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Sunday, 17 January 2021

** मैं मुस्कुराता हूँ ** (कविता) - अलका 'सोनी'

   

** मैं मुस्कुराता हूँ **
(कविता)
मैं कहां मूर्तियों में 
मुस्कुराता हूँ
न दूध की बहती हुई 
नदियों में नहाता हूं 

अपने ऊपर चढ़ाई 
मखमली चादरों में भी
मैं कहाँ लिपटाता हूं 
न ही कैंडिलों की लौ में
झिलमिलाता हूं 

एक पिता जब कांधे पर 
बच्चे को बिठाकर 
घुमाने ले जाता है
तब मैं वहां खड़ा  
खिलखिलाता हूं 

बनकर शिशु मैं
माँ के हाथों से 
अब भी नहाता हूं 
धूप से बचने को 
आज भी आंचल में 
उसके कहीं 

छिप जाता हूं और 
झुर्रियों वाले हाथों में 
आशीष बन 
बरस जाता हूँ
मैं कहां मूर्तियों में 
मुस्कुराता हूं…...
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Saturday, 19 December 2020

■■ कल■■ (कविता) - अलका 'सोनी'

  

■■ कल■■
(कविता)
कल......
जैसे सीपी में 
बन्द मोती
कल.....
जैसे अँखियाँ
आधी खुली
आधी सोती
अबूझ, अनसुलझी सी
कोई पहेली
कल....
घूंघट में सकुचाई
कोई दुल्हन
व्यग्र दिन
देखने को जिसका
चंद्र वदन
कल….
जैसे मदमाता पवन
कल.....
रेशमी कपड़े में
लिपटा हुआ
कोई उपहार
कौन जाने
किसकी जीत और
किसकी हार !!!!!
कल.....
जैसे प्रिय का
इंतज़ार।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Wednesday, 21 October 2020

■■ शहर ■■ (कविता) - अलका 'सोनी'

 

■■ शहर ■■
(कविता)
मैं शहर हूं 
जागा हुआ रहता  
रात भर हूं 
चैन की नींदें 
कहां भाग्य मेरे 
व्यस्तता ही रहती 
हमेशा साथ मेरे 

हता हूं मैं भी 
कभी हो सवेरा ऐसा 
जब ना कोई 
बेसबर हो 

शांति भरी हो रातें 
और सुनहरी सी 
सहर हो 
सड़कों पर ना हो 
ये भागती गाड़ियां 
अखबारों में भी 
अमन की खबर हो 
गांवों की वो सरलता 
कहां से मैं लाऊं  
वह मोहक हरियाली 
खुद में कैसे सजाऊं 

यहां तो समय की 
रहती आपाधापी 
सबको कहीं 
पहुंचने की होती जल्दी 
खेतों की हरीतिमा 
नदियों की कल-कल 
कहीं पीछे अपने
मैं छोड़ आया 
अपनों का नेह,
सजीले चौखटों से 
कब का हूँ मैं
मुंह मोड़ आया।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Wednesday, 16 September 2020

■■ होली की प्रासंगिकता ■■ (आलेख) - अलका 'सोनी'

■■ होली की प्रासंगिकता ■■
(आलेख)
रंगों और हास- परिहास से परिपूर्ण पर्व होली वसंत ऋतु में आती है जब चारों तरफ सौंदर्य अपने चरम पर होता है। समूची धरती रंग बिरंगे फूलों से लदी होती है। पेड़ अपने पुराने पत्ते उतार फेंकते हैं और नई कोंपलों से निखर जाते हैं। होली अवसर देती है कि हम भी सारी पुरानी सोच और रूढ़ियों का परित्याग नई सोच से अपने जीवन को सजाएं। नकारात्मक भावों को त्याग कर सकारात्मकता को अपनाएं। 

साथ ही होली बुराई पर अच्छाई, असुरत्व पर देवत्व, भोग पर योग की विजय का प्रतीक उत्सव है। यह हमारे अंतर की दानवता, कलुषता का दहन कर आचरण को निर्मलता से रंगने का पर्व है।
रंगो का हमारे मनोभावों और मनोभावों का हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब हम अपनी पसंद का रंग दूसरों पर लगाते हैं तब हमें एक तरह के आनंद की प्रतीति होती है ।फलस्वरूप शरीर पर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रंग और कीचड़ से सने चेहरे देख हमें सहज ही हंसी आ जाती है। दूसरों को रंगना और उपहास करना यह सब माहौल को हल्का बनाने में सहायक होते हैं। हास्य की उपचारक शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता है। हंसना एक प्रकार का व्यायाम होता है जिससे शरीर की जकड़न दूर हो जाती है। हंसने के दौरान ध्यान भटकता है। कुछ क्षण के लिए बाहरी संसार से के हम कट जाते हैं जिससे हमारा तनाव भी कम हो जाता है और वह हमें स्वस्थ रखने में सहायक होता है। 

भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में होली की प्रासंगिकता एक अन्य रूप में भी दिखाई पड़ती है। यहां स्त्रियों और पुरुषों की स्थिति में काफी अंतर पाया जाता है। स्त्रियों को कदम दर कदम दबाया जाता है। हर जगह समझौते करने पड़ते हैं। पुरुषों की तुलना में उन्हें कम अधिकार प्राप्त होता है। होली के इस अवसर पर उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों खासकर ब्रज में होली पर उन्हें अवसर प्रदान किया जाता है। वे पुरुषों की पिटाई लाठी से करती हैं और पुरूष अपनी रक्षा के लिए ढाल का प्रयोग करते हैं। इस तरह शोषित वर्ग को उसके विकारों और भावना से मुक्ति प्रदान करती है होली।
होली से पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।
पूरे वर्ष में आने वाले चार प्रमुख रात्रियों में से एक होलिका- दहन की रात्रि मानी जाती है। जिसके पीछे राक्षस राज हिरण्यकशिपु और प्रहलाद - होलिका की कहानी भी प्रसिद्ध है। जिसके अनुसार हिरण्यकशिपु ने अपने विष्णु भक्त पुत्र प्रहलाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका की सहायता ली थी ।
होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती है । जैसे ही प्रह्लाद को गोद में लेकर होलिका ने अग्नि- समाधि ली ,उसकी वरदान वाली दुशाला प्रहलाद पर आ गिरी और आसुरी शक्ति की प्रतीक होलिका ही जलकर मर गई। प्रहलाद सुरक्षित अग्नि से बाहर आ गए । इसके अलावा फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने की कहानी प्रचलित है। महर्षि दधीचि द्वारा इसी पुण्य दिवस पर अपनी अस्थियां दान करने की कथा भी प्रसिद्ध है
पहले होली आठ-दस दिन पहले घर से निकलना मुश्किल होता था। लोग फ़टे- पुराने वस्त्र पहन बाहर निकलते थे ताकि अचानक पड़ने वाले रंगों की बौछार से नए कपड़े खराब ना हो जाए। किंतु आज होली के दिन भी आराम से लोग 8:00 बजे सोकर उठते फिर चाय नाश्ता कर किसी क्लब या पार्क में जाकर रंग खेलने की रस्म अदायगी कर लेते हैं। बैकग्राउंड में 70- 80 के दशक के होली वाले फिल्मी गाने बजाते हैं ताकि होली का माहौल बन जाये। आज के इस मशीनी युग में होली जैसा सुंदर पर्व अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। रोज-रोज चलने वाली पार्टियों के दौर में अब इस पर्व की जरूरत शायद किसी को नहीं रही। नारी इतनी उन्मुक्त और खुले विचारों की हो चुकी है कि अब उससे अपने आप को स्वतंत्र दिखाने के लिए किसी पर्व विशेष की आवश्यकता भी नहीं रही।
कोई भी पर्व 'उत्सव' का रूप तभी लेता है जब उसे सामूहिक रूप से मनाया जाए। होली की प्रासंगिकता तभी सिद्ध होगी जब हम सब राष्ट्र समाज तथा वैचारिक रूप से एकजुट हो। नकारात्मकता का दहन आंतरिक रूप से किया जाए। भारत मां को आपसी स्नेह, सौहार्द के रंग से रंग कर ही होली सही मायने में होली बन सकती है।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Wednesday, 2 September 2020

◆◆ सवेरा होगा ◆◆ (कविता) - अलका 'सोनी'

◆◆ सवेरा होगा ◆◆
(कविता)
गुनगुना रही थी कल तक
ज़िंदगी अपनी धुन पर
सज़ा हुआ था
हर तरफ खुशियों का
जैसे कोई मेला
खिलखिला रहा था बचपन
गलियों में बेफिकर सा

ये क्या आफत आयी
सहमा लग रहा है
हर मंज़र यहाँ अब
सूनी-वीरान दिख रही है
सपनों सी सुंदर दुनिया
थम गया है मानों
वक़्त भी यहाँ पर

एक बात याद रखना
समय थमता नहीं कभी भी
है आज रात काली
लेकिन सवेरा होगा
अमराइयों में चहकेगी
फिर कोई चिड़ियां

सूनी हुई सड़क पर
दौड़ेंगे ज़िंदगी के पहिये
जीतकर इस जंग को
चल पड़ेगी फिर से
अपनी सजीली दुनिया।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Saturday, 15 August 2020

■■ देशभक्ति: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ■■ (आलेख) - अलका 'सोनी'

■■ देशभक्ति: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ■■

(आलेख)
' देशभक्ति या देश प्रेम ' की भावना का तात्पर्य है एक नागरिक का उसके राष्ट्र के प्रति समर्पण व प्रेम। यह किसी देश से उसके सांस्कृतिक ,ऐतिहासिक ,सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़ा होता है। देशभक्ति शब्द आते ही हमारी आंखों के सामने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारियों की छवि उभर आती है। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था । यह देश प्रेम की पराकाष्ठा थी। ऐसे असंख्य क्रांतिकारियों और देश प्रेमियों की सूची है ,जिनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है तो वहीं अनगिनत देशभक्तों की कुर्बानी अनाम ही रह गई।जिनका नाम इतिहास में दर्ज़ नहीं हो पाया। जब देश गुलाम था तब जनता में एक क्रांति की धारा बह रही थी ,एक तरह का जुनून था कि किसी तरह देश को पराधीनता से मुक्ति मिल जाए ।इसके लिए आबाल-वृद्ध ,स्त्रियां देश के लिए क्रांति और संघर्ष की राह पर चल पड़े थे।

काफी बलिदानों और संघर्षों के बाद आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिल ही गई। लेकिन लंबी गुलामी के बाद जो देश हमें मिला था अब उसके पुनरुत्थान के लिए नई चुनौतियों के दुष्कर मार्ग पर चलने की बारी आई। वर्षों की क्रांति ने देश को स्वतंत्र तो कर दिया, हमारा स्वयं का तिरंगा झंडा और संविधान तो अस्तित्व में आ चुका था लेकिन अब देश भक्ति का एक नया स्वरूप सामने लाने की बारी आई। जिसमें देश को प्रगति पथ पर अग्रसर करना था ।

दुनिया के बाकी देश तब तक विकास के मार्ग पर आगे बढ़ चुके थे और भारत में वह अपनी शैशवावस्था में था। साथ ही छुआछूत ,निरक्षरता ,सांप्रदायिकता पग-पग पर प्रगति के रथ को रोक रही थी जो कि पराधीनता स्वरूप देश में गहरे पैठ जमा चुकी थी।

हमारा देश इन धार्मिक, सामाजिक कुरीतियों से लड़ते -लड़ते अपनी विकास- यात्रा पर बढ़ रहा था। इसी बीच पड़ोसी देशों के आक्रमण का हमारे बहादुर सैनिकों ने जमकर लोहा लिया। पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। यह सब देशभक्ति का ही तो एक अलग रूप है। देश को विकास प्रदान करने के लिए सामरिक दृष्टिकोण से मजबूत बनने के साथ-साथ कृषि, अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष यात्रा भी करनी थी। इसी बीच पंचवर्षीय योजनाओं और श्वेत-हरित क्रांति की शुरुआत हुई। यह सब हमें देश के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। अंग्रेजों के जाने के बाद भारत को फिर से विश्व के सामने मजबूती से खड़ा करने के लक्ष्य ने सभी देशवासियों को देशभक्ति का एक नया अवसर प्रदान किया।

इस दिशा में देश के कृषक, पशुपालक, वैज्ञानिक, चिकित्सक, सैनिक और आम जनता सभी क्रांतिकारियों की भूमिका में खड़े हो गए ।
जिसके फलस्वरूप दुग्ध और कृषि क्षेत्र में आशा अनुरूप वृद्धि हुई । विज्ञान और सैन्य शक्ति के क्षेत्र में भी देश अपने पैरों पर खड़ा होने लगा।
यह सब देशभक्ति का आधुनिक रूप ही तो था। जो भारत को विकसित राष्ट्र बनने की दिशा की ओर ले जाने लगा। आज हमारी अर्थव्यवस्था विश्व समुदाय में अपनी पहचान बना चुकी है । फिर भी इसकी चुनौतियां खत्म नहीं हुई है।

कोई भी देश तभी शक्तिशाली बन सकता है ,जब वहां की जनता में देशप्रेम और निष्ठा हो। वास्तविक रूप में हमारी कर्तव्य -परायणता और सद्चरित्रता ही देश को तरक्की के मार्ग पर ले जा सकती है। एक चरित्रहीन व्यक्ति कभी तरक्की नहीं कर सकता और यही आज देश भक्ति की मांग भी है कि हम अपनी -अपनी जगह पर रहते हुए एक अच्छे नागरिक बने। ऐसा कोई कार्य न करें जिससे देश की हानि हो। आज देश भक्ति केवल प्राण नहीं मांगती वरन हम छोटे-छोटे कार्य कर देश के विकास में सहायक बन सकते हैं।
जैसे घरेलू स्तर पर बिजली की बचत कर के, प्लास्टिक का उपयोग कम करके, इंधन को बचाकर। पेड़ लगाकर या फिर अपनी जरूरतें कम करके ,ताकि हर नागरिक को जीवन जीने के लिए 'बेसिक' चीजें मिलती रहें तथा पर्यावरण भी सुरक्षित रहें।

अगर देश में किसी तरह की आपदा भी आए तो उससे सूझबूझ से निपटना देश -भक्ति का ही एक रूप होता है । जैसे वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व कोरोना से जूझ रहा है । भारत में भी इसका आंकड़ा चार लाख तक पंहुच चुका है। 4 महीने से हमारा देश अनेक तरह की परेशानियों से जूझ रहा है । प्रारंभ में ढाई महीने के लॉक डाउन के समय जनता को बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
लेकिन हम सब ने धैर्य के साथ देश का साथ देकर देश भक्ति का अनुपम उदाहरण पेश किया।

वास्तव में देशभक्ति एक पवित्र और सुंदर भाव है जो हर देशवासी में होनी चाहिए । इससे देश बनता है और प्रगति के मार्ग पर चलता है।
देशभक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हाथों में तिरंगा लेकर देश को हानि पहुंचाने का काम करते रहे। आज की युवा- पीढ़ी देशप्रेम का महत्व समझ कर उसका वास्तविक रूप अपनाये तो यह बेहतर होगा ।देश का भविष्य होने के नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह आगे आकर देश की बागडोर अपने हाथों में लें।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर (पश्चिम बंगाल)

-०-

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Monday, 16 March 2020

माह फरवरी २०२० की उत्कृष्ट रचनाएँ

सृजन महोत्सव के माह फरवरी २०२० की उत्कृष्ट रचनाएँ 
               आप सभी को बताते हुए हर्ष हो रहा है कि दीपावली के पावन पर्व पर प्रारंभ किए इस पटल पर आज तक दो सौ अस्सी से भी अधिक साहित्यकार एवं उनकी लगभग 800 से भी अधिक रचनाएं प्रकाशित की जा चुकी है. सभी रचनाकारों की विभिन्न विधाओं में प्रेषित और इस पटल पर प्रकाशित रचनाएं मौलिक एवं स्तरीय है, इसमें कोई दोराय नहीं है. आपको बताते हुए हर्ष हो रहा हैं कि मात्र फरवरी २०२० माह में देश-विदेश से लगभग 115 गद्य तथा पद्य विधाओं की रचनाएं प्रकाशित की जा चुकी है. आप सभी सृजन धर्मियों का बहुत ही अच्छा प्रतिसाद, स्नेह और प्रेम मिल रहा हैं. इसके चलते आज तक लगभग 33,400 से भी अधिक  लोगों ने इस पटल को भेट दी है.
              आज इस पटल के माह फरवरी २०२० के सर्वाधिक पसंदीदा गद्य और पद्य विधा की भारतीय रचनाओं के रचना शिल्पियों सहित विदेशी रचना शिल्पियों के योगदान को ध्यान में रखते हुए प्रति माह एक विदेशी रचनाकार को भी सृजन महोत्सव परिवार की और से सम्मानित किया जा रहा है. वह निम्न हैं -
कलुतर (श्रीलंका) से पटल से निरंतर जुडी
दुल्कान्ती समरसिंह जी की कविता 
'शायरी' पर
'विदेशी सृजन शिल्पी'
सम्मान से 
पटल की ओर से सम्मानित करते हुए तथा
 सम्मान पत्र सपुर्द करते हुए हर्ष हो रहा हैं.
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-०-

पद्य विधा में भारत वर्ष के बर्नपुर (पश्चिम बंगाल) की 
अलका 'सोनी' जी की रचना '!! पलभर छोटा है !!' पर
'पद्य सृजन शिल्पी' 
सम्मान से 
पटल की ओर से सम्मानित करते हुए तथा
सम्मान पत्र सपुर्द करते हुए हर्ष हो रहा हैं.
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-०-
गद्य विधा में भारत वर्ष के आदिपुर (गुजरात) के
विवेक मेहता जी की कहानी  
'गुंडे' पर
'गद्य सृजन शिल्पी'
सम्मान से 
पटल की ओर से सम्मानित करते हुए तथा
 सम्मान पत्र सपुर्द करते हुए हर्ष हो रहा हैं. 
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****
दोनों सृजन शिल्पियों का एवं हमारे साथ जुड़े सभी साहित्य कर्मियों का
हार्दिक आभिनंदन !!!



***
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* बेटियाँ * (कविता) - अलका 'सोनी'

* बेटियाँ *
(कविता)
कोयल की कूक कभी
मयूरों की नर्तन होती
हैं बेटियां

रेशमी डोर सी लिपटी
मीठी सी उलझन होती
हैं बेटियां

खुद आगे बढ़ती जाती
कमजोर कहां होती
हैं बेटियां

घुंघरू की रुनझुन सी
बजकर घर को खनकाती
हैं बेटियां

माता-पिता के संसार को
महकाती, हरसिंगार- सी होती
हैं बेटियां

लाड़ भी करती ,ज़िद पर भी आती
मनाओ गर तो मान जाती
हैं बेटियां।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Tuesday, 3 March 2020

★ कर्ज़ ★ (कविता) - अलका 'सोनी'

★ कर्ज़ ★
(कविता)
मां की ममता का बेटा
कर्ज़ चुका क्या पाएगा

रखा था जैसे मां ने
क्या उसको वो रख पाएगा

मां ने तो अपनी रोटी बांटी
कितनी रातों की नींदें छोड़ी

बेटों ने दो रोटी की खातिर
उसको ठोकर खाने छोड़ी

जिसने जन्म दिया है तुमको
एहसान उसका न लौटा पाएगा

मां के लहू का कोई बेटा
कर्ज़ न कभी चुका पाएगा।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Monday, 17 February 2020

★★ पलभर छोटा है ★★ (कविता) - अलका 'सोनी'

★★ पलभर छोटा है ★★
(कविता)
जिंदगी गुजर जाती यूँ ही
जीने को पलभर छोटा है

पानी का है स्वाद वही बस
कहने को गागर छोटा है

शब्दों में है जान बहुत, यह
कहने को शायर छोटा है

रहते सब मिलजुल कर इसमें
दिखता बस यह घर छोटा है

सोई हैं कितनी ही लहरें
सोचो मत सागर छोटा है

बढ़ने की हर कोशिश कर तू
कोई नहीं अवसर छोटा है

मच सकती है हलचल दिल में
क्यों देखें पत्थर छोटा है

झुक कर छोड़ो चलना जग में
कोई नहीं अब सर छोटा है

सुंदर मन हो जिसका,उसके
आगे हर जेवर छोटा है।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

***
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Wednesday, 29 January 2020

" वसंत आ रहा है " (कविता) - अलका 'सोनी'

◆ वसंत आ रहा है ◆
(कविता)
ठिठुरती सर्दियों का
अब अंत आ रहा है
छा रही लालिमा
पलाश की
अपना वसंत
आ रहा है

आम्र मंजरी से
सजा रथ लेकर
अनंग आ रहा है
स्मरण आज
फिर शकुंतला को
दुष्यंत आ रहा है
आओ करें स्वागत कि
वसंत आ रहा है
कोकिल की कुक से
गूंज उठी है अमराई
संदेश प्रेम का वह
अनंत ला रहा है

खिलखिला रही है
पीली सरसों
अमलतास बिछ गए हैं
कैसा उमंग लेकर
वसंत आ रहा है !!-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Sunday, 26 January 2020

२६ जनवरी गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभाकामनाएं

७१ वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक बढ़ियाँ एवं शुभकामनाएँ 
सादर प्रणाम
प्रस्तुत हैं 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर सृजन महोत्सव पटल प्रकाशित रचनाएं। सभी रचनाकार और पाठक गणों का हार्दिक अभिनंदन और आभार। अपनी रचनाओं को अधिकाधिक साहित्यिक मित्रों व व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर करें ताकि आपकी रचना अधिक पाठकों तक पहुंचे।धन्यवाद
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
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★★ एकता की पहचान ★★ (कविता) - अलका 'सोनी'
मेरा भारत महान (कविता) - एस के कपूर 'श्रीहंस'
भाईचारा (कविता) - डॉ . भावना नानजीभाई सावलिया
ए भारत तुझे प्रणाम (कविता) - दिनेश चंद्र प्रसाद 'द...
आओ एकता का डोर बुने (कविता) - संगीता ठाकुर (नेपाल)
भारत देश महान (कविता) - सुमन अग्रवाल "सागरिका"
! ग्रेसी ! (लघुकथा) - डॉ विनीता राहुरीकर
'भारत माँ की जय' (कविता) राजू चांदगुडे
संडे का खून (लघुकथा) - गोविंद भारद्वाज
“हम भारत के लोग” (कृति चर्चा) - संदीप सृजन
ज़रा याद करें (कविता) - राजीव डोगरा
ऐ मेरे मेहबूब वतन (गीत) - अख्तर अली शाह 'अनन्त'
गणतांत्रिक देश हमारा..... (कविता) - रामगोपाल राही...
!! मैं देश बदलने निकला हूँ !! (कविता) - अमन न्याती...
नया अभियान करें (राष्ट्रभक्ति बालगीत) - राजेंद्र श...
आये वतन पे खतरा (कविता) - रूपेश कुमार
हिंदुस्तान हमारा है (कविता) - अलका पाण्डेय
भारत माँ की जय (कविता) - विजयानंद विजय
हे...वीर (कविता) - गोविन्द सिंह चौहान
भारत की शान तिरंगा (कविता) -शुभा/रजनी शुक्ला
नन्ही कोशिश (कघुकथा) - डा. नीना छिब्बर
प्यारा वतन (कविता) - रश्मि लता मिश्रा
लिखूँ न लिखूँ (कविता) - सुशीला जोशी
आँख मेरी भर आती है (कविता) - अंजलि गोयल 'अंजू'
तिरंगा (कविता) - डॉ.नीलम खरे
राष्ट्रभक्ति (लघुकथा) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
तिरंगे का मान बढाये (कविता) - सुनील कुमार माथुर
मेरा भारत महान (कविता) - एस के कपूर 'श्रीहंस'
गणतंत्र उबल रहा है (कविता) - श्रीमती सरिता सुराणा
सुभाषचन्द्र बोस (कविता) - अख्तर अली शाह 'अनन्त'
दास्तान भारत की (ग़ज़ल) - महावीर उत्तराँचली
सिर्फ लाल... (कविता) - रूपेश कुमार
आ गया गणतंत्र दिवस (कविता) - डॉ. प्रमोद सोनवानी
मिट्टी में मिल जानी है (कविता) - सरिता सरस
बलिदानी (कविता) - गोविन्द सिंह चौहान
वतन हमारा (कविता) - प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

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★★ एकता की पहचान ★★ (कविता) - अलका 'सोनी'



★★ एकता की पहचान ★★
(कविता)
जन में, गण में, मन में बसे
कोटि -कोटि नमन में बसे
करती हूं वंदना मां भारती
तू हर हृदय और वर्ण में बसे।

मुश्किलों से पायी है आज़ादी
देकर कुर्बानियां आयी है आज़ादी
सांस तक मैं वार दूँ चरणों में तेरे
नई पहचान दिलायी है आज़ादी

हम सभी माँ भारती की संतान हैं
इस बात से फिर भी अनजान हैं
बढ़ रही है फूट जाने क्यों यहां
एकता ही रही जिसकी पहचान है।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Sunday, 19 January 2020

◆ लाल गुलाब◆ (लघुकथा) - अलका 'सोनी'

◆ लाल गुलाब◆
(लघुकथा)
किरण गुस्से में लाल हुए जा रही थी। उसके गमले में खिले लाल गुलाब गायब थे, वो बड़बड़ाये जा रही थी कि बस एक बार पता चल जाये कि किसने तोड़ा है फिर उसे अच्छे से सबक सिखाएगी । सुबह ही उसने देखा था कि किराएदार का छोटा लड़का वहीं गमले के पास खेल रहा था, जरूर उसी ने तोड़ा होगा। दनदनाते हुए वो अपने किराएदार के पास पंहुच गयी और गुस्साते हुए खूब खरी-खोटी सुनाई। धमकी भी दे दी कि फिर ऐसी हरकत की तो घर छोड़कर जाना होगा। इतने कम किराये में दूसरा घर उन्हें कहीं नहीं मिलेगा। 
अब जाकर उसे थोड़ी शान्ति मिल रही थी। फिर उसे ध्यान आया कि संध्या-वंदन का समय हो गया है। घर जाकर आरती करनी चाहिए । तभी उसकी दादी ने बताया कि उन्होंने आज आरती कर ली है और आज खिले लाल गुलाब भी पूजा में चढ़ा दिया है। 
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

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Sunday, 12 January 2020

■ युवा देश के जाग रहे हैं ■ (कविता) - अलका 'सोनी'

■ युवा देश के जाग रहे हैं ■
(कविता)
प्रगति का ध्वज
हाथों में लेकर
धरती से अम्बर की
दूरी माप रहे हैं
युवा देश के
जाग रहे हैं
जोश से इनके
डरकर
दुर्दिन देश के
भाग रहे हैं।
चुनौतियां हो
कितनी भी
कब घबरा कर
वो भाग रहे हैं।
तकनीक को
उंगलियों पर नचाते
नई सोच से देश
सजाते
जननी का न
दूध लजाते
भाग देश के इनसे
जाग रहे हैं।
नए सन्धानों
की खोज में तत्पर
कितनी रातों से
जाग रहे हैं।
उम्मीदें है
कितनी इनसे ये
सब कुछ अब
जान रहे हैं
दर्शन में विज्ञान
मिलाकर नए
प्रयोग को
जांच रहे हैं
युवा देश के
जाग रहे हैं।
-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

-०-

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Saturday, 4 January 2020

◆ धुंध◆ (कहानी) - अलका 'सोनी'

◆ धुंध◆
(कहानी)
दूसरे बच्चों की तरह मिनी भी चाहती थी कि वह भी बाहर घूमे-फिरे म त्यौहारों में लगने वाले मेलों का जी -भर आनंद ले। लेकिन उसकी मां उसे कहीं भी नहीं जाने देती थी। कहीं बाहर जाना भी पड़े तो कार के शीशे चढ़ाकर जाते थे वो लोग। मिनी चाहती थी कि कार के शीशे खोलकर वह बाहर हो रही बरसात का आनंद अपनी हथेली पर पड़ती बूंदों की ठंडक से महसूस करे। जब मेले लगे तो अपने दोस्तों के साथ खूब मस्ती करे। परन्तु ऐसा उसे करने नहीं मिलता था और वो मन मसोस के रह जाती थी। एक दिन उसका बाल सुलभ मन विद्रोह कर बैठा और उसने ज़िद पकड़ ली कि वो मेले में जाएगी तो बस जाएगी। उसके माता-पिता उसे कितना समझाये लेकिन वो नहीं मानी। अन्ततः सभी मेला जाने की तैयारी करने लगे।
उधर उसकी मां अपने पर्स में " मास्क " और जरूरी दवा रखने लगी। वो किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत लग रही थी। सभी मेले में पहुंचे।
वहाँ चारो तरफ मौजूद भीड़, तेज़ परफ्यूम की गंध, पुराने तेल में पकते पकवान, लोगों के पैरों से उड़ती हुई धूल और जगह-जगह फेंके पॉलीथिन के बैग देख उनका मन खिन्न हुआ जा रहा था। मिनी को उसकी मां ने मास्क लगाने को कहा, लेकिन मेले देखने की ख़ुशी में वो अनदेखा करती रही अपनी मां को। थोड़ी देर में वो सब मेले के मुख्य भाग में पहुंचे। अंदर की तरफ, और ज़्यादा भीड़, और ज़्यादा गन्दगी थी। इस प्रदूषण का मिनी पर बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हो गया और वह खाँसने लगी।धीरे - धीरे उसकी खांसी बढ़ने लगी, चेहरा लाल हो गया। जब तक वह मास्क पहनती, उसे उल्टी आना शुरू हो गई। आनन-फानन में उसके पिता उसे गाड़ी में लेकर हॉस्पिटल ले जाने लगे।
पूरा शहर मेले की खुमारी में था और वे उसे लेकर मेले की विपरीत दिशा में शहर के बड़े हॉस्पिटल की ओर जा रहे थे। जाते -जाते रात के 2 बज चुके थे। इमरजेंसी में मिनी को एडमिट कराना पड़ा। अंदर उसका इलाज हो रहा था और बाहर आकाश में धूल की एक परत सी जमती जा रही थी। जो अपनी मटमैली धुंध में शहर को लील रही थी।-०-
अलका 'सोनी'
बर्नपुर- मधुपुर (झारखंड)

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