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Saturday, 7 December 2019

खत जो लिखे मगर भेजा नहीं (कविता) - अलका 'सोनी'

खत जो लिखे मगर भेजा नहीं
(कविता)
मेरे जीवन में उसका आना
मानो नए वसंत का आना।

मन के शांत सागर का मचलना,
भावों की लहरों का उमड़ना।

तब कहाँ था इतना खुलापन,
तकनीकी सुविधाएं और साधन।

अपनी बातें कभी कह नहीं पायी,
खत लिखे मगर भेज नहीं पायी।

संकोच,लाज़ के पहरे ने रोक लिया,
संस्कारों ने मुझको बढ़ने से रोक दिया।

आज भी रखे हैं, खत वो छुपाकर ,
मन के सन्दूक में कहीं दबाकर।

कभी जो मिले किसी मोड़ पर,
दे दूंगी तुम्हें सारे, सन्दूक खोलकर।
-०-
अलका 'सोनी'
मधुपुर (झारखंड)




***
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Sunday, 19 January 2020

◆ लाल गुलाब◆ (लघुकथा) - अलका 'सोनी'

◆ लाल गुलाब◆
(लघुकथा)
किरण गुस्से में लाल हुए जा रही थी। उसके गमले में खिले लाल गुलाब गायब थे, वो बड़बड़ाये जा रही थी कि बस एक बार पता चल जाये कि किसने तोड़ा है फिर उसे अच्छे से सबक सिखाएगी । सुबह ही उसने देखा था कि किराएदार का छोटा लड़का वहीं गमले के पास खेल रहा था, जरूर उसी ने तोड़ा होगा। दनदनाते हुए वो अपने किराएदार के पास पंहुच गयी और गुस्साते हुए खूब खरी-खोटी सुनाई। धमकी भी दे दी कि फिर ऐसी हरकत की तो घर छोड़कर जाना होगा। इतने कम किराये में दूसरा घर उन्हें कहीं नहीं मिलेगा। 
अब जाकर उसे थोड़ी शान्ति मिल रही थी। फिर उसे ध्यान आया कि संध्या-वंदन का समय हो गया है। घर जाकर आरती करनी चाहिए । तभी उसकी दादी ने बताया कि उन्होंने आज आरती कर ली है और आज खिले लाल गुलाब भी पूजा में चढ़ा दिया है। 
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Wednesday, 2 September 2020

◆◆ सवेरा होगा ◆◆ (कविता) - अलका 'सोनी'

◆◆ सवेरा होगा ◆◆
(कविता)
गुनगुना रही थी कल तक
ज़िंदगी अपनी धुन पर
सज़ा हुआ था
हर तरफ खुशियों का
जैसे कोई मेला
खिलखिला रहा था बचपन
गलियों में बेफिकर सा

ये क्या आफत आयी
सहमा लग रहा है
हर मंज़र यहाँ अब
सूनी-वीरान दिख रही है
सपनों सी सुंदर दुनिया
थम गया है मानों
वक़्त भी यहाँ पर

एक बात याद रखना
समय थमता नहीं कभी भी
है आज रात काली
लेकिन सवेरा होगा
अमराइयों में चहकेगी
फिर कोई चिड़ियां

सूनी हुई सड़क पर
दौड़ेंगे ज़िंदगी के पहिये
जीतकर इस जंग को
चल पड़ेगी फिर से
अपनी सजीली दुनिया।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Sunday, 17 January 2021

** मैं मुस्कुराता हूँ ** (कविता) - अलका 'सोनी'

   

** मैं मुस्कुराता हूँ **
(कविता)
मैं कहां मूर्तियों में 
मुस्कुराता हूँ
न दूध की बहती हुई 
नदियों में नहाता हूं 

अपने ऊपर चढ़ाई 
मखमली चादरों में भी
मैं कहाँ लिपटाता हूं 
न ही कैंडिलों की लौ में
झिलमिलाता हूं 

एक पिता जब कांधे पर 
बच्चे को बिठाकर 
घुमाने ले जाता है
तब मैं वहां खड़ा  
खिलखिलाता हूं 

बनकर शिशु मैं
माँ के हाथों से 
अब भी नहाता हूं 
धूप से बचने को 
आज भी आंचल में 
उसके कहीं 

छिप जाता हूं और 
झुर्रियों वाले हाथों में 
आशीष बन 
बरस जाता हूँ
मैं कहां मूर्तियों में 
मुस्कुराता हूं…...
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Friday, 20 December 2019

कहीं धूप कहीं छाया (कविता) - अलका 'सोनी'

◆ कहीं धूप कहीं छाया◆
(कविता)
खुशियों को कैद कभी
कहाँ कोई कर पाया है ।
महलों के संग इसने
निर्धन का घर भी सजाया है।।

वरदान बन ये बस्ती में
निश्छल मुस्काती है।
जब बच्चों के मुख पर
मीठी सी हंसी आती है।

ढूंढ ही लेता है बचपन
रद्दी में भी अपने खिलौने।
वहीं भवनों में पल भर में
रद्दी बन जाते, नए खिलौने।

कब टूटेगी विषमता की
ये मजबूत होती दीवारें?
छोटी-छोटी बातों के लिए
कब तक ये मन को मारे ?

दोष है क्या इनमें इनका
जन्म निर्धनता में पाया?
इस जग की रीत यही है
कहीं धूप, कहीं छाया !!-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Monday, 2 December 2019

रिश्तों की मर्यादा (आलेख) - अलका 'सोनी'

रिश्तों की मर्यादा
(आलेख)
सामाजिक व्यवस्था जिन तानो-बानों से गुंथी है, उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण 'रिश्ते' हैं। हर रिश्ते का अपना नाम व उससे जुड़ी जिम्मेदारियां होती हैं। स्वस्थ रिश्ते की शुरूआत ही मान-सम्मान और मर्यादा से होती है। किसी व्यक्ति का सलीके से किया गया व्यवहार ही हमें उसकी ओर खींचता है। रिश्तों के मजबूत और हेल्दी बने रहने के लिए उनका मर्यादा में रहना अनिवार्य है। जब हम अपनी हद पार करने लगते हैं तो रिश्तों में दरार आने लगती है।
मनोविज्ञान कहता है कि रिश्तों में मर्यादा का मतलब किसी को बाध्य करना या बंदिशें लगाना नहीं है। वरन स्वयं को व अपने रिश्तों को सुरक्षित रखना है। अर्थात मर्यादित रहना हर रिश्ते की कामयाबी का मूलमंत्र है।
प्रकृति का दिया सबसे अनमोल उपहार है 'रिश्ता'। फिर चाहे वो पति-पत्नी का हो या माता-पिता का। हर रिश्ता सुनहरा और अनमोल होता है। रिश्तों की अहमियत दो लोगों की आपसी समझदारी और सामंजस्य पर टिका होता है अगर एक पक्ष भी कमजोर हुआ तो उसका टिकना मुश्किल हो जाता है। इसे निभाने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत की आवश्यकता नहीं होती। जरूरत होती है तो सिर्फ आदर, सम्मान और विश्वास की। एक -दूसरे से कुछ छिपाने से मनमुटाव बढ़ता है। आज रिश्तों की खोती मर्यादा के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? आधुनिक जीवन-शैली, सर्वसुलभ इंटरनेट सेवाएं ,सिनेमा या फिर स्वयं मनुष्य को ?? 
मेरा मानना है कि केवल किसी एक को दोषित ठहराना गलत है। इसके लिए बहुत से घटक जिम्मेदार हैं। मनुष्य एक विचारशील और चेतनायुक्त प्राणी है। उसे ज्ञात होने चाहिए कि वह क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?उसकी हरकतों का उसके परिवार पर क्या असर पड़ सकता है?? पूर्ण मर्यादित इंसान ही परिवार एवम समाज में सम्मानित जीवन व्यतीत करता है। अधिक बहस करना, आलोचनाएं या चापलूसी करना, किसी को प्रताड़ित करना भी मर्यादा भंग की श्रेणी में आता है। जो व्यक्ति को अव्यवहारिक सिद्ध करते हैं। आचरण की मर्यादा केवल चरित्र हीनता से ही भंग नहीं होती, अपितु झूठ बोलने, बुराई का साथ देने,उधार लेने, नशा करने, जुआ खेलने से भी भंग होती है। नशा करने के बाद व्यक्ति को किसी बात का होश नहीं रहता। वह पवित्र से पवित्र रिश्ते को भी भंग कर देता है। 
रिश्ता कितना भी प्रिय क्यों न हो, निजी कार्यों में बिना अनुमति दखल देना अनुचित माना जाता है। बुरे वक्त पर रिश्ते सहायक होते हैं, किंतु रिश्तों से नित्य सहायता की अपेक्षा करना गलत है। समाज में पारिवारिक रिश्तों के अतिरिक्त मित्रता का रिश्ता भी होता है, जो कभी कभी पारिवारिक रिश्तों से भी बढ़कर हो जाता है। यह एक वैचारिक सम्बन्ध है, किंतु कितना भी प्रिय मित्र हो मर्यादा लांघने के बाद वह भी अप्रिय लगने लगता है।
लोभ ,मोह, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा, प्रेम ,इत्यादि कोई भी विषय हो। जब तक मर्यादा में हो तबतक ही सही है अन्यथा हानिकारक हो जाते हैं। जैसे अग्नि, जल, वायु संसार को जीवन प्रदान करते हैं किंतु मर्यादा की रेखा लांघते ही प्रलयंकारी बन जाते हैं।जिसका परिणाम सिर्फ तबाही होता है।
-०-
अलका 'सोनी'
मधुपुर (झारखंड)




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Wednesday, 21 October 2020

■■ शहर ■■ (कविता) - अलका 'सोनी'

 

■■ शहर ■■
(कविता)
मैं शहर हूं 
जागा हुआ रहता  
रात भर हूं 
चैन की नींदें 
कहां भाग्य मेरे 
व्यस्तता ही रहती 
हमेशा साथ मेरे 

हता हूं मैं भी 
कभी हो सवेरा ऐसा 
जब ना कोई 
बेसबर हो 

शांति भरी हो रातें 
और सुनहरी सी 
सहर हो 
सड़कों पर ना हो 
ये भागती गाड़ियां 
अखबारों में भी 
अमन की खबर हो 
गांवों की वो सरलता 
कहां से मैं लाऊं  
वह मोहक हरियाली 
खुद में कैसे सजाऊं 

यहां तो समय की 
रहती आपाधापी 
सबको कहीं 
पहुंचने की होती जल्दी 
खेतों की हरीतिमा 
नदियों की कल-कल 
कहीं पीछे अपने
मैं छोड़ आया 
अपनों का नेह,
सजीले चौखटों से 
कब का हूँ मैं
मुंह मोड़ आया।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Saturday, 19 December 2020

■■ कल■■ (कविता) - अलका 'सोनी'

  

■■ कल■■
(कविता)
कल......
जैसे सीपी में 
बन्द मोती
कल.....
जैसे अँखियाँ
आधी खुली
आधी सोती
अबूझ, अनसुलझी सी
कोई पहेली
कल....
घूंघट में सकुचाई
कोई दुल्हन
व्यग्र दिन
देखने को जिसका
चंद्र वदन
कल….
जैसे मदमाता पवन
कल.....
रेशमी कपड़े में
लिपटा हुआ
कोई उपहार
कौन जाने
किसकी जीत और
किसकी हार !!!!!
कल.....
जैसे प्रिय का
इंतज़ार।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Thursday, 12 December 2019

◆ फ़टी जेब (कविता) - अलका 'सोनी'◆

◆ फ़टी जेब ◆
(कविता)
कल शाम को
घर आते वक़्त
गिर गए ख्वाब कई
मेरी फ़टी जेब से।
अधूरे सपनों की गिन्नियों
को कब से सम्हाले
चल रही थी।


पूरे कर लूंगी किसी दिन
फुरसत पाकर
जीने की इस आपाधापी से।
भूल चुकी थी कि जेब में भी
सुरक्षित नहीं रहते ख्वाब।
अगर तुरपाई समय पर
ना करो तो फिसल सकते हैं
अनमोल सपने भी।


अब उन अधूरे सपनों
को पूरा करने का
हौसला और जुनून
दिल में जगाना
होगा फिर से।
स्वयं के देखे सपने भी
याद रखने होंगे।
तभी हम पा सकेंगे
उत्कर्ष जीवन में।-०-
अलका 'सोनी'
मधुपुर (झारखंड)




***
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Monday, 16 March 2020

* बेटियाँ * (कविता) - अलका 'सोनी'

* बेटियाँ *
(कविता)
कोयल की कूक कभी
मयूरों की नर्तन होती
हैं बेटियां

रेशमी डोर सी लिपटी
मीठी सी उलझन होती
हैं बेटियां

खुद आगे बढ़ती जाती
कमजोर कहां होती
हैं बेटियां

घुंघरू की रुनझुन सी
बजकर घर को खनकाती
हैं बेटियां

माता-पिता के संसार को
महकाती, हरसिंगार- सी होती
हैं बेटियां

लाड़ भी करती ,ज़िद पर भी आती
मनाओ गर तो मान जाती
हैं बेटियां।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Saturday, 26 October 2019

चाँद.... (पद्य) - अलका 'सोनी'



चाँद....
(विधा- कविता)

इस चाँद को जाने क्यूँ
मजहबों में बंधना नहीं आता?
हो उनकी ईद या
अपना करवाचौथ हो
मुस्कुराकर गगन पर छा जाता।

कभी प्रेयसी का मुख
झिलमिलाकर स्मरण कराता
तो कभी बिछड़े प्रिय की
मुस्कान की याद दिलाता।
ये चाँद हर आंगन से
क्यूँ एक सा है नज़र आता?

खोये हो जब हम किसी की
याद में तो बनकर नटखट
हमें देखकर है मुस्कुराता
ना जाने इस पगले चाँद को
क्यूँ सीमाओं में बंधना नही आता?
-०-
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर (पश्चिम बंगाल)



-०-
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Wednesday, 29 January 2020

" वसंत आ रहा है " (कविता) - अलका 'सोनी'

◆ वसंत आ रहा है ◆
(कविता)
ठिठुरती सर्दियों का
अब अंत आ रहा है
छा रही लालिमा
पलाश की
अपना वसंत
आ रहा है

आम्र मंजरी से
सजा रथ लेकर
अनंग आ रहा है
स्मरण आज
फिर शकुंतला को
दुष्यंत आ रहा है
आओ करें स्वागत कि
वसंत आ रहा है
कोकिल की कुक से
गूंज उठी है अमराई
संदेश प्रेम का वह
अनंत ला रहा है

खिलखिला रही है
पीली सरसों
अमलतास बिछ गए हैं
कैसा उमंग लेकर
वसंत आ रहा है !!-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Saturday, 4 January 2020

◆ धुंध◆ (कहानी) - अलका 'सोनी'

◆ धुंध◆
(कहानी)
दूसरे बच्चों की तरह मिनी भी चाहती थी कि वह भी बाहर घूमे-फिरे म त्यौहारों में लगने वाले मेलों का जी -भर आनंद ले। लेकिन उसकी मां उसे कहीं भी नहीं जाने देती थी। कहीं बाहर जाना भी पड़े तो कार के शीशे चढ़ाकर जाते थे वो लोग। मिनी चाहती थी कि कार के शीशे खोलकर वह बाहर हो रही बरसात का आनंद अपनी हथेली पर पड़ती बूंदों की ठंडक से महसूस करे। जब मेले लगे तो अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती करे। परन्तु ऐसा उसे करने नहीं मिलता था और वो मन मसोस के रह जाती थी। एक दिन उसका बाल सुलभ मन विद्रोह कर बैठा और उसने ज़िद पकड़ ली कि वो मेले में जाएगी तो बस जाएगी। उसके माता-पिता उसे कितना समझाये लेकिन वो नहीं मानी। अन्ततः सभी मेला जाने की तैयारी करने लगे।
उधर उसकी मां अपने पर्स में " मास्क " और जरूरी दवा रखने लगी। वो किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत लग रही थी। सभी मेले में पहुंचे।
वहाँ चारो तरफ मौजूद भीड़, तेज़ परफ्यूम की गंध, पुराने तेल में पकते पकवान, लोगों के पैरों से उड़ती हुई धूल और जगह-जगह फेंके पॉलीथिन के बैग देख उनका मन खिन्न हुआ जा रहा था। मिनी को उसकी मां ने मास्क लगाने को कहा, लेकिन मेले देखने की ख़ुशी में वो अनदेखा करती रही अपनी मां को। थोड़ी देर में वो सब मेले के मुख्य भाग में पहुंचे। अंदर की तरफ, और ज़्यादा भीड़, और ज़्यादा गन्दगी थी। इस प्रदूषण का मिनी पर बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो गया और वह खाँसने लगी।धीरे - धीरे उसकी खांसी बढ़ने लगी, चेहरा लाल हो गया। जब तक वह मास्क पहनती, उसे उल्टी आना शुरू हो गई। आनन-फानन में उसके पिता उसे गाड़ी में लेकर हॉस्पिटल ले जाने लगे।
पूरा शहर मेले की खुमारी में था और वे उसे लेकर मेले की विपरीत दिशा में शहर के बड़े हॉस्पिटल की ओर जा रहे थे। जाते -जाते रात के 2 बज चुके थे। इमरजेंसी में मिनी को एडमिट कराना पड़ा। अंदर उसका इलाज हो रहा था और बाहर आकाश में धूल की एक परत सी जमती जा रही थी। जो अपनी मटमैली धुंध में शहर को लील रही थी।-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Tuesday, 3 March 2020

★ कर्ज़ ★ (कविता) - अलका 'सोनी'

★ कर्ज़ ★
(कविता)
मां की ममता का बेटा
कर्ज़ चुका क्या पाएगा

रखा था जैसे मां ने
क्या उसको वो रख पाएगा

मां ने तो अपनी रोटी बांटी
कितनी रातों की नींदें छोड़ी

बेटों ने दो रोटी की खातिर
उसको ठोकर खाने छोड़ी

जिसने जन्म दिया है तुमको
एहसान उसका न लौटा पाएगा

मां के लहू का कोई बेटा
कर्ज़ न कभी चुका पाएगा।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Thursday, 14 November 2019

दांगलिक (व्यंग्य- कथा) - अलका 'सोनी'

दांगलिक
(व्यंग्य- कथा)
सुनो ,सुजीत जी के लिए जो लड़की फाइनल कर रहे थे उसका क्या हुआ? धर्मपत्नी के इस प्रश्न पर प्रतीक बोला - अभी कुछ तय नहीं कर पा रहा हूँ। उसकी कुंडली सुजीत की कुंडली से मिल नही रही है। लड़की घोर मांगलिक है। अभी दो-तीन पंडितों से और राय ले लूँ फिर कुछ कह पाऊंगा।
"और दो-तीन पंडित !!!! कोई मांगलिक-वांगलिक नही होता। जब जन्म का समय ही सही- सही निर्धारित नही किया जा सकता कि कितने मिनट, कितने सेकंड में फलां ने जन्म लिया तो उसकी सही कुंडली कैसे बनाई जा सकती है? हमेशा की तरह इस बार भी प्रेरणा की बातों का जवाब प्रतीक के पास नही था। लेकिन वह भी किसी से कम क्यूँ रहे इसलिए धर्मपत्नी की तारीफ भी नही की उसने।
अपनी बात आगे बढ़ाती हुई प्रेरणा बोली कि सोचो हमारी कुंडली में कोई मांगलिक नही था। फिर भी हमारे झगड़े को देखकर लोग डर जाते हैं ,कभी -कभी तो ऐसा लगता है कि तलाक लेकर ही बात रुकेगी।
ये तो कुंडली में नही लिखा था हमारे। उसमे कहीं भी ये नही लिखा था कि हम 'मांगलिक' नही "दांगलिक" हैं। फिर भी हमारी लाइफ चल रही है। आज एक जगह मांगलिक सुनकर अच्छे रिश्ते को छोड़ देना ठीक नहीं होगा। दो और पंडित देखेंगे उनके हिसाब से मांगलिक ना हुआ तो क्या करोगे?
इसलिए कुंडली मिलाना छोड़ कर दोनों के मन मिल जाये इस पर ध्यान दो। जीवन मन मिलने से चलता है कुंडली मिलाने से नही।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर (पश्चिम बंगाल)



-०-
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Monday, 17 February 2020

★★ पलभर छोटा है ★★ (कविता) - अलका 'सोनी'

★★ पलभर छोटा है ★★
(कविता)
जिंदगी गुजर जाती यूँ ही
जीने को पलभर छोटा है

पानी का है स्वाद वही बस
कहने को गागर छोटा है

शब्दों में है जान बहुत, यह
कहने को शायर छोटा है

रहते सब मिलजुल कर इसमें
दिखता बस यह घर छोटा है

सोई हैं कितनी ही लहरें
सोचो मत सागर छोटा है

बढ़ने की हर कोशिश कर तू
कोई नहीं अवसर छोटा है

मच सकती है हलचल दिल में
क्यों देखें पत्थर छोटा है

झुक कर छोड़ो चलना जग में
कोई नहीं अब सर छोटा है

सुंदर मन हो जिसका,उसके
आगे हर जेवर छोटा है।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Sunday, 12 January 2020

■ युवा देश के जाग रहे हैं ■ (कविता) - अलका 'सोनी'

■ युवा देश के जाग रहे हैं ■
(कविता)
प्रगति का ध्वज
हाथों में लेकर
धरती से अम्बर की
दूरी माप रहे हैं
युवा देश के
जाग रहे हैं
जोश से इनके
डरकर
दुर्दिन देश के
भाग रहे हैं।
चुनौतियां हो
कितनी भी
कब घबरा कर
वो भाग रहे हैं।
तकनीक को
उंगलियों पर नचाते
नई सोच से देश
सजाते
जननी का न
दूध लजाते
भाग देश के इनसे
जाग रहे हैं।
नए सन्धानों
की खोज में तत्पर
कितनी रातों से
जाग रहे हैं।
उम्मीदें है
कितनी इनसे ये
सब कुछ अब
जान रहे हैं
दर्शन में विज्ञान
मिलाकर नए
प्रयोग को
जांच रहे हैं
युवा देश के
जाग रहे हैं।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

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सृजन रचानाएँ

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

गद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०

पद्य सृजन शिल्पी - नवंबर २०२०
हार्दिक बधाई !!!

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित

सृजन महोत्सव के संपादक सम्मानित
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ