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Sunday, 26 January 2020

संडे का खून (लघुकथा) - गोविंद भारद्वाज

संडे का खून
(लघुकथा)
नव साल का कलैण्डर देखते ही बडे़ बाबू का माथा ठनका। कुछ देर के लिए वे माथा पकड़ कर बैठ गये। उनका उतरा चेहरा देखकर छोटे बाबू ने पूछा,"क्या हुआ बडे़ बाबू.. ये अचानक परेशानी सी कैसे छा गयी चेहरे पर ...कलैण्डर देखते ही?" "परेशानी की तो बात ही है। एक संडे का खून हो गया अपना।" बडे़ बाबू ने कलैण्डर को एक तरफ पटकते हुए कहा।
"एक संडे का खून हो गया... मैं कुछ समझा नहीं बडे़ बाबू?" छोटे बाबू ने फिर पूछा। बडे़ बाबू ने टेढा़ सा मुँह बनाते हुए कहा,"अरे यार इस बार गणतंत्र दिवस संडे का पड़ रहा है। संडे की छुट्टी होना तो गयी भाड़ में,ऊपर से हम सब को ऐसी कडा़के की सर्दी में अपने दफ्तर आना पडे़गा, ध्वजारोहण के लिए।" बडी़ देर से उसकी बातें सुन रही पास में बैठी एक महिला सहायिका ने उसे सुनाते हुए कहा,"इस देश को गणतंत्र बनाने के लिए हमारे देश के देशभक्त शहीदों ने कभी कोई वार नहीं देखा,ना ही सर्दी - गर्मी और बरसात देखी। देखा तो उन्होनें सिर्फ देश को स्वतंत्र कराने का सपना। आप जैसों को आज संडे के दिन दफ्तर आने में तकलीफ हो रही है। अपने गणतंत्र पर गर्व करने की बजाय एक संडे की छुट्टी खराब होने की चिंता कर रहे हो। इसे संडे का खून बता रहे हो।" उसका सबक सुन के बडे़ बाबू का चेहरा शर्म से झुका हुआ था।
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पता:
गोविंद भारद्वाज
अजमेर राजस्थान


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