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Wednesday, 23 December 2020

तेरा मुस्कराना (ग़ज़ल) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

 

तेरा मुस्कराना
(ग़ज़ल)
गिराता है बिजली,तेरा मुस्कराना,
करे गत है दिल की,तेरा मुस्कराना।

क़यामत है आती,तेरा देखना यूँ,
ज़रूरत न छल की,तेरा मुस्कराना।

गुलाबों की खुशबूू,लगे रातरानी,
दिल की कसक की,तेरा मुस्कराना।

है यमुना की नहरें,है गंगा की कल-कल,
है निर्मलता जल की,तेरा मुस्कराना।

है सुलझी पहेली,किंचिंत जटिल ना,
ज़रूरत ना हल की,तेरा मुस्काराना।

है मंगल,मधुरता,मानस-चौपाई,
घड़ी है सुफल की,तेरा मुस्कराना

तूफान ला दे,ला दे जलजला जो,
ख़बर ना है कल की,तेरा मुस्कराना।

मीरा की भक्ति,कबिरा की वाणी,
यादें भजन की,तेरा मुस्कराना।

मुहब्बत की बातें करता है मानो,
दावत पहल की,तेरा मुस्कराना।

लूटे 'शरद' को बिना कट्टा,चाकू,
ज़रूरत क्या बल की,तेरा मुस्कराना।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Sunday, 9 August 2020

नानू (ग़ज़ल) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


नानू 
(ग़ज़ल)
सब पर नेह लुटाते नानू ,
सबसे प्यार जताते नानू ।

कोई छोटा,बड़ा नहीं है,
सबको ही अपनाते नानू  ।

भाव भरा बर्ताव मिले तो,
तत्क्षण ही हरियाते नानू ।

पीड़ा,ग़म,मायूसी पीकर,
हरदम ही मुस्काते नानू ।

मिले कोय लाचार,दुखी यदि,
करुणा ख़ूब दिखाते नानू ।

संस्कार,अनुशासन का जल,
जी-भर ख़ूब बहाते नानू ।

अपना कोई ठेस लगा दे,
तो पल में मुरझाते नानू ।

स्वाभिमान पर हों आघातें,
तो जमकर अड़ जाते नानू ।

सबको अपनापन देकर के,
बिगड़ी बात बनाते नानू ।

क्या है अच्छा,और बुरा क्या,
सबको ही जतलाते नानू ।

कांटों में भी फूल खिलाकर,
सबको राह बनाते नानू ।

सारे घर,कुटुम्ब,मोहल्ले,
के पल में बन जाते नानू ।

'शरद' पुरानी पीढ़ी के पर,
नये रोज़ बन जाते नानू ।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Sunday, 25 October 2020

विजयादशमी (दोहे) - प्रो.(डॉ.) शरद नारायण खरे

 

विजयादशमी
(दोहे)
विजयादशमी पर्व है,अहंकार की हार।
 नीति,सत्य अरु धर्म से,पलता है उजियार।।

मर्यादा का आचरण,करे विजय-उदघोष।
कितना भी सामर्थ्य पर,खोना ना तुम होश।।

लंकापति मद में भरा,करता था अभिमान।
तभी हुआ सम्पूर्ण कुल,का देखो अवसान।।

विजयादशमी पर्व नित,देता यह संदेश।
विनत भाव से जो रहे,उसका सारा देश।।

निज गरिमा को त्यागकर,रावण बना असंत।
इसीलिए असमय हुआ,उस पापी का अंत।।

पुतला रावण का नहीं,जलता पाप-अधर्म।
समझ-बूझ लें आप सब,यही पर्व का मर्म।।

विजय राम की कह रही,सम्मानित हर नार।
नारी के सम्मान से,ही जग में उजियार।।

उजियारा सबने किया,हुई राम की जीत।
आओ हम गरिमा रखें,बनें सत्य के मीत।।

कहे दशहरा मारना,अंतर का अँधियार।
भीतर जो रावण रहे,उसको देना मार।।

अहंकार ना पोसना,वरना तय अवसान ।
निरभिमान की भावना,लाती है उत्थान।।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Sunday, 26 July 2020

उजियारे को तरस रहा हूँ (गीत) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे



उजियारे को तरस रहा हूँ
(गीत)
उजियारे को तरस रहा हूं,अँधियारे हरसाते हैं !
अधरों से मुस्कानें गायब,आंसू भर-भर आते हैं !!

अपने सब अब दूर हो रहे,
हर इक पथ पर भटक रहा
कोई भी अब नहीं है यहां,
स्वारथ में जन अटक रहा

सच है बहरा,छल-फरेब है,झूठे बढ़ते जाते हैं !
अधरों से मुस्कानें गायब,आंसू भर-भर आते हैं !!

नकली खुशियां,नकली मातम,
हर कोई सौदागर है
गुणा-भाग के समीकरण हैं,
झीनाझपटी घर-घर है

जीवन तो अभिशाप बन गया,
मायूसी से नाते हैं !
अधरों से मुस्कानें गायब,आंसू भर-भर आते हैं !!

रंगत उड़ी-उड़ी मौसम की,
अवसादों ने घेरा है
हम की जगह आज 'मैं ' 'मैं ' है,
ये तेरा वो मेरा है

फूलों ने सब खुशबू खोई,पतझड़ घिर-घिर आते हैं !
अधरों से मुस्कानें गायब,आंसू भर-भर आते हैं !!
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Friday, 2 October 2020

गांधी दर्शन (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

गांधी दर्शन
(कविता)
(1)
मुझे गांधी ने सिखलाया,जिऊँ मैं कैसे यह जीवन
बनाऊँ कैसे मैं इस देह और मन को प्रखर,पावन
मुझे नैतिकता-पथ दिखलाके,रोशन आत्मा कर दी,
पूज्य बापू के कारण ही,महकता है मिरा मधुवन।
(2)
जिये सत् भाव लेकर गांधी,सौंपा हमको यह ही स्वर
अहिंसा-ताव लेकर बन गये,मानव से वे इक सुर
युगों तक वंदना गांधी की होगी,इस सकल जग में,
जो करुणा -सीख दी हमको,सभी करते उसी का वर ।
(3)
राष्ट्र के बन गए बापूू,बात यह उच्चता रखती
सिखाया मान मानव का,सीख सर्वोच्चता रखती
वैष्णव जन का गाकर गीत,शोषित को लगाया दिल,
जो गांधीवाद ना समझे,बात यह तुच्छता रखती।
(4)
मद्य को त्याग दो हर एक,यह गांधी ने सिखलाया
रखो ख़ुद पर सदा संयम,यही पथ हमको दिखलाया
व्यसन तज दो सभी,तो तेजमय,बन जाओगे मानव,
पूज्य बापू ने अंतर तेज का,नग़मा मधुर गाया।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Saturday, 15 August 2020

राष्ट्र-वंदना (गीत) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

 राष्ट्र-वंदना
(गीत)
भारत मां के अभिनंदन में, आओ हम जयगान करें ।
नित्य चुनौती का उत्तर दे, रक्षित मां की आन करें ।।

हमने रच डाली नव गाथा,
 लेकर खडग हाथ अपने
 नहीं हटाये बढ़े हुये पग,
 पूर्ण किये सारे सपने

माटी को निज माथ लगाकर, आओ मंगलगान करें ।
नित्य चुनौती का प्रत्युत्तर दे, रक्षित मां की आन करें ।।

शत्रु नहीं बच पाया हमसे,
 पूत हमारे वीर सभी
सेनानी हम हैं मतवाले,
 हाथ गहें शमशीर सभी

वक़्त करे यदि मांग तो हँस-हँस,  हम निज का बलिदान करें ।
नित्य चुनौती का उत्तर दे, रक्षित मां की आन करें ।।

सीमाओं पर डंटे हुये हम,
  तीन रंग का मान रखें
जन गण मन की लाज निभाते,
 क़ायम निज की शान रखें

त्याग करें,और रखें एकता, मिल-जुलकर सहगान करें ।
नित्य चुनौती का उत्तर दे, रक्षित मां की आन करें ।।

बिस्मिल,भगतसिंह हम ही हैं,
  हम ही तो आज़ाद हैं
हम ही तो हैं नेहरू-गांधी,
  हम हरदम आबाद हैं

संविधान में रखें आस्था, मिल-जुलकर उत्थान करें ।
नित्य चुनौती का उत्तर दे, रक्षित मां की आन करें ।।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Thursday, 5 November 2020

करवा चौथ (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

करवा चौथ
(कविता)
प्रेमिल गहरा राज़ ले,आती करवा चौथ।
मिलन कराती देह का,भाती करवा चौथ।

चंदा बनता साक्षी,गाता नेहिल गीत,
हियकर मधुरिम चाँदनी,लाती करवा चौथ।

प्रेम बढ़े तब और भी,जब आता यह पर्व,
अंतर्मन की प्रीति को,गाती करवा चौथ।

यादों के सँग,नेहरस,की देती सौगात,
प्यार,समर्पण भेंट दे,जाती करवा चौथ।

छलनी के पीछे दिखे,मनहारी इक रूप,
अपनेपन के भाव की,पाती करवा चौथ।

सदियों से युग गा रहा,परिणय के सुधि गीत,
संस्कार,अनुराग की,थाती करवा चौथ।

इतिहासों में दर्ज़ है,मिलन और मधुमास,
गिले और शिकवे सभी,खाती करवा चौथ।

उर के भीतर जा पहुँच,बनती भावावेश,
हर दिल में देखो सदा,छाती करवा चौथ।

इक-दूजे को हैं बने,गहे हाथ को हाथ,
एक दिया तो दूसरा,बाती करवा चौथ।

कृष्ण-राधिके सा मिलन,राम-सिया सा मेल,
प्यार गहे नवरूप सो,आती करवा चौथ।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
-०-


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Sunday, 26 January 2020

२६ जनवरी गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभाकामनाएं

७१ वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बढ़ियाँ एवं शुभकामनाएँ 
सादर प्रणाम
प्रस्तुत हैं 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर सृजन महोत्सव पटल प्रकाशित रचनाएं। सभी रचनाकार और पाठक गणों का हार्दिक अभिनंदन और आभार। अपनी रचनाओं को अधिकाधिक साहित्यिक मित्रों व व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर करें ताकि आपकी रचना अधिक पाठकों तक पहुंचे।धन्यवाद
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
रचनाएं पढ़ने के लिए रचना शीर्षक पर क्लिक करें!!!

★★ एकता की पहचान ★★ (कविता) - अलका 'सोनी'
मेरा भारत महान (कविता) - एस के कपूर 'श्रीहंस'
भाईचारा (कविता) - डॉ . भावना नानजीभाई सावलिया
ए भारत तुझे प्रणाम (कविता) - दिनेश चंद्र प्रसाद 'द...
आओ एकता का डोर बुने (कविता) - संगीता ठाकुर (नेपाल)
भारत देश महान (कविता) - सुमन अग्रवाल "सागरिका"
! ग्रेसी ! (लघुकथा) - डॉ विनीता राहुरीकर
'भारत माँ की जय' (कविता) राजू चांदगुडे
संडे का खून (लघुकथा) - गोविंद भारद्वाज
“हम भारत के लोग” (कृति चर्चा) - संदीप सृजन
ज़रा याद करें (कविता) - राजीव डोगरा
ऐ मेरे मेहबूब वतन (गीत) - अख्तर अली शाह 'अनन्त'
गणतांत्रिक देश हमारा..... (कविता) - रामगोपाल राही...
!! मैं देश बदलने निकला हूँ !! (कविता) - अमन न्याती...
नया अभियान करें (राष्ट्रभक्ति बालगीत) - राजेंद्र श...
आये वतन पे खतरा (कविता) - रूपेश कुमार
हिंदुस्तान हमारा है (कविता) - अलका पाण्डेय
भारत माँ की जय (कविता) - विजयानंद विजय
हे...वीर (कविता) - गोविन्द सिंह चौहान
भारत की शान तिरंगा (कविता) -शुभा/रजनी शुक्ला
नन्ही कोशिश (कघुकथा) - डा. नीना छिब्बर
प्यारा वतन (कविता) - रश्मि लता मिश्रा
लिखूँ न लिखूँ (कविता) - सुशीला जोशी
आँख मेरी भर आती है (कविता) - अंजलि गोयल 'अंजू'
तिरंगा (कविता) - डॉ.नीलम खरे
राष्ट्रभक्ति (लघुकथा) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
तिरंगे का मान बढाये (कविता) - सुनील कुमार माथुर
मेरा भारत महान (कविता) - एस के कपूर 'श्रीहंस'
गणतंत्र उबल रहा है (कविता) - श्रीमती सरिता सुराणा
सुभाषचन्द्र बोस (कविता) - अख्तर अली शाह 'अनन्त'
दास्तान भारत की (ग़ज़ल) - महावीर उत्तराँचली
सिर्फ लाल... (कविता) - रूपेश कुमार
आ गया गणतंत्र दिवस (कविता) - डॉ. प्रमोद सोनवानी
मिट्टी में मिल जानी है (कविता) - सरिता सरस
बलिदानी (कविता) - गोविन्द सिंह चौहान
वतन हमारा (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

-०-

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Monday, 2 December 2019

स्वछता के दोहे (दोहा) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


स्वछता के दोहे
(दोहा)

बिखरी हो जब गंदगी,तब विकास अवरुध्द !
घट जाती संपन्नता,बरकत होती क्रुध्द !!

वे मानुष तो मूर्ख हैं,करें शौच मैदान !
जो अंचल गंदा करें,पकड़ो उनके कान !!

धन्य वही जो स्वच्छता, को देता आयाम !
सुलभ केंद्र अब बन गया,जैसे तीरथ धाम !!

फलीभूत हो स्वच्छता,कर देती सम्पन्न !
जहॉं फैलती गंदगी,नर हो वहां विपन्न !!

बनो स्वच्छता दूत तुम,करो जागरण ख़ूब !
नवल चेतना की "शरद", उगे निरंतर दूब !!

अंधकार पलता वहॉं,जहॉं स्वच्छता लोप !
जागे सारा देश अब,हो विलुप्त सब कोप !!

मन स्वच्छ होगा तभी,जब स्वच्छ परिवेश !
नव स्वच्छता रच रही,नव समाज,नव देश !!

है स्वच्छता सोच इक,शौचालय अभियान !
शौचालय हर घर बने,तब बहुओं का मान !!

शौचालय में सोच हो,कूड़ा कूड़ादान !
तन-मन रखकर स्वच्छ हम,रच दें नवल जहान !

जीवन में आनंद तब,कहीं नहीं हो मैल !
रहें स्वच्छ,दमकें सदा,गलियां,सड़कें,गैल !!

सभी जगह हो स्वच्छता,तो सब कुछ आसान !
यही आज कहता "शरद",है स्वच्छता मान !!-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Saturday, 4 January 2020

पोती के जन्म पर "उद्गार" (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


पोती के जन्म पर "उद्गार"
(पद्य)

प्यारी इक पोती मिली,बनकर के उपहार ।
मौसम मुस्काने लगा,खिलने लगी बहार ।।

जीवन के ये पल मधुर,लाये खुशियां संग ।
आई देवी घर "शरद",ले चोखे-नव रंग ।।

"सिया" नाम सुकुमार का,है सचमुच वरदान ।
परम पिता की है दया,बढ़ा हमारा मान ।।

भाग्य हमारा है प्रबल,गूंजा मंगलगान ।
नाज़ुक बिटिया अंक में,मिला हमें उत्थान ।।

बिटिया की किलकारियां,बिखर रहा आशीष ।
सांईजी ने कर दिया,उन्नत सबका शीश।।

"स्वप्निल" को गरिमा मिली,पाया जो मातृत्व ।
अब "प्रतीक" हरसा रहा, फलीभूत पितृत्व ।।

बेटी घर में स्वर्ग का, कर देती निर्माण ।
बेटी से ही वंश को ,मिलते सचमुच प्राण ।।

बेटी तो है लक्ष्मी,बेटी दुर्गा-रूप ।
सरस्वती का तेज ले,देती मोहक धूप ।।

"सिया" रूप देवत्वमय, "वैदेही" अवतार ।
नया उगेगा भास्कर,होगा नव संसार ।।

सत्व,साधना,दिव्यता,होते बेटी संग ।
युग -युग घर में रोशनी,इंद्रधनुषिया रंग ।।

"शरद" और "नीलम" बने,दादू- दादी आज ।
लगता है हम पा गये,तीन लोक का राज ।।

यह देवी तो नूर है,मंगलमयी विधान ।
महकाने घर आ गई,ले खुशहाली गान ।।

फलीभूत सारी दुआ,तब पाई सौगात ।
सचमुच पोती रूप में ,है धन की बरसात ।।

चाहत अब पूरी हुई,थिरक रहे अरमान ।
"सिया" हमारी जान अब,और हर्ष सामान ।।

यही कामना हो बड़ी,ले प्रभुता निज साथ ।
मैहर वाली थामना,रखना सिर पर हाथ ।।

ख़ानदान आनंद में,हैं ऊंचे आयाम ।
'सिया' संग अब वंश को,मिलना तय,नव नाम ।।
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

***
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Sunday, 8 March 2020

नारी का देवत्व (दोहे) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


नारी का देवत्व
(दोहे)
नारी सच में धैर्य है,लिये त्याग का सार !
प्रेम-नेह का दीप ले, हर लेती अँधियार !!

पीड़ा,ग़म में भी रखे,अधरों पर मुस्कान !
इसीलिये तो नार है,आन,बान औ' शान !!

नारी तो है श्रेष्ठ नित ,हैं ऊँचे आयाम !
इसीलिये उसको "शरद", बारम्बार प्रणाम !!

नारी ने नर को जना,इसीलिये वह ख़ास !
नारी पर भगवान भी,करता है विश्वास !!

नारी से ही धर्म हैं,नारी से अध्यात्म !
नारी से ही देव हैं,नारी से परमात्म !!

नारी से उपवन सजे,नारी है सिंगार !
नारी गुण की खान है,नारी है उपकार !!

नारी शोभा विश्व की,नारी है आलोक !
नारी से ही हर्ष है,बिन नारी है शोक !!


नारी फर्ज़ों से सजी,नारी सचमुच वीर !
साहस,कर्मठता लिये,नारी हरदम धीर !!

जननी की हो धूप या,भगिनी की हो छांव !
नारी ने हर रूप में,महकाया है गांव !!

नारी की हो वंदना,निशिदिन स्तुति गान !
नारीके सम्मान से,ही है नित उत्थान !!
-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Friday, 17 January 2020

गीतिका (पद्य) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


गीतिका
(पद्य)
आशाओं के दीप जलाने का यह अवसर है,
अब तो प्रिय मुस्कान खिलाने का यह अवसर है ।

वक्त़ रहा प्रतिकूल सदा ही, पर हो ना मायूस,
अब उजड़ा संसार बसाने का यह अवसर है ।

व्देष, बैर,कटुता ने बांटा भाई-भाई को,
वैमनस्य-दीवार ढहाने का यह अवसर है ।

लेकर हाथ चलें हाथों में,मिलें क़दम क़दम से,
चैन-अमन का गीत बजाने का यह अवसर है ।

पीर,दर्द,ग़म और व्यथाओं का है यह आलम,
मानव-मन को आज सजाने का यह अवसर है ।

महके मानवता का घरअब,अपनापन बिखरे,
नेह,प्रेम के भाव निभाने का यह अवसर है ।

बहुत हो चुका तंद्रा तोड़ो,उठो 'शरद'अब सारे,
अब तो हमको कुछ कर दिखलाने का यह अवसर है ।-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Tuesday, 7 April 2020

हे भगवान राम (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


हे भगवान राम
(कविता)
रावण-संहारक,हे उध्दारक,तुम रोशन संसार करो
धर्म,नीति कम होते जाते,तुम इनका परसार करो
यह जीवन लगता है मानो, बोझ रखा सबके सिर पर,
तुम बनकर स्वामी औ' पालक,नाम नया उपहार करो ।

राम नाम लेकर के सारे,जीवन का सत्कार करो
गरिमा,मर्यादा के हक़ में,सत् की तुम जयकार करो
आज निराशा फैली भगवन्,तुम सम्बल देने आओ,
जिससे पापाचार रहे ना,तुम ऐसा उपचार करो ।

दशरथनंदन तुम परतापी,भवसागर से पार करो
हम अज्ञानी,हैं अबोध,तुम हरदम हमसे प्यार करो
पीड़ाओं ने हमको घेरा,व्यथा-वेदना मुस्काए,
आज रुदन में 'शरद' भक्त ,तुम कोरोना-संहार करो ।-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Thursday, 23 April 2020

जीवन घर तक (ग़ज़ल) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


जीवन घर तक
(ग़ज़ल)
जीवन घर तक, पर सुखकर है ।
कितना प्यारा लगता दर है ।

अब विराम में भी गति लगती,
हर्ष भरा यह आज सफ़र है ।

जीवन लगता एक ग़ज़ल-सा,
खुशियों से लबरेज बहर है ।

शांत रहो,खामोश रहो सब,
अंधकार के बाद सहर है ।

ऊंचा उड़ना नहीं रुकेगा,
कायम मेरा हर इक पर है ।

वीराना भाता है अब तो,
मीठा लगता हर इक सुर है।

रहे बात यह अंतरमन में,
कभी न ठहरा सदा क़हर है ।

'शरद' अभी भी रौनक सारी,
कल मेरा अब से बेहतर है ।-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Wednesday, 1 January 2020

नववर्ष के दोहे (दोहे) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे



नववर्ष के दोहे
(दोहे)
सूरज आया इक नया,गाने मंगल गीत !
प्रियवर अब दिल में सजे,केवल नूतन जीत !!

उसकी ही बस हार है,जो माना है हार !
साहस वाले का सदा,विजय करे श्रंगार !!

बीते के सँग छोड़ दो,मायूसी-अवसाद !
नवल बनेगा अब धवल,देगा मधुरिम याद !!

खट्टी-मीठी लोरियां,देकर गया अतीत !
वह भी था अपना कभी ,था प्यारा सा मीत !!

जाते -जाते वर्ष यह,करता जाता नेह !
अंतर इसका जनवरी,भले दिसंबर देह !!

फिर से नव संकल्प हो, फिर से उत्थान !
फिर से अब जयघोष हो,हो फिर से नव गान !!

नया सूर्य ले आ गया,नया शौर्य,नव ताप !
लिये आप आवेग यदि,नहीं बनोगे भाप !!

नहीं शिथिलता हो कभी,नहीं चरण हों मंद !
गिरकर फिर आगे बढ़ो,काम नहीं हो बंद !!

एक जनवरी आ रही,सभी लिये उत्साह !
बात तभी बन पायगी,बनो वक़्त के शाह !!

दोस्त,मित्र,बंधू,सखा,रक्खो सँग नववर्ष !
मिले तुम्हें खुशियां 'शरद', मिले सुखद नव हर्ष !!-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

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Monday, 2 March 2020

नासूरी नगमा (गीत) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे


नासूरी नगमा
(गीत)
रोदन करती आज दिशाएं,मौसम पर पहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो,घाव बहुत गहरे हैं !!

बढ़ता जाता दर्द नित्य ही,
संतापों का मेला
कहने को है भीड़,हक़ीक़त,
में हर एक अकेला

पावस तो अब शेष रही ना,बादल भी ठहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे वो,घाव बहुत गहरे हैं !!

मायूसी है,बढ़ी हताशा,
शुष्क हुआ हर मुखड़ा
जिसका भी खींचा नक़ाब,
वह क्रोधित होकर उखड़ा

ग़म,पीड़ा औ' व्यथा-वेदना के ध्वज नित फहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं !!

व्यवस्थाओं ने हमको लूटा,
कौन सुने फरियाद
रोज़ाना हो रही खोखली,
ईमां की बुनियाद

कौन सुनेगा,किसे सुनाएं,यहां सभी बहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे है वो घाव बहुत गहरे हैं !!

बदल रहीं नित परिभाषाएं,
सबका नव चिंतन है
हर इक की है पृथक मान्यता,
पोषित हुआ पतन है

सूनापन है मातम दिखता,उड़े-उड़े चेहरे हैं !
अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं !!-०-
प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
मंडला (मप्र)
-०-

***
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