?चंदू चाचा,हमारे साथ आये थे,वे ही जायेंगे।तिवारी जी,आप हमारे साथ नहीं आये थे।इसीलिये आप नहीं।हाँ,जगह होती तो आप को साथ ले भी चल सकते थे। परंतु इसमें जगह भी नहीं है।अतः आप किसी दूसरे साधन से आवें।इससे चंदू चाचा ही जायेंगे। आइये चाचा,आकर बैठिये।"
-०-
संपर्क 
नरेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश)  
-०-

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सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
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